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'मां की मौत ने निचले तबके के लिए काम करने को प्रेरित किया'

Thu, 30 Aug 2018 01:16 PM IST
मनोज कुमार
मनोज कुमार Updated Thu, 30 Aug 2018 01:16 PM IST
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Psychiatrist Manoj Kumar work for poor patients, make more than 50 groups in Kerala
मनोज कुमार

मनोचिकित्सक के रूप में मैं पिछले तीन दशकों से ज्यादा वक्त से काम कर रहा हूं। लंबे समय तक मैंने ब्रिटेन में काम किया है। मां की मौत ने मुझे समाज के निचले तबके के लिए काम करने को प्रेरित किया। दरअसल वह मुझे हमेशा गरीबों की सेवा करने की शिक्षा देती थीं। उन्हीं शिक्षाओं का परिणाम है कि आज मैं अपनी संस्था की मदद से केरल के पांच जिलों में पचास से भी ज्यादा सामुदायिक समूहों के माध्यम से चार हजार मरीजों के लिए काम कर पा रहा हूं।

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भारत में अधिकांश मानसिक स्वास्थ्य केंद्र संस्था आधारित हैं और वे पूरी तरह से दवाओं पर निर्भर हैं, जिसे बेहतर व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। मैं इस बात में विश्वास रखता हूं कि मानसिक रोगियों के लिए दवाओं से ज्यादा सामुदायिक देखभाल और पुनर्वास की जरूरत है। मैंने भारत में पाया कि यहां पहले से मौजूद मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था में कई खामियां हैं। इस क्षेत्र के लगभग शत प्रतिशत डॉक्टर शहरी इलाकों में काम करते हैं और देश की बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अंधेरे में है।
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और जहां भी मानसिक रोगियों का इलाज किया जाता है, वहां भी सब कुछ परंपरागत तरीके से हो रहा है। विशेष थेरेपी या उनके पुनर्वास जैसी चीजें मुझे अधिकतर जगहों पर नहीं दिखीं। इलाज के इसी खालीपन को देखते हुए मैंने अपना मेंटल हेल्थ एक्शन ट्रस्ट खोलने का फैसला किया। किसी का मानसिक स्वास्थ्य ठीक करने का काम कोई विशेषज्ञ ही करे; यह जरूरी नहीं है, इस प्रक्रिया में हर कोई शामिल हो सकता है। हम स्थानीय लोगों को अपनी संस्था से जोड़कर यही काम करते हैं। मैंने अपने ट्रस्ट के लिए प्रसिद्ध मनोचिकित्सा शोधार्थी विक्रम पटेल की अवधारणा अपनाई है। उनका मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए समुदायिक सहभागिता की विशेष जरूरत होती है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय तकनीक टास्क-शेयरिंग का भी प्रयोग किया जाता है।

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स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए हमारी संस्था काम करती है।

समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए हमारी संस्था पेलिएटिव केयर सेंटर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अन्य नागरिक समाज संगठनों के साथ मिलकर काम करती है। कुछ सामुदायिक केंद्र भी बनाए गए हैं, जहां निःशुल्क सलाह के साथ लोगों का इलाज किया जाता है। कुछ स्थानीय सहयोगियों की मदद से रोगियों के घर पर जाकर उन्हें नियमित मनोवैज्ञानिक थेरेपी दी जाती है। मरीजों के परिवार वालों से बात की जाती है, और साथ ही छोटे-छोटे स्वयं सहायता समूह भी बनाने की कोशिश की जाती है।

इन स्वयंसेवकों में गृहणियां, दुकानदार, रिक्शा चालक, चाय विक्रेता और किसानी करने वाले जैसे लोग शामिल होते हैं। हम टेली-सायकायट्री का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसमें डॉक्टर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये मरीज का प्राथमिक इलाज करते हैं। दस साल पहले जब मैंने अपनी संस्था शुरू की थी, तो हमारी सबसे बड़ी चिंता पैसों को लेकर थी। हमारा काम अपने आप में नए तरीके का था, सो मान्यता के अभाव में हमे फंडिंग करने वाले बहुत कम लोग आगे आए।

लेकिन जैसे-जैसे हम अपने अनोखे अंदाज में गरीब मरीजों का सफल इलाज करते गए, स्थानीय लोगों ने हमारी संस्था में भरोसा जताना शुरू कर दिया। मानसिक रोगियों के लिए समाज में रह पाना बहुत मुश्किल होता है, इसलिए हम सिर्फ उनका इलाज ही नहीं करते, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए भी प्रयास करते हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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