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'मैं कोशिश करूंगी कि रायगढ़ के बाद दूसरे जिलों में भी खुले में शौच की प्रथा समाप्त हो'
मोनिका इजारदार
Updated Fri, 04 May 2018 04:25 PM IST
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मोनिका इजारदार
भूख की वजह से उस बूढ़ी औरत ने मेरी आंखों के सामने दम तोड़ा था। बाद में पता चला कि वह इसलिए भूखी थी, क्योंकि उसके पेट में संक्रमण था और इस कारण उसके शरीर में किसी भी प्रकार का पोषण नहीं पहुंच पा रहा था। संक्रमण की वजह थी- उसके आसपास का गंदा माहौल। वह जिस बिस्तर पर थी, वह उसके सोने, बैठने, खाने यहां तक नितकर्म करने की इकलौती जगह थी। सफाई का ध्यान नहीं रखा गया और बीमारी ने उसकी जान ले ली। स्वच्छता की दिशा में कुछ करने के लिए सिर्फ यही एक घटना नहीं थी, जिसने मुझे प्रेरित किया। इसके अलावा भी मैंने कई ऐसे किस्से सुन रखे थे, जो खुले में शौच करने वाली उन बच्चियों से जुड़े थे, जिनका बलात्कार किया जाता था।
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मैं छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से ताल्लुक रखती हूं। 2014 की बात है। मैं कॉलेज की पढ़ाई के पहले सेमेस्टर की परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। यह वही वक्त था, जब देश में एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ था। नई सरकार ने उसी वर्ष अपना महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया था। इसके तहत सरकार ने देशव्यापी प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए थे। अभियान के प्रति मेरी दिलचस्पी जगी और मैं उस प्रशिक्षण का हिस्सा बनी। बूढ़ी औरत वाली घटना प्रशिक्षण के दौरान घटी थी।
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मैंने उसी वक्त लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने की दिशा में काम करने का निश्चय कर लिया था। लोगों को स्वच्छता के फायदे और गंदगी के नुकसान गिनाना मेरा पहला कदम था। मैंने यह काम अपने दायरे में आने वाले हर परिवार तह पहुंच कर अंजाम दिया। उन्हें समझाया कि घर में एक साफ-सुथरा शौचालय किस हद तक जरूरी है। मेरी बात समझ चुके परिवारों को कम से कम पैसों में शौचालय की सुविधा प्रदान करना मेरे काम का अगला चरण रहा।
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दरअसल मैं चाहती थी कि लोग सरकार या किसी दूसरी संस्था पर जरूरत से ज्यादा आश्रित न रहें और इस काम का महत्व महसूस करते हुए खुद अपनी सामर्थ्य से शौचालय बनवा सकें, ताकि उन्हें स्वच्छता से जुड़ी आत्मप्रेरणा मिलती रहे। मेरे हिसाब से केवल शौचालय की गिनती बढ़ाने से ज्यादा जरूरी यही है।
किसी को समझाकर उसकी जिंदगी की वर्षों पुरानी आदत बदल पाना इतना असान काम नहीं होता। लोग इसी लंबे समय का हवाला देते हैं। कई बार तर्क, विवेक इतने ताकतवर नहीं ठहरते कि वे लोगों की सोच पर बढ़त बना सकें। ऐसी परिस्थितियों में मैंने कई बार टेढ़ी उंगली से घी निकाला यानी किसी तरह परिवार की महिलाओं को विश्वास में लिया और उन्होंने आदतों की जंजीरों में जकड़े अपने पतियों पर इज्जत के हथौड़े से प्रहार किया।
जंजीरें टूटती गईं, शौचालय बनते गए। धीरे-धीरे ही सही, मुझे सफलता मिलती गई। एक वक्त ऐसा आया कि मेरा ब्लॉक खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो गया। मगर यह मेरे काम का अंत नहीं, बल्कि एक शुरुआत भर थी। ब्लॉक के दायरे से निकलकर मैंने जिले की दर्जनों पंचायतों को खुले में शौच की शर्मनाक प्रथा से बाहर निकालने में अपना योगदान दिया। नतीजा यह निकला कि चार साल में वह जिला पूरी तरह ओडीएफ घोषित हो गया। इस दौरान मैंने तकरीबन डेढ़ हजार परिवारों के घरों में शौचालय बनाने में मदद की है। मेरा सफर खत्म नहीं हुआ है। मैं कोशिश करूंगी कि रायगढ़ के बाद दूसरे जिलों में भी खुले में शौच की प्रथा समाप्त हो।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
किसी को समझाकर उसकी जिंदगी की वर्षों पुरानी आदत बदल पाना इतना असान काम नहीं होता। लोग इसी लंबे समय का हवाला देते हैं। कई बार तर्क, विवेक इतने ताकतवर नहीं ठहरते कि वे लोगों की सोच पर बढ़त बना सकें। ऐसी परिस्थितियों में मैंने कई बार टेढ़ी उंगली से घी निकाला यानी किसी तरह परिवार की महिलाओं को विश्वास में लिया और उन्होंने आदतों की जंजीरों में जकड़े अपने पतियों पर इज्जत के हथौड़े से प्रहार किया।
जंजीरें टूटती गईं, शौचालय बनते गए। धीरे-धीरे ही सही, मुझे सफलता मिलती गई। एक वक्त ऐसा आया कि मेरा ब्लॉक खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो गया। मगर यह मेरे काम का अंत नहीं, बल्कि एक शुरुआत भर थी। ब्लॉक के दायरे से निकलकर मैंने जिले की दर्जनों पंचायतों को खुले में शौच की शर्मनाक प्रथा से बाहर निकालने में अपना योगदान दिया। नतीजा यह निकला कि चार साल में वह जिला पूरी तरह ओडीएफ घोषित हो गया। इस दौरान मैंने तकरीबन डेढ़ हजार परिवारों के घरों में शौचालय बनाने में मदद की है। मेरा सफर खत्म नहीं हुआ है। मैं कोशिश करूंगी कि रायगढ़ के बाद दूसरे जिलों में भी खुले में शौच की प्रथा समाप्त हो।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।