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पिता का दर्द देख कर ट्रैक्टर के साथ किया ऐसा आविष्कार, हैरान रह जाएंगे आप
टीम डिजिटल, अमर उजाला
Updated Sun, 17 Dec 2017 08:38 AM IST
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राजस्थान के बारन जिले के बमोरीकलां गांव में मेरे पिता पिछले तीस वर्षों से ट्रैक्टर चला रहे हैं। ट्रैक्टर चलाना ही उनका पेशा है। बुआई के सीजन में उन्हें रात-रात भर ट्रैक्टर चलाना पड़ता है, ताकि सभी किसानों की खेती समय पर हो सके। ऐसे में पूरे दिन के उनके अधिकांश घंटे ट्रैक्टर की सीट पर ही गुजरते हैं। उनकी इस जी-तोड़ मेहनत के पीछे भी एक वजह थी। दरअसल उन्होंने कर्ज लेकर ट्रैक्टर खरीदा था और यही कर्ज उतारने के लिए वह जरूरत से ज्यादा मेहनत करते थे।
जिम्मेदारियों के बोझ तले वह पैसे तो कमा रहे थे, पर इस वजह से उनकी पीठ में दर्द रहने लगा। इलाज कराया गया, तो डॉक्टर ने सलाह दी कि उन्हें ट्रैक्टर की सीट पर बैठने के बजाय कुछ दिनों तक आराम करना पड़ेगा। आराम करने का मतलब था कि परिवार का अकेला कमाऊ इंसान घर बैठ जाए। मेरे दिमाग में विचार आया कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि उन्हें समस्या भी न हो और कमाई भी न रुके। दरअसल बचपन से मैं आविष्कारी प्रवृत्ति का रहा हूं। चीजों को देखकर उनको अपने हिसाब से उपयोगी बनाने के बारे में लगातार सोचता रहता हूं।
इसी आधार पर मैं कई दिनों तक ट्रैक्टर को देखने के बाद इसे बिना किसी ड्राइवर की मदद के रिमोट कंट्रोल से चलाने की योजना पर काम करने लगा। इस दिशा में मेरा आविष्कारक दिमाग बड़ी तेजी से चल रहा था। लेकिन इसके लिए कलपुर्जों की जरूरत थी, जिनके लिए चाहिए थे पैसे। पिता जी को बताने पर उन्हें मेरी योजना पर विश्वास नहीं हुआ, फिर भी उन्होंने मुझे दो हजार रुपये दे दिए। उन पैसों की मदद से मैंने सैंपल के तौर पर अपना काम शुरू किया। सैंपल देख पिता जी को मेरे संभावित आविष्कार में सच्चाई दिखने लगी।
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फिर उन्होंने मुझे इस पूरे प्रकल्प के लिए पचास हजार रुपयों तक की मदद की। इस दौरान मैं हर रोज सोने से पहले बिस्तर पर केवल उसी तकनीक के बारे में सोचता रहता, जो कि मेरे आविष्कार से जुड़ी रहती थी। आखिरकार मैंने पिता जी भरोसे को सही साबित करते हुए अगले दो महीनों में रिमोट से संचालित होने वाले चालकविहीन ट्रैक्टर के सपने को सच साबित कर दिया। मेरे लिए चुनौती थी कि इस रिमोट को पिताजी चलाएंगे कैसे? इसलिए मैंने अपने रिमोट में सब कुछ उसी तरह रखा, जैसे ट्रैक्टर में होता है, मसलन स्टियरिंग, ब्रेक, गियर और क्लच। रिमोट में सेटेलाइट से ट्रैक्टर को जोड़ा गया है। खेत कितनी भी बड़ी जोत का क्यों न हो, रिमोट काम करता रहेगा। डेढ़ किलोमीटर की रेंज तक ट्रैक्टर को इस रिमोट से चलाया जा सकता है। यही कारण है कि किसान खेत की मेड़ पर बैठकर आराम से खेत की जुताई कर सकता है।
मेरे काम को देखते हुए लोगों ने मुझे इंजीनियरिंग की पढ़ाई की सलाह दी। पर इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को देख-समझकर मेरा मानना था कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान मैं इतनी आजादी से नहीं सोच सकता, जो कि अपेक्षाकृत सामान्य पढ़ाई करके। यही सोचकर मैंने इस वर्ष बीएएसी कोर्स में प्रवेश ले लिया। अभी मेरी उम्र मात्र उन्नीस साल है और मैं सेना के लिए एक ऐसा वाहन डिजाइन कर रहा हूं, जो किसी भी परिस्थिति में उनके अनुकूल हो। जो भी समस्या मुझे अपने आसपास दिखती है, उसे मैं पहले अच्छी तरह से समझता हूं, फिर उसके समाधान के लिए कुछ दिन रिसर्च करता हूं और फिर कुछ ऐसा निकलता है, जो आविष्कार बन जाता है।
-योगेश नागर
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जिम्मेदारियों के बोझ तले वह पैसे तो कमा रहे थे, पर इस वजह से उनकी पीठ में दर्द रहने लगा। इलाज कराया गया, तो डॉक्टर ने सलाह दी कि उन्हें ट्रैक्टर की सीट पर बैठने के बजाय कुछ दिनों तक आराम करना पड़ेगा। आराम करने का मतलब था कि परिवार का अकेला कमाऊ इंसान घर बैठ जाए। मेरे दिमाग में विचार आया कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि उन्हें समस्या भी न हो और कमाई भी न रुके। दरअसल बचपन से मैं आविष्कारी प्रवृत्ति का रहा हूं। चीजों को देखकर उनको अपने हिसाब से उपयोगी बनाने के बारे में लगातार सोचता रहता हूं।
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इसी आधार पर मैं कई दिनों तक ट्रैक्टर को देखने के बाद इसे बिना किसी ड्राइवर की मदद के रिमोट कंट्रोल से चलाने की योजना पर काम करने लगा। इस दिशा में मेरा आविष्कारक दिमाग बड़ी तेजी से चल रहा था। लेकिन इसके लिए कलपुर्जों की जरूरत थी, जिनके लिए चाहिए थे पैसे। पिता जी को बताने पर उन्हें मेरी योजना पर विश्वास नहीं हुआ, फिर भी उन्होंने मुझे दो हजार रुपये दे दिए। उन पैसों की मदद से मैंने सैंपल के तौर पर अपना काम शुरू किया। सैंपल देख पिता जी को मेरे संभावित आविष्कार में सच्चाई दिखने लगी।
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फिर उन्होंने मुझे इस पूरे प्रकल्प के लिए पचास हजार रुपयों तक की मदद की। इस दौरान मैं हर रोज सोने से पहले बिस्तर पर केवल उसी तकनीक के बारे में सोचता रहता, जो कि मेरे आविष्कार से जुड़ी रहती थी। आखिरकार मैंने पिता जी भरोसे को सही साबित करते हुए अगले दो महीनों में रिमोट से संचालित होने वाले चालकविहीन ट्रैक्टर के सपने को सच साबित कर दिया। मेरे लिए चुनौती थी कि इस रिमोट को पिताजी चलाएंगे कैसे? इसलिए मैंने अपने रिमोट में सब कुछ उसी तरह रखा, जैसे ट्रैक्टर में होता है, मसलन स्टियरिंग, ब्रेक, गियर और क्लच। रिमोट में सेटेलाइट से ट्रैक्टर को जोड़ा गया है। खेत कितनी भी बड़ी जोत का क्यों न हो, रिमोट काम करता रहेगा। डेढ़ किलोमीटर की रेंज तक ट्रैक्टर को इस रिमोट से चलाया जा सकता है। यही कारण है कि किसान खेत की मेड़ पर बैठकर आराम से खेत की जुताई कर सकता है।
मेरे काम को देखते हुए लोगों ने मुझे इंजीनियरिंग की पढ़ाई की सलाह दी। पर इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को देख-समझकर मेरा मानना था कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान मैं इतनी आजादी से नहीं सोच सकता, जो कि अपेक्षाकृत सामान्य पढ़ाई करके। यही सोचकर मैंने इस वर्ष बीएएसी कोर्स में प्रवेश ले लिया। अभी मेरी उम्र मात्र उन्नीस साल है और मैं सेना के लिए एक ऐसा वाहन डिजाइन कर रहा हूं, जो किसी भी परिस्थिति में उनके अनुकूल हो। जो भी समस्या मुझे अपने आसपास दिखती है, उसे मैं पहले अच्छी तरह से समझता हूं, फिर उसके समाधान के लिए कुछ दिन रिसर्च करता हूं और फिर कुछ ऐसा निकलता है, जो आविष्कार बन जाता है।
-योगेश नागर