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नगा महिलाओं की समृद्धि का नेटवर्क

Thu, 09 Aug 2018 06:29 PM IST
मोनिषा बहल
मोनिषा बहल Updated Thu, 09 Aug 2018 06:29 PM IST
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monisha behal- who Weaving a Better Future for Naga Women
मोनिषा बहल - फोटो : अमर उजाला
पूर्वोत्तर भारत के नगालैंड राज्य में स्थित है फेक जिला। इसी जिले में मौजूद छोटे-से गांव शिजामी के बारे में देश के दूसरे हिस्से के अधिकतर लोग शर्तिया नहीं जानते होंगे। लेकिन राज्य की राजधानी कोहिमा में पढ़ाई करने वाले अनेक छात्र इस गांव के बारे में बहुत अच्छी तरह जानकारी रखते हैं। 
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पिछले एक दशक में इस गांव ने चुपचाप सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अपनी धाक जमाई है। इसी का नतीजा है कि कोहिमा से अनेक युवा यहां इंटर्नशिप के लिए लगातार आते रहते हैं। गांव की वर्तमान तस्वीर के पीछे सबसे बड़ा हाथ नॉर्थ ईस्ट नेटवर्क (नेन) का रहा है। 
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नब्बे के दशक में मैंने इस संस्था की स्थापना की थी। मैं महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता हूं। राज्य की महिलाओं का जीवन स्तर सुधारना ही नगालैंड में बसने की मेरी वजह रही है। 
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यहां आकर मैंने ध्यान दिया कि नगा समुदाय की महिलाओं को एकजुट कर पाने की पूरी संभावना है। इसी संभावित शक्ति के बल पर स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यावरण की दिशा में काम करना शुरू किया। 

उस वक्त राज्य की ये सबसे बड़ी जरूरतें थीं। दरअसल ये सारी बातें एक वर्कशॉप में सेनो सुहाह से हुई मेरी मुलाकात के बाद हुईं। सेनो पड़ोसी गांव के एक प्राथमिक विद्यालय की अध्यापिका थीं। सेनो से हुई मुलाकात शीघ्र ही नगालैंड के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने वाले नॉर्थ ईस्ट नेटवर्क की साझेदारी तक पहुंच गई। हम दोनों ने शिजामी गांव को सशक्त करने की दिशा में काम शुरू किया।

यह वही वक्त था, जब नगालैंड दशकों के संघर्ष से धीरे-धीरे उबर रहा था। युवाओं को अपनी संस्था से जोड़ पाना हमारी सबसे बड़ी चुनौती थी। हमने पहले तो स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण पर ही काम किया, मगर बाद में कौशल विकास कार्यक्रम को भी अपनी सूची में शामिल कर लिया। 

हमने कौशल विकास को स्थानीय पहचान से जोड़कर रखा। मसलन, बांस से बनने वाले उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण और जैविक खेती आदि। जल संरक्षण और तमाम तरह की अन्य सामाजिक गतिविधियों को भी हमने प्रमुखता से तवज्जो दी। लोगों, विशेषकर महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करना हमारी प्राथमिकताओं में शामिल रहा। 

हमारी बड़ी सफलताओं में गांव की महिलाओं को पुरुषों के समान दिहाड़ी मुहैया करवाना शामिल है। करीब आठ साल के संघर्ष के बाद 2014 में ग्राम पंचायत ने इस व्यवस्था के लिए हामी भरी। समाज में हाशिये की महिलाओं का जीवन स्तर सुधारने के लिए मैंने एक अन्य योजना पर भी काम किया। 

मैं चाहती थी कि यहां के लोगों को किसी एक काम पर आश्रित न रहना पड़े। समृद्ध नगा संस्कृति का प्रयोग करते हुए मैंने महिलाओं को बुनकरी करने का मंच दिया है। सात महिलाओं के साथ शुरू हुए इस प्रकल्प में आज तीन सौ से ज्यादा महिलाएं जुड़ चुकी हैं, जिनमें शिजामी के अतिरिक्त दस अलग-अलग गांवों की औरतें शामिल हैं। 

ये महिलाएं कई तरह के, स्टॉल, कुशन कवर, बेल्ट, बैग, मफलर, चटाइयां आदि बनाती हैं। उत्पादों को सही कीमतें मिलें, इसके लिए मैं इन्हें दिल्ली, कोलकाता, बेंगलूरू और मुंबई के दुकानदारों तक पहुंचाने का प्रबंध करती हूं। 


ये महिलाएं न सिर्फ अपने परिवारों की आर्थिक मदद कर रही हैं, बल्कि हमारी सलाह पर अपने समुदाय में स्वास्थ्य और पर्यावरण को लेकर जागरूकता भी फैला रही हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
 
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