74 की उम्र में तलवारबाजी सिखाती हैं ये महिला, सभी प्यार से बुलाते हैं Samurai अम्मा
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बचपन में मेरी फितरत बिल्कुल ऐसी नहीं थी कि मुझे उस वक्त तलवारबाज कहा जा सके। मैं न तो आक्रामक व्यवहार वाली थी और न ही मुझे जल्दी गुस्सा आता था। लेकिन मैं नृत्य का नियमित अभ्यास करती थी और नृत्य में बनावटी ही सही, पर मुझे कई प्रकार की भाव-भंगिमाओं का प्रदर्शन करना होता था।
एक दिन नृत्य अभ्यास करते हुए मेरे शिक्षक ने मेरे अभिभावकों को सलाह दी कि शरीर में और लचीलापन लाने के लिए वे मुझे कलारीपयट्टू (तलवार आधारित प्राचीन दक्षिण भारतीय मार्शल आर्ट्स विधा) भी सिखाएं। यह वही कला है, जो बारूद और अन्य परिष्कृत हथियारों के आविष्कार से पहले प्राचीन युद्धों में इस्तेमाल की जाती थी। यह 17वीं सदी में तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था में शामिल थी। लगभग 10-12 वर्ष की उम्र में मैंने नृत्य छोड़ दिया और केवल कलारी का अभ्यास करने लगी।
मुझे यह अभ्यास पसंद आने लगा, इसलिए मैंने इसे जारी रखा। हालांकि नृत्य के मुकाबले यह एक मुश्किल काम था। चूंकि मुझे परिवार का समर्थन प्राप्त था, सो धीरे-धीरे ही सही, मैं कलारी में पारंगत होने लगी। केरल के अपने गृहनगर वटकरा में दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद मैंने सिलाई का कोर्स किया। सत्तरह साल की उम्र में मैंने राघवन गुरुकल से शादी की, जोकि मेरे गुरु थे और मेरी कलारी संस्था के संस्थापक भी बने।
मैंने प्रेम विवाह नहीं किया था और न ही गुरु-शिष्य रिश्ते की पवित्रता भंग की। दरअसल मेरे पिता को लगता था कि मैं राघवन के साथ रहकर कलारी के क्षेत्र में ज्यादा अच्छा कर सकती हूं। क्योंकि उन दिनों लड़कियों का खेलों में भाग लेना लगभग वर्जित था, शादी के बाद के बाद तो कोई तर्क ही नहीं चल सकता था। कलारी सीखने का कोई अंत नहीं है, पर अपने अब तक के सफर में मैंने इसके आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और कलात्मक प्रभाव को भी जाना है।
लगभग छह दशकों के सफर में मैंने एक गृहिणी की भूमिका निभाते हुए तलवार चलाई है। मेरे पति कलारी सिखाने की एक संस्था के प्रमुख थे और मैं उनकी सहयोगी। आठ साल पहले उनकी मौत के बाद मैं उनके स्थान पर गुरुकल (संस्था प्रमुख) बन गई। भले ही उस वक्त मेरी उम्र छियासठ साल की थी, पर अपने पति की भूमिका निभाते हुए मैंने बच्चों को कलारी सिखाना शुरू कर दिया। मेरी चार संतानें और नाती-पोते हैं। मेरे सभी बच्चे कलारी का अभ्यास करते हैं। जून से सितंबर के मध्य कलारी के प्रशिक्षण और प्रदर्शन का मुख्य सत्र होता है।
मुझे खुशी है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी मेरी सभी कक्षाएं हाउस फुल चलती हैं। मैंने अपने कौशल को बच्चों, खासकर लड़कियों में हस्तारंतित करने की कोशिश करती हूं। क्योंकि कलारी केवल खेल नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का बेहतरीन हथियार है।
वर्तमान में मैं चौहत्तर साल की हूं और लगातार कलारी का अभ्यास कर रही हूं। मैं खुद को एक मजबूत महिला मानती हूं, जिसके भीतर आगे बढ़कर किसी भी चुनौती का सामना करने की कूवत है। मेरे आत्मविश्वास के पीछे मेरे सहायक बच्चे हैं। आज मुझे लोग समुराई अम्मा के नाम से जानते हैं। मैं देश में इस प्रकार के प्राचीन खेलों के भविष्य के बारे में आशावादी हूं। भगवान और कलारी की कृपा से मैं अब भी स्वस्थ हूं और मैं ऐसे ही रहने की प्रार्थना करती हूं, ताकि और अधिक छात्रों को प्रशिक्षित कर सकूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।