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'स्तन कैंसर को हराने की जिद में 'आरोग्य संस्था की स्थापना की'

Tue, 07 Aug 2018 02:51 PM IST
प्रियांजलि दत्ता
प्रियांजलि दत्ता Updated Tue, 07 Aug 2018 02:51 PM IST
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Priyanjali Datta -24 year old doctor who is taking cancer prevention measures to rural India
प्रियांजलि दत्ता

मैं चौबीस वर्षीया डॉक्टर हूं। मैं मेघालय के उस इलाके से ताल्लुक रखती हूं, जहां कैंसर मरीजों की संख्या बहुत अधिक है। इसी कैंसर ने मेरी नानी की जिंदगी लील ली थी। अपनी नानी से मुझे बहुत लगाव था। नानी को खोने के बाद तत्काल भले ही मैंने डॉक्टर बनने के बारे में नहीं सोचा था, लेकिन आगे चलकर कैंसर के खिलाफ काम करने का संकल्प जरूर ले लिया था। आर्मी स्कूल से शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे दिल्ली के ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया।

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कॉलेज में पढ़ने वाले किन्हीं आम विद्यार्थियों की तरह हम भी कॉलेज में हर साल कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित करते रहते थे। डॉक्टरी की पढ़ाई के आखिरी साल में सभी छात्रों को पब्लिक हेल्थ स्टडी के अंतर्गत इंटर्नशिप करनी थी। मैंने भी दिल्ली के आसपास के इलाकों में घूम-घूमकर स्वास्थ्य सेवाओं का जायजा लिया। वास्तविक जमीनी हालात देखकर मुझे हैरत हुई। लोगों में कैंसर तो दूर, अन्य छोटी-छोटी बीमारियों तक के बारे में भी कोई जागरूकता नहीं थी। अनेक लोगों ने अपनों को खोने की घटनाएं सुनाई। मैंने सोचा कि नानी से किया वायदा निभाने का इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता है!
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इसी विचार को दिमाग में लिए मैंने पढ़ाई के आखिरी चरण में दोस्तों के साथ मिलकर कुछ अर्थपूर्ण काम करने की योजना बनाई। हमने एक फैशन शो आयोजित किया, जिसमें सभी लोगों ने हिस्सा लिया। इस आयोजन से जो भी कमाई हुई, हमने उन पैसों को जन स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों पर खर्च किया। इस तरह मैंने एक छोटी-सी शुरुआत कर दी। लेकिन इस शुरुआत को पंख देने का काम किया अस्पताल में मेरे सीनियर रहे डॉक्टर ध्रुव ने। वह कर्नाटक में काम कर चुके थे और उस वक्त दिल्ली में एक चैरिटी क्लीनिक चलाते थे। मैं उनसे कॉलेज के दिनों से ही काफी-कुछ सीखती रहती थी। मैंने उनसे अपना विचार साझा करते हुए इस दिशा में कुछ ठोस काम करने का प्रस्ताव रखा।

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उन्होंने सहमति जताई और हमने मिलकर पिछले साल 'आरोग्य' संस्था की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य है- लोगों में बीमारियों के प्रति जागरूकता का प्रसार करना और उनका इलाज करना, जिसमें स्तन कैंसर के मरीजों तक पहुंचना हमारी प्राथमिकताओं में शामिल है।

दरअसल भारत में स्तन कैंसर से पीड़ित दस में से आठ महिलाएं बीमारी होने के बाद पांच साल से ज्यादा वक्त तक बड़ी मुश्किल से ही जीवित रह पाती हैं। कारण यही होता है कि उन्हें अपने मर्ज की पहचान ही नहीं होती और जब तक उन्हें पता चलता है, तब तक देर हो चुकी होती है। मैंने अपने काम को इसी समस्या पर केंद्रित रखा है। हमारा शुरुआती कार्यक्षेत्र दिल्ली-एनसीआर के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा।

फिलहाल हम अपने बारह स्वयं सेवकों की मदद से अपने काम का दायरा पंजाब, पश्चिम बंगाल और मेघालय तक बढ़ा रहे हैं। अब तक कुल 1,759 लोगों को हमारी ओर से मदद प्राप्त हो चुकी है। ये ऐसे मरीज हैं, जिनके रोग की न सिर्फ समय पर पहचान हो सकी है, बल्कि हमने अपने सहयोगी अस्पतालों में उनके इलाज की भी व्यवस्था की है।

इसके अलावा हमारी टीम कोशिश करती है कि स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं की सभी जरूरतें पूरी हों और उनका नियमित स्वास्थ्य परीक्षण होता रहे। हमारी टीम का हर एक सदस्य ग्रामीण स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाने के लिए कृत संकल्प है।

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