'जानवरों की प्यास ने मुझे तालाब खोदने की दी प्रेरणा'
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परेशान दिख रहे थे, जबकि उन्हें आसपास के इंसानों से कोई विशेष दिक्कत नहीं थी। दरअसल इलाके में पानी की कमी ही उनकी चिंता थी। पहाड़ी पर उनके जल-स्त्रोत लगातार
सिमटते जा रहे थे। उसी वक्त मुझे एहसास हो गया था कि मेरे गांव की बगल में स्थित उस बंजर कुंडिनिबेटा पहाड़ी में पानी की समस्या आने वाले वक्त में हमारे गांव की भी होने वाली है। मैंने सोचा कि क्यों न इन तमाम जानवरों का अस्तित्व बचाए रखने के लिए एक तालाब खोदा जाए। उस दिन से लेकर आज तक मैंने कुल चौदह तालाबों का निर्माण कराया है। इस काम में मैंने कम से कम पंद्रह लाख रुपये खर्च किए हैं। मैंने इन तालाबों के नाम अपने नाती-पोतों के नाम पर रखे हैं।
मैं कर्नाटक के मांड्या जिले मलावली तालुक में रहता हूं। जब मैंने तालाब खोदने शुरू किए थे, तब गांव वालों और मेरे नातेदारों ने भी मुझे पागल करार दिया था। कुछ लोगों ने मेरा
मजाक तो बनाया ही, साथ ही सरकारी जमीन का इस्तेमाल करने के लिए मुझे दूसरे तरीकों से रोकने की भी कोशिश की। दरअसल बारिश के वक्त पहाड़ियों से गिरने वाला पानी या तो जमीन के भीतर चला जाता था, या तो कहीं भी इकट्ठा होकर वाष्पीकृत हो जाता।
भौगोलिक स्थिति के कारण पानी को किसी व्यवस्थित तालाब तक पहुंचा पाना आसान काम नहीं था। तालाब बनाने के लिए जरूरी था, इसके डिजाइन और दूसरे तकनीकी पहलू का ज्ञान। इसके लिए मैंने पहाड़ी पर संघर्ष कर रहे जानवरों और पक्षियों का सूक्ष्म अवलोकन किया। उसके बाद मैं हर सुबह पांच बजे से नौ बजे तक अकेले ही तालाब खोदने में जुट गया। नौ बजे से देर शाम तक मैं अपनी भेड़ें चराता। पहाड़ी पर तालाब खोदने के लिए कभी-कभार मैं रात में लालटेन लेकर भी जाता, तो कई दफे चांदनी रातों का भी लाभ उठाया।
शायद यही वजह है कि गांव वालों को पक्का यकीन हो गया था कि मैं पागल हो गया हूं। जिंदगीभर की बचत इस काम में खपाने के बाद मैं धीरे-धीरे अपने रिश्तेदारों को भी खोने लगा। लेकिन इन नकली रिश्तेदारों को खोने का मुझे कोई गम नहीं था, क्योंकि मेरे नए रिश्तेदार मुझसे जुड़ने लगे थे और वे थे पेड़-पौधे तथा पशु-पक्षी, जिनकी खातिर मैं तालाब खोद रहा था। लंबे समय तक एक ही काम करने का मुझे फायदा हुआ। मुझे अनुभव हो गया कि खुदाई किस जगह करनी है।
मैं जहां भी खुदाई करता, वहां यकीनी तौर पर भू-जल स्तर ऊपर होता, जिससे तालाब के जिंदा रहने की संभावना बढ़ जाती। इन चालीस वर्षों में तालाब की जरूरतों के लिए मैंने अपनी कई भेड़ें बेची हैं। रुक-रुककर धन एकत्रित करके अगला तालाब खोदा। सबसे खास बात यह है कि सभी तालाबों को आपस में जोड़ा भी, ताकि किसी तालाब में पानी कम या ज्यादा न रहे।
जिस तरह हर दिन शरीर के लिए भोजन की जरूरत होती है, मेरे लिए अपने तालाबों को देखना भी कुछ वैसा ही है। कुछ वक्त पहले ही मेरी आंखों का ऑपरेशन हुआ है। संक्रमण से
बचने के लिए डॉक्टरों ने मुझे बाहर जाने से मना किया है। मैं फिर भी आंखें बंद करके बाहर जाता हूं, क्योंकि मुझे अपने तालाबों के एक-एक इंच का अंदाजा है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।