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Hindi News ›   Bashindey ›   Navin Gulia- Author, Adventurer, Social Worker and World Record Holder in adventure Sports

व्हीलचेयर पर बैठकर लड़ी जिंदगी की जंग, बने दूसरों का सहारा, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया नाम

Wed, 04 Apr 2018 01:02 AM IST
नवीन गुलिया
नवीन गुलिया Updated Wed, 04 Apr 2018 01:02 AM IST
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Navin Gulia- Author, Adventurer, Social Worker and World Record Holder in adventure Sports

देश की सैन्य सेवा में शामिल होने के इरादे से मैं सत्ताइस साल पहले पुणे स्थित राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी से जुड़ा था। तीन साल तक वहां प्रशिक्षण लेने के बाद देहरादून में एक साल का दूसरा प्रशिक्षण लेकर कैप्टन बन चुका था, लेकिन मेरी इच्छा एक सैन्य प्रतियोगिता में भाग लेकर पैरा कमांडो बनने की थी।

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इसी प्रयास में मैं दुर्घटना का शिकार हो गया। मेरे शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह से जख्मी हो गया। हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू करके मुझे दिल्ली लाया गया, जहां डॉक्टरों ने मुझे बताया कि मैं अब दोबारा चल-फिर नहीं सकता। दिल को तोड़ देने वाले इस कड़वे सच के साथ मैं दो साल तक अस्पताल में पड़ा रहा। फिर भी मैं अपने भविष्य को लेकर आशान्वित रहा। नब्बे के दशक में अपने देश में कंप्यूटरीकृत भविष्य की आहट सुनी जा सकती थी।
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मैंने कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री करने का फैसला किया। मैंने पढ़ाई पूरी की और कुछ वक्त तक पढ़ाने का भी काम किया। यह सब करते समय मैं खुश तो रहता, लेकिन पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। मुझे हमेशा यही लगता कि भले ही मैं व्हीलचेयर पर हूं, मगर मैं इससे भी बड़ा काम कर सकता हूं। वैसे भी किसी को उसकी क्षमता नहीं, बल्कि सोच रोकती है। मैं अपने सैन्य सेवा काल में पहाड़ी रोमांचक खेलों का शौकीन रहा था। मैंने सोचा, क्यों न इसी क्षेत्र में अपने को साबित किया जाए। 

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खुद गाड़ी चलाकर लद्दाख की मर्सिमिक ला चोटी तक पहुंचे

Navin Gulia- Author, Adventurer, Social Worker and World Record Holder in adventure Sports
नवीन गुलीया को सम्मानित करती हुई नीता अंबानी

2004 में इंटरनेट इतना ताकतवर था नहीं, जो इस काम में मेरी मदद कर सकता। इधर-उधर से जानकारी इकट्ठा करके मैंने तय किया कि मैं खुद गाड़ी चलाकर लद्दाख की मर्सिमिक ला चोटी तक जाउंगा। इसके लिए मैंने प्रायोजक ढूंढने शुरू कर दिए। मैंने वाहन कंपनियों से संपर्क साधा, काफी मशक्कत के बाद टाटा कंपनी ने मेरी पूरी तहकीकात करके अपने एसयूवी वाहन सफारी के साथ मेरी यात्रा प्रायोजित की। मैंने उन्हें निराश नहीं किया और लिम्का रिकॉर्ड बनाते हुए मात्र पचपन घंटों में वह यात्रा तय की।

मेरा रिकॉर्ड आज तक बरकरार है। यह तो थी खुद को साबित करने की प्रक्रिया। समाज के लिए काम करने की मेरी इच्छा अभी तक अधूरी थी। मुझे याद है कि स्कूल में मैंने पढ़ा था कि महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि काम वह करो, जिसका फायदा समाज के सबसे कमजोर वर्ग को हो। राष्ट्रपिता का यह संदेश मेरे जेहन में था, पर मैं करूं क्या, इसकी समझ तब आई, जब एक दिन गुड़गांव के एक बाजार के पार्किंग में मैंने एक दो साल की बच्ची को रोते हुए देखा।

सर्द शाम में उस बच्ची के शरीर पर एक फटा-सा कपड़ा था। मैंने उस बच्ची की सभी तात्कालिक जरूरतें पूरी करके उसके घर तक पहुंचाया। वह घटना मेरे लिए एक संदेश की तरह थी। उस दिन से मैंने समाज के तमाम जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया। मैंने 2007 में एक संस्था बनाई। मेरी संस्था अलग-अलग बच्चों की उनकी जरूरतों के हिसाब से मदद करती है, क्योंकि मैं मानता हूं कि हर बच्चे की जरूरत एक समान नहीं होती है। मैं दर्जनों बच्चों को उनकी जिंदगी बेहतर करने में अपना योगदान दे चुका हूं, उनमें पंद्रह साल का सनी भी शामिल है, जो बचपन से अपंग था। वह बच्चा आज मेधावी छात्र है और पूरे आत्मविश्वास के साथ जी रहा है। बच्चों के इतने करीब रहने के कारण मैंने कुछ किताबें भी लिखी हैं, जिनमें हौसले से भरी कविताएं और कहानियां शामिल हैं।

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