मीराबाई बुझा रहीं लोगों की प्यास, बच्चे बुलाते हैं पंप वाली बुआ
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मेरे पति ने मुझसे दूसरी शादी की थी। उनकी पहली पत्नी ने किसी कारणवश उनसे नाता तोड़ लिया था। मगर शादी के चार साल बाद ही मेरे पति की मौत हो गई। मेरी कोई संतान नहीं थी, सो मैंने बाकी जिंदगी मायके में अपने भाई के साथ बिताना ही मुनासिब समझा।
लेकिन राजस्थान की मरुभूमि में किसी आदिवासी परिवार के लिए जीवन कभी भी इतना आसान नहीं होता। मेरे परिवार के सामने भी अस्तित्व से जुड़ी कई चुनौतियां थीं। और इन्हीं चुनौतियों में एक मुश्किल पीने के पानी की भी थी। पानी का सबसे नजदीकी स्रोत घर से मीलों दूर था। हर रोज इस दूरी को पाटना, तमाम घरेलू जिम्मेदारियों के बीच महिलाओं का जरूरी क्रम होता था। नतीजतन पानी की समस्या मुझे इस कदर कचोटने लगी कि मैं हमेशा इसी की काट के बारे में सोचती।
दरअसल हमारे इलाके में कुछ हैंडपंप भी थे, लेकिन गर्मी आते ही वे जवाब दे जाते। इसका कारण कभी भूजल का स्तर होता, तो कभी पंप की मशीनी गड़बड़ी। मैंने सोचा कि क्यों न मैं हैंडपंप मैकेनिक बनकर इलाके की प्यास बुझाने में अपना योगदान दूं। किसी अधेड़ आदिवासी महिला के लिए यह सोचना भी हमारे समाज में उपहास का विषय हो सकता है, लेकिन मैंने इसकी परवाह नहीं की और अपनी सोच पर आगे बढ़ी।
मैंने गांव की दूसरी महिलाओं के सामने भी अपने साथ आने का प्रस्ताव रखा। लेकिन हैंडपंप मैकेनिक बनने के लिए सरकारी प्रशिक्षण लेने में किसी भी महिला ने रुचि नहीं दिखाई और मैं अकेले ही अपने रास्ते निकल पड़ी। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद मैं बहुत जल्द न सिर्फ अपने गांव में, बल्कि आसपास के कई गांवों में एक जाना-पहचाना नाम बन गई। कहीं भी सरकारी हैंडपंप खराब होता, तो लोग मुझे याद करते।
पानी की कमी से जिंदगी किस कदर प्रभावित होती है, इसका मैंने बहुत करीब से अनुभव किया है। इसलिए जब भी मैं अपने हाथों से कोई नल ठीक करती हूं और उसके बाद उस नल से निकले पानी के कारण लोगों की खुशियां देखती हूं, तो लगता है कि जीवन का बहुत बड़ा मकसद पूरा हो गया। मेरे काम के कारण बच्चे मुझे पंप वाली बुआ कहकर पुकारने लगे हैं। यह संबोधन कितनी राहत देने वाला हो सकता है, मैं बता नहीं सकती। यही कारण है कि अपने काम के प्रति मेरा जुनून, न तो किसी मौसम की फिक्र करता है और न ही मुश्किल रास्तों की।
हालांकि अपने नाजुक जनाना हाथों में रिंच-हथौड़ा लेकर पुरुषों से जुड़े इस व्यवसाय में उतरने पर कई लोगों ने मुझपर ताने मारे। लेकिन मैं इसके लिए पहले से तैयार थी। समाज को देखते हुए यह बहुत स्वाभाविक था। मेरे परिवार ने मुझे काम करने से कभी नहीं रोका। उनका यही समर्थन मेरे लिए सबसे जरूरी रहा। आज ताने मारने वाले लोग ही मेरी इज्जत करते हैं और मेरे काम में मदद भी करते हैं।
उदयपुर से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित मेरे गांव में कहने को तो बिजली पहुंच गई है, लेकिन उसका उपयोग साफ पानी के लिए अभी तक नहीं किया जा सका है। लोग दशकों से कुएं का ही पानी पीकर प्यास बुझाते रहे हैं। अब जाकर कुछ समय पहले सरकार ने हैंडपंप की व्यवस्था की है। मेरी मौजूदा उम्र बावन साल है और मिस्त्री बनकर मैं इन्हीं हैंडपंपों को जिंदा रखने की कोशिश में लगी हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।