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दिल्ली की पलक ने अपने अनोखे आइडिया से ओडिशा के कालाहांडी में फैलाई सौर ऊर्जा की रोशनी

Fri, 01 Jun 2018 04:14 PM IST
पलक अग्रवाल
पलक अग्रवाल Updated Fri, 01 Jun 2018 04:14 PM IST
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Palak Aggarwal- Batti Ghar Foundation NGO Working for develop energy for interior villages of Odisha

सफर में मेरा सहयात्री गांधी के सिद्धांतों पर आधारित एक किताब पढ़ रहा था। किताब के प्रति मेरी दिलचस्पी देखते हुए उसने मुझे अपनी किताब पढ़ने के लिए दी। वैसे तो किताब में लिखी प्रत्येक पंक्ति अनुकरणीय थी, पर गांधी की एक बात मेरे दिमाग में घर कर गई। वह पंक्ति थी-आपको कभी यह लगे कि आपका अहम आप पर भारी पड़ रहा है और आप स्वार्थ की राह पर हैं, तो उस वक्त उस सबसे गरीब चेहरे को याद करिए, जिसे आपने अपने पूरे जीवनकाल में कभी देखा हो।

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तत्पश्चात यदि आपका कोई भी कदम उस जरूरतमंद इंसान की जिंदगी बेहतर कर सकता है, तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। गांधी की इन बातों ने मेरे मन-मस्तिष्क पर गहरा असर किया।
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मैं दिल्ली में पली-बढ़ी हूं। अर्थशास्त्र में स्नातक फिर टेरी विश्वविद्यालय से सस्टेनेबल डेवलपमेंट विषय की पोस्ट ग्रेजुएट पढ़ाई के दौरान शोध कार्य के लिए मैंने ओडिशा के कालाहांडी इलाके में आदिवासियों के बीच समय बिताया। मैं 2011 में पहली बार फील्ड वर्क के लिए कालाहांडी गई।
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वहां रहकर आदिवासियों की जीवनशैली देखते हुए मैंने तय कर लिया था कि मैं उनके लिए कुछ न कुछ जरूर करूंगी। सौभाग्य से 2012 में मुझे एक फेलोशिप मिल गई। इस फेलोशिप के लिए मुझे ठीक-ठाक राशि भी मिली। मैंने उन पैसों का इस्तेमाल स्थानीय सब्जी मार्केट में सोलर एलईडी बल्ब लगवाने के लिए किया। मैं जब भी ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से कालाहांडी के सुदूर इलाकों की यात्राएं करती, तो बस के घंटों के सफर में सहयात्रियों से वहां की समस्याओं के बारे में जानकारी इकट्ठा करती।

इस क्रम में मुझे पता चला कि इन इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों को फोटोकॉपी-प्रिंटआउट जैसे छोटे-छोटे काम के लिए तीस-चालीस किलोमीटर दूर तक सफर करना पड़ता है और इसके लिए उनका पूरा दिन बर्बाद जाता है। इसका कारण एक ही था-इन इलाकों में बिजली की नुपलब्धता।  2013 में मैंने शहर की आरामदायक जीवन शैली छोड़कर कालाहांडी में स्थायी तौर पर रहकर काम करने का फैसला ले लिया।

मैं यहां के लोगों के लिए एक ऐसा मंच तैयार करना चाहती थी, जो इनकी समस्याओं को कुछ तो कम कर सके। इस दिशा में काफी सोचने के बाद मुझे सौर ऊर्जा एक ऐसा क्षेत्र लगा, जहां काम किया जा सकता था। यह सही है कि दुनिया का एक हिस्सा तकनीक के उच्चतम स्तर पर काम कर रहा है, और मैं लोगों की बेहद बुनियादी समस्या खत्म करने के लिए कुछ करने के बारे में आगे बढ़ रही थी। लेकिन यही छोटी तकनीक कालाहांडी के लोगों के लिए बहुत बड़ी बात थी।

संसाधनों और सहयोगियों को जुटाने के बाद मेरा पहला काम यह रहा कि मैंने एक स्थानीय युवक को गांव में जन समाधान केंद्र खोलने में मदद की। सौर ऊर्जा से संचालित एक लैपटॉप, डिजिटल कैमरा और प्रिंटर की व्यवस्था वाले इस केंद्र का मकसद था उन लोगों के लिए एक मॉडल तैयार करना, जो अपने इलाके में ऐसा काम करना चाहते हैं। मेरी आगे की यात्रा पूरी तरह सौर ऊर्जा के इर्द-गिर्द चलती रही। सौर ऊर्जा से चलने वाले बहुउद्देशीय उपकरणों की व्यवस्था करने के अलावा मैंने सैकड़ों घरों को सौर ऊर्जा से रोशन करने में मदद की। अपने सहयोगियों की मदद से मैं फिलहाल कालाहांडी इलाके में अपनी संस्था-बत्तीघर के जरिये हजारों जिंदगियों को सुलभ बनाने में जुटी हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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