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झुग्गियों से निकले हैं सैकड़ों होनहार
भान सिंह जस्सी
Updated Fri, 10 Aug 2018 03:12 PM IST
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भान सिंह जस्सी
- फोटो : अमर उजाला
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जिन पांच बच्चों ने बारहवीं की परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनमें राहुल भी शामिल है। राहुल एक दिहाड़ी मजूदर का बेटा है और उसे इस बार 88 फीसदी अंक मिले हैं। यह झुग्गियों में रहने वाले उन बच्चों के बीच एक कीर्तिमान है, जो कुछ वर्ष पहले तक स्कूल जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।
अट्ठारह साल के कार्तिक की सफलता की कहानी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, जिसने हाल ही में बीसीए की पढ़ाई पूरी करके आगे की पढ़ाई के लिए मास्टर्स में प्रवेश लिया है। ये बच्चे पटियाला के तफजलपुरा इलाके के हैं। पंजाब के अलग-अलग इलाकों की झुग्गी-झोपड़ियों से आने वाले इन बच्चों के सपनों को पंख देने का काम मैंने 2003 में शुरू किया था।
मैं उस वक्त अपने गृहनगर संगरूर के शेरपुर में विद्युत विभाग के लाइनमैन के तौर पर काम कर रहा था। मैं अपने दोनों बच्चों को हर दिन स्कूल बस तक छोड़ने जाता था। इस दिनचर्या में मैं हर दिन पास की मलिन बस्ती में रहने वाले बच्चों को भी देखता था। नंगे पांव, गंदे और अपर्याप्त कपड़ों में कचरा बीनने वालों के हालात हर दिन मेरा ध्यान आकर्षित करते।
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मेरे मन में कई बार खयाल आता कि काश ये बच्चे भी कचरा बीनने के बजाय मेरे बच्चों के साथ स्कूल जाते! आखिरकार मुझसे रहा नहीं गया। एक दिन मैं उन बच्चों की बस्ती में गया और वहां रहने वाले लोगों से पूछा कि आप लोग अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हैं? उन लोगों ने बड़ी सहजता से जवाब दिया कि पढ़ाई-लिखाई उनके बच्चों के भाग्य की बात नहीं है।
उनकी किस्मत में तो कूड़ा बीनना ही लिखा है। उनकी प्रतिक्रिया से मुझे दुख तो हुआ, पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैंने हिम्मत नहीं हारी और उन बच्चों से घुलने-मिलने की कोशिश करने लगा। एक हफ्ते तक मैं हर दिन उनके लिए टॉफियां लेकर गया। जब हमारी दोस्ती हो गई, तो
मैंने उन बच्चों को बहुत प्यार से शाम को एक जगह पर पढ़ने के लिए राजी करा लिया।
मुझे पता था कि उन बच्चों को सीधे स्कूल में दाखिला करा देना कोई समाधान नहीं है, जब तक उनमें पढ़ाई के प्रति अभिरुचि न पैदा हो जाए। मैंने यही काम किया। हर शाम उन्हें पढ़ाने लगा और कुछ समय बाद उन्हें पास के सरकारी स्कूल तक पहुंचा दिया। मैंने उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च भी उठाया।
इस तरह खुद पढ़ाकर मैंने अपने पहले शिक्षा केंद्र की शुरुआत की थी, जिसकी संख्या आगे चलकर छह केंद्रों तक पहुंच गई। ये सारे केंद्र चार जिलों के अलग-अलग स्थानों में है। आज मेरे पहले केंद्र में 125 बच्चे पढ़ रहे हैं। सभी केंद्रों में कुल बीस अल्पकालिक शिक्षकों के सौजन्य से करीब एक हजार बच्चों को निःशुल्क पढ़ाया जा रहा है। हम इन्हें बुनियादी शिक्षा देते हैं और इनकी आगे की पढ़ाई की भी व्यवस्था करते हैं।
मुझे कुछ आप्रवासी भारतीयों समेत अनेक दानदाताओं का स्नेह मिलता रहता है, जिसकी मदद से मैं इन बच्चों के लिए नियमित जूते-चप्पल, स्कूल बैग, किताबें, स्टेशनरी और कपड़ों आदि की व्यवस्था करता रहता हूं। कभी झुग्गियों में रहने वाले बच्चों के लिए पहली कक्षा पास करना पाना मुश्किल हुआ करता था, पर आज वही बच्चे डिग्रियां हासिल कर रहे हैं।
मुझे खुशी है कि उन बच्चों के लिए काम कर रहा हूं, जिनके मोहल्ले में घुसते ही लोग अपनी नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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अट्ठारह साल के कार्तिक की सफलता की कहानी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, जिसने हाल ही में बीसीए की पढ़ाई पूरी करके आगे की पढ़ाई के लिए मास्टर्स में प्रवेश लिया है। ये बच्चे पटियाला के तफजलपुरा इलाके के हैं। पंजाब के अलग-अलग इलाकों की झुग्गी-झोपड़ियों से आने वाले इन बच्चों के सपनों को पंख देने का काम मैंने 2003 में शुरू किया था।
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मैं उस वक्त अपने गृहनगर संगरूर के शेरपुर में विद्युत विभाग के लाइनमैन के तौर पर काम कर रहा था। मैं अपने दोनों बच्चों को हर दिन स्कूल बस तक छोड़ने जाता था। इस दिनचर्या में मैं हर दिन पास की मलिन बस्ती में रहने वाले बच्चों को भी देखता था। नंगे पांव, गंदे और अपर्याप्त कपड़ों में कचरा बीनने वालों के हालात हर दिन मेरा ध्यान आकर्षित करते।
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मेरे मन में कई बार खयाल आता कि काश ये बच्चे भी कचरा बीनने के बजाय मेरे बच्चों के साथ स्कूल जाते! आखिरकार मुझसे रहा नहीं गया। एक दिन मैं उन बच्चों की बस्ती में गया और वहां रहने वाले लोगों से पूछा कि आप लोग अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हैं? उन लोगों ने बड़ी सहजता से जवाब दिया कि पढ़ाई-लिखाई उनके बच्चों के भाग्य की बात नहीं है।
उनकी किस्मत में तो कूड़ा बीनना ही लिखा है। उनकी प्रतिक्रिया से मुझे दुख तो हुआ, पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। मैंने हिम्मत नहीं हारी और उन बच्चों से घुलने-मिलने की कोशिश करने लगा। एक हफ्ते तक मैं हर दिन उनके लिए टॉफियां लेकर गया। जब हमारी दोस्ती हो गई, तो
मैंने उन बच्चों को बहुत प्यार से शाम को एक जगह पर पढ़ने के लिए राजी करा लिया।
मुझे पता था कि उन बच्चों को सीधे स्कूल में दाखिला करा देना कोई समाधान नहीं है, जब तक उनमें पढ़ाई के प्रति अभिरुचि न पैदा हो जाए। मैंने यही काम किया। हर शाम उन्हें पढ़ाने लगा और कुछ समय बाद उन्हें पास के सरकारी स्कूल तक पहुंचा दिया। मैंने उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च भी उठाया।
इस तरह खुद पढ़ाकर मैंने अपने पहले शिक्षा केंद्र की शुरुआत की थी, जिसकी संख्या आगे चलकर छह केंद्रों तक पहुंच गई। ये सारे केंद्र चार जिलों के अलग-अलग स्थानों में है। आज मेरे पहले केंद्र में 125 बच्चे पढ़ रहे हैं। सभी केंद्रों में कुल बीस अल्पकालिक शिक्षकों के सौजन्य से करीब एक हजार बच्चों को निःशुल्क पढ़ाया जा रहा है। हम इन्हें बुनियादी शिक्षा देते हैं और इनकी आगे की पढ़ाई की भी व्यवस्था करते हैं।
मुझे कुछ आप्रवासी भारतीयों समेत अनेक दानदाताओं का स्नेह मिलता रहता है, जिसकी मदद से मैं इन बच्चों के लिए नियमित जूते-चप्पल, स्कूल बैग, किताबें, स्टेशनरी और कपड़ों आदि की व्यवस्था करता रहता हूं। कभी झुग्गियों में रहने वाले बच्चों के लिए पहली कक्षा पास करना पाना मुश्किल हुआ करता था, पर आज वही बच्चे डिग्रियां हासिल कर रहे हैं।
मुझे खुशी है कि उन बच्चों के लिए काम कर रहा हूं, जिनके मोहल्ले में घुसते ही लोग अपनी नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।