'मेरी योजना है कि मैं प्रशासनिक सेवा से जुड़कर समाज के लिए और बेहतर तरीके से काम करूं'
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किसी विद्यार्थी के लिए दसवीं की परीक्षाएं खत्म होना एक उत्सव सरीखा होता है। मेरे लिए भी था। मेरी परीक्षाएं खत्म हुईं, तो सर्दियां खत्म नहीं हुई थीं। परीक्षा के तनाव से मुक्त होकर मैं सुबह-सुबह जबलपुर के पास एक नदी तट पर घूमने गई थी। ठंड से बचने के लिए मैंने गर्म कपड़े पहन रखे थे, पर वहां एक शख्स केवल एक जूट की बोरी ओढ़े लेटा हुआ था। दिखने में वह गरीब भिखारी लग रहा था।
मैं साफ-साफ देख पा रही थी कि उसे ठंड लग रही है। वहां से लौटने के बाद मुझे ऐसे सभी लोगों की चिंता होने लगी, जो सर्दी का मुकाबला जूट की बोरी से करते हैं। अगले ही दिन मैंने अपने मोहल्ले में पुराने कपड़े इकट्ठा किए और उन्हें जाकर जरूरतमंदों में बांट आई।
यह पहली घटना थी, जिसने मुझे समाज के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया। मेरा परिवार मूलतः कोलकाता से है, पर बचपन में ही मेरे माता-पिता जबलपुर के पास सिवनी जिले के धूमा गांव में आकर बस गए थे। मेरी परवरिश इसी गांव में हुई। मैं बचपन से ही बड़ी जिद्दी किस्म की लड़की रही हूं। फिर चाहे हड़ताल के जरिये अपने स्कूल में विज्ञान विषय की पढ़ाई शुरू कराना रहा हो या किशोरावस्था में आते ही घर में शौचालय बनवाने का सफल प्रयास।
गांव की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं जबलपुर आ गई। चार साल पहले की बात है, मैं उस समय स्नातक की पढ़ाई कर रही थी। चूंकि मैंने शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा जैसी तमाम सामाजिक समस्याओं का बहुत करीब से अनुभव किया था, सो मेरे दिमाग में हमेशा इस क्षेत्र में कुछ करने का ख्याल चलता रहता था।
इस बीच, मुझे एक धार्मिक संगठन द्वारा बच्चों के लिए संस्कारशालाएं आयोजित करने के बारे में पता चला। मुझे यह काम जंच गया और मैं भी उनके साथ हो ली। लेकिन कुछ हो दिनों में मुझे लगा कि बच्चों को संस्कारों के साथ बहुउद्देश्यीय शिक्षा की आवश्यकता है। इसके बाद एक बस्ती से मैंने कुछ बच्चों को इकठ्ठा कर अलग से पढ़ाना शुरू कर दिया। शुरू में वे बच्चे मुझसे बहुत प्रभावित नहीं हुए, पर जल्द ही मैंने रफ्तार पकड़ ली।
यह सब मैं बिना घर वालों को बताए किए जा रही थी। एक दिन स्थानीय अखबार में मेरे काम के बारे में खबर छपी, जिसे गांव में मेरे पिता ने पढ़ा, तो वे चकित रह गए। उनके चकित होने की वजह भी थी, क्योंकि तब तक मुझे गरीब बच्चों को पढ़ाते हुए एक साल हो चुके थे। पिता के मन में मेरे भविष्य को लेकर कुछ आशंकाएं पैदा हुईं, लेकिन जल्द ही मैंने उन्हें विश्वास में ले लिया। दरअसल मैं इस काम में होने वाले खर्च के लिए अपनी पॉकेट मनी इस्तेमाल करती थी।
झुग्गी के बच्चों को पढ़ाने का मेरा काम दिनोंदिन बढ़ता गया, और मेरे प्रयासों से उन बच्चों के अभिभावकों ने उन्हें स्कूल भेजना भी शुरू कर दिया। इस सफलता से मुझे जो संतुष्टि मिली, उसे मैं बयान नहीं कर सकती। मैंने उन लोगों को अपने काम से जोड़ा, जो अपने जन्मदिन या अन्य मौकों को गरीबों के बीच जाकर मनाना पसंद करते हैं। ऐसे लोग इन बच्चों के बीच अपना जन्मदिन मनाते हैं।
आज मेरे साथ कई स्वयंसेवक जुड़ गए हैं। इनमें कई उच्च शिक्षित लोग भी शामिल हैं। फिलहाल हम करीब 200 बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने में कामयाब हुए हैं। अगले दो महीने में मेरी एमएससी की पढ़ाई पूरी हो रही है। मेरी योजना है कि मैं प्रशासनिक सेवा से जुड़कर समाज के लिए और बेहतर तरीके से काम करूं।