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पिज्जा बेचकर खोला वृद्धाश्रम और बालगृह, कई महिलाओं की जिंदगी में लौटी खुशियां

Wed, 14 Mar 2018 11:52 PM IST
पद्मा श्रीनिवासन
पद्मा श्रीनिवासन Updated Wed, 14 Mar 2018 11:52 PM IST
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Padma Srinivasan opened old age home by selling pizza in Bengaluru
Padma Srinivasan

मेरे सामने रोते हुए वह कह रही थी, 'अब हमारा ध्यान कौन रखेगा? मेरे छह बच्चे हैं और मैं अनपढ़ हूं।' उस महिला का चेहरा मुझे आज भी याद है। यह तब की बात है, जब मैं अनेक बाधाएं पार करके एक अच्छी नौकरी कर रही थी। कंपनी में फाइनेंस मैनेजर के तौर पर मैं पीएफ से जुड़े काम निपटाती थी। काम के दौरान अक्सर मेरा सामना कंपनी के मृत कर्मचारियों की विधवा पत्नियों से होता था। उस महिला के आंसुओं ने मुझे उसकी जैसी तमाम औरतों के बारे में सोचने पर विवश कर दिया था।

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मेरी अपनी कहानी भी कुछ ऐसी ही है। परंपरावादी परिवार में पलने-बढ़ने के बाद जल्द ही मेरी शादी कर दी गई। मेरी बेटी ग्यारह साल की थी, जब मेरे पति की एक दुर्घटना में मौत हो गई। ससुर द्वारा दोबारा शादी करने की सलाह खारिज करने के बाद मैंने खुद काम करके अपने परिवार की परवरिश करने की ठानी। मेरे पति इंजीनियर थे। उनकी मौत के बाद कंपनी ने मेरे सामने काम करने का प्रस्ताव रखा।
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मैंने काम करना शुरू कर दिया, लेकिन बच्चों को पालने के साथ दिन भर काम करना मेरे लिए शारीरिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण रहा। शारीरिक मेहनत कम करने के लिए जरूरी था कि कोई ढंग का काम करूं, जिसके लिए जरूरी थी हुनरमंद होने की डिग्री। जाहिर है, मैंने पढ़ने का निश्चय किया। परिजनों की मदद से मैंने आईसीडब्ल्यूए परीक्षा पास की। जिसके बाद कंपनी प्रबंधन ने मुझे अधिकारी बना दिया। दरअसल अपने काम के अनुशासन से मैंने उच्च आधिकारियों को हमेशा प्रभावित किया था।

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Padma Srinivasan opened old age home by selling pizza in Bengaluru
Padma & Jayalakshmi

उस महिला वाली घटना के बाद मैंने उनकी जैसी तमाम महिलाओं को काम दिलाने के लिए कंपनी में अपनी बात रखी। लेकिन कोई भी कौशल न जानने के कारण कंपनी प्रबंधन ने किसी भी महिला को काम पर रखने से मना कर दिया। मैंने तत्काल अपनी योजना में तब्दीली करते हुए यह प्रस्ताव रखा कि बेकरी का जो सामान कंपनी बाहर से मंगाती है, क्यों न उसकी जगह इन महिलाओं के हाथों का बना सामान ही उपयोग किया जाए।

बस इन्हें इस काम की शुरुआत करने के लिए मदद देनी होगी। कंपनी ने मेरी बात मान ली और जगह मुहैया करा दी। शुरुआती निवेश के बाद मैंने कंपनी के सभी सदस्यों से चंदा इकट्ठा करके 1983 में शक्ति बेकरी की शुरुआत कर दी। काम चल निकला और कई विधवा महिलाओं की जिंदगी में खुशियां लौटने लगीं।

इसके बाद तो ऐसे काम ही मेरी जिंदगी का मकसद बन गए। रिटायरमेंट के बाद भी मैं कुछ और करना चाहती थी। अपनी बेटी सरला की सलाह पर मैंने बंगलूरू के पास एक ही परिसर में एक वृद्धाश्रम और बालगृह खोलने की योजना बनाई। लेकिन हमारे पास पर्याप्त धन नहीं था। कुछ परिवर्तन के साथ एक बार फिर मैंने पुरानी तरकीब दोहराई। इस बार हमने मिलकर पिज्जा बनाना सीखा। एक बार फिर हमारा काम चल निकला।

शायद इसके पीछे हमारा नेक इरादा असल वजह हो। हमारा 'ग्रैनीज पिज्जा' आसपास के लोगों को इतना पसंद आने लगा कि लोग विभिन्न बड़े ब्रांड के पिज्जा की जगह हमारे पिज्जा को तवज्जो देने लगे। व्यापार से अर्जित लाभ से मैंने वृद्धाश्रम और बालगृह खोलने का सपना पूरा किया। मेरे आश्रम विश्रांति में आज दर्जनों बुजुर्ग तथा बच्चे रहते हैं। मैं अस्सी की उम्र पार कर चुकी हूं, लेकिन आज भी  एकांउट की जिम्मेदारी खुद ही संभालती हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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