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अक्षमता को हराकर ढूंढ ली खुशियां: अदिति वर्मा

Thu, 01 Feb 2018 12:29 PM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 01 Feb 2018 12:29 PM IST
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Only success or numbers should not be the scale of anyone to count says aditi verma
अदिति वर्मा
एक चायवाला हर दिन हमारे कॉम्प्लेक्स में चाय बेचने आता था। मैं जब भी उसको देखती, तो यही सोचती कि यह काम मैं भी कर सकती हूं। मैंने पापा से कहा कि कल से ही मैं अपने प्रतिष्ठान के सभी कर्मचारियों के लिए घर से चाय तैयार करके लाऊंगी।
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यह एक कोशिश थी डाउन सिंड्रोम जैसी घातक बीमारी से पीड़ित मेरे जैसी किशोरी के लिए जीवन में अपनी खुशी की कोई भी इकलौती वजह ढूंढने की। मेरे लिए घर की रसोई में घुसने का भी यह पहला मौका था। मुझे अपनी मां के साथ रसोई में काम करने में आनंद आने लगा। खाना बनाने के इसी सुख ने आगे चलकर मेरे जीवन को नई दिशा दी।
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मैं नवी मुंबई में एक रेस्टोरेंट चलाने वाली तेईस वर्षीय युवती हूं। मैं शुरू से ही बीमार थी। हालांकि मेरे मां-बाप ने मेरी खुशियां, मेरी पसंद-नापसंद, सभी बातों को ध्यान रखते हुए हर जरूरी सहूलियतें मुहैया कराईं। लेकिन सामान्य स्कूल में असामान्य व्यवहार के कारण मुझे किसी विशेष स्कूल में पढ़ाने के सिवा उनके पास दूसरा चारा नहीं था।
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उन्होंने मुझे जयपुर और पुणे में पढ़ाया, और आखिर में बेलापुर के स्वामी ब्रह्मानंद प्रतिष्ठान में रखा। इस पूरी भागदौड़ के पीछे उनका एकमात्र उद्देश्य था कि कैसे भी मैं पढ़ लिखकर कोई काम करने के काबिल बन सकूं।

उनके इस प्रयास को मैंने जाया नहीं होने दिया और गणित को प्रिय विषय बनाते हुए 2010 में अपने स्कूल का सर्वश्रेष्ठ छात्र पुरस्कार भी जीता। पढ़ाई के अलावा मुझे डांस और नाटक भी पसंद है।

पढ़ाई पूरी करने के बाद बारी थी मेरी आर्थिक आजादी की, जो कि हर मां-बाप की इच्छा होती है। लेकिन बीमारी की वजह से मेरे लिए यह इतना आसान काम नहीं था। इसी कारण मैं अपने पिता के ट्रांसपोर्ट व्यापार में हाथ बंटाने लगी।

रसोई के लिए प्यार जगने से पहले मैं उनके लिए डाटा एंट्री का काम करती थी। खाना बनाने के चाव ने मुझे यूट्यूब से नए-नए पकवान बनाने की विधि सीखने को प्रेरित किया। मैं अक्सर अपने हाथों के जादू से घरवालों को चकित करने लगी।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

Only success or numbers should not be the scale of anyone to count says aditi verma
अदिति वर्मा
मेरे द्वारा बनाए गए नाश्ते, चाय-कॉफी, सैंडविच और नूडल्स के नए अनोखे स्वाद ने खाने वालों को तारीफ करने के लिए विवश कर दिया। घरेलू माहौल बेहतर हो रहा था, पर मेरी आगे की जिंदगी का क्या? पढ़ाई खत्म करने के बाद मेरे जीवन में किसी अतिरिक्त मूल्य की कमी साफ देखी जा सकती थी।

मेरे और मेरे घरवालों के मन में अनेक आशंकाओं ने जन्म ले लिया था। इस सब के बीच इक्कीस वर्ष की उम्र में नए साल के मौके पर मेरे पिता ने मुझे एक अनोखा उपहार दिया। उन्होंने मुझे अपने दफ्तर के ऊपर के तल पर एक रेस्टोरेंट खोलने की जगह दी। मुझे खाना बनाने के अपने कौशल को घर से बाहर दूसरों के सामने दिखाने का मौका मिला।

यह सिर्फ एक मौके तक सीमित नहीं था, बल्कि एक ऐसी संभावना थी, जिसके सफल होने पर मैं खुद को व्यस्त रखकर अपने जीवन का अर्थ ढंूढ सकती थी। मुझे खुशी है कि मेरी मेहनत रंग ला रही है।

मेरी दुकान में दो सहयोगी हैं, पर मेरे यहां तीनों लोगों के बीच काम का कोई बंटवारा नहीं है। मेरे हाथ से बने कपकेक और कुछ खास व्यंजनों की मांग पास के दफ्तरों के भैया और दीदियों में खासा है।

मेरे लिए परिस्थितियां बदल चुकी हैं। मैं अपने काम से बेहद संतुष्ट हूं और मेरी सभी आशंकाएं उम्मीदों में तब्दील हो चुकी हैं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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