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'मैं चाहती हूं कि देश का प्रत्येक बच्चा नशे की बुराई से दूर रहे'

Tue, 29 May 2018 04:32 PM IST
कुमुद मिश्रा
कुमुद मिश्रा Updated Tue, 29 May 2018 04:32 PM IST
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Kumud Mishra- professor of physics in Mumbai work Against drugs
Kumud Mishra

मैं मुंबई के एक कॉलेज में भौतिकी विषय की शिक्षिका हूं। मेरे मन में हमेशा से ही वंचित गरीब बच्चों के लिए अलग तरह का भाव रहा है। हाल में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें दस साल के आसपास का एक बच्चा नशे के आगे अपने समर्पण की कहानी खुशी-खुशी बयान कर रहा था।

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कई लोगों ने उस बच्चे के संवादों को मजाक के तौर पर लिया। लेकिन मेरे लिए ऐसे बच्चे को देखना बहुत पीड़ादायी होता है। वंचित गरीब बच्चों के प्रति इन्हीं संवेदनाओं के चलते मैंने अपने इलाके के गरीब और आदिवासी बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया। इस काम के लिए सबसे पहले मैंने उन बच्चों को चिह्नित किया, जो कूड़ा बीनते थे। लेकिन उन बच्चों से संपर्क कर पाना बहुत मुश्किल होता था, क्योंकि न सिर्फ वे, बल्कि उनके परिवार भी एक जगह से दूसरी जगह ठिकाना बदलते रहते थे।
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ऐसे बच्चों के लिए कुछ करने के उद्देश्य से मैं एक ऐसे इलाके में पहुंची, जो आदिवासी बहुल था। मैंने वहां कई दिनों तक लगातार दौरा किया। अपने सर्वेक्षण के आधार पर मैंने कुल चालीस बच्चों की पहचान की, जो स्कूल नहीं जाते थे, जबकि उस इलाके में दो स्कूल मौजूद थे। कुछ भी रातोंरात बदलने वाला नहीं था, इसलिए मैं कोई जल्दबाजी में नहीं थी। मैंने वक्त लिया और करीब सात महीनों तक लोगों से बातचीत जारी रखी।
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स्थानीय बाशिंदों से घुलने-मिलने का फायदा यह हुआ कि लोगों का मुझमें भरोसा पैदा हुआ और मुझे भी यह समझने में आसानी हुई कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजना आखिर क्यों नहीं चाहते। अपने अनुभवों के आधार पर जब मैंने उनके बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, तो मेरा तरीका थोड़ा अलग रहा। मैंने बच्चों को स्लेट और चॉक देकर उनसे आजादी दी कि वे स्लेट पर अपने मुताबिक कुछ भी लिखें। मुझे पता था कि इन बच्चों में अधिकांश नशा करते हैं, इसलिए शुरू में मैंने उन्हें भाषायी वर्णमाला सिखाने के बजाय अच्छी आदतों से परिचय कराया।

Kumud Mishra- professor of physics in Mumbai work Against drugs

इसी तरह लगभग छह महीनों तक उनके साथ मेहनत करने के बाद आखिरकार मैंने उन्हें म्यूनिसिपल स्कूल में पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर ली। उनके साथ मेरा काम कुछ ऐसा रहा कि दस साल के बच्चे को दूसरी कक्षा में पढ़ाई करने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई, जबकि अमूमन बच्चे अपनी उम्र के हिसाब की कक्षा में पढ़ना पसंद करते हैं। स्कूल भेजने के बावजूद उनको सिखाने का मेरा काम जारी रहा।

इसके अतिरिक्त मैंने उस इलाके में कई ऐसी दुकानों की शिकायत पुलिस से की, जो गैरकानूनी तरीके से मादक पदार्थ बेचती थीं। नतीजतन बच्चों में नशा करने की दर भी कम हो गई। हालांकि इस काम में मुझे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। दुकानदारों ने मुझे कई तरह से धमकी दी। साथ ही स्थानीय लोगों ने भी इस मामले में मेरी अपेक्षित मदद नहीं की।

मगर मैं इन चीजों से घबराई नहीं। आज की तारीख में मैं अपनी विशेष कक्षाओं के तीन सत्र चलाती हूं। पहले सत्र में तीन साल तक के बच्चे, दूसरे में उनसे बड़े बच्चे तथा तीसरे सत्र में दसवीं-बारहवीं के बच्चों की मैं पढ़ाई में मदद करती हूं। इस तरह मेरे संपर्क में कुल दो सौ बच्चे हैं। यही नहीं, मुझे देखकर दो अन्य युवतियों ने भी कुछ ऐसा ही काम अलग-अलग इलाकों में शुरू किया है। मुझे यह देखकर बहुत खुशी होती है। मैं चाहती हूं कि देश का प्रत्येक बच्चा नशे की बुराई से दूर रहे।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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