{"_id":"5a91234b4f1c1b0a7b8b8e3a","slug":"inspirational-story-of-a-hiv-infected-lady-who-is-helping-others-infected-people","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"अपनी जैसी एचआईवी संक्रमित औरतों की मदद","category":{"title":"Bashindey","title_hn":"बाशिंदे ","slug":"bashindey"}}
अपनी जैसी एचआईवी संक्रमित औरतों की मदद
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
Updated Sat, 24 Feb 2018 02:03 PM IST
विज्ञापन
कौशल्या पेरियासामी
उन्नीस बरस की उम्र में मेरी शादी हो गई। शादी के पैंतालीस दिनों बाद मैं बीमार हो गई। मुझे डॉक्टर के पास ले जाया गया, तो डॉक्टर ने जिस बीमारी का नाम लिया, उससे मेरे ससुराल वालों के होश उड़ गए। मैं अपने पति के संक्रमण से एचआईवी पॉजिटिव हो चुकी थी।
मेरे पति और उसके परिवार ने शादी से पहले किसी को इस बीमारी के बारे में कुछ नहीं बताया था और इसी धोखे ने मुझे एचआईवी संक्रमण से ज्यादा परेशान किया। चंद महीनों के भीतर ही मेरे पति की एड्स की वजह से मृत्यु हो गई। मैं बीस साल की उम्र में ही विधवा हो चुकी थी।
मेरे साथ इससे भी बुरा तब हुआ, जब ससुराल वालों ने संपत्ति पर हक की आशंका में मुझे अपने घर से भी निकाल दिया। मैं तमिलनाडु के नमक्कल से ताल्लुक रखती हूं। एचआईवी की दहशत के बीच विधवा होने का दंश, ऐसी जिंदगी जीना भला कौन पसंद करेगा!
विज्ञापन
तमाम नकारात्मकता के बीच मैंने खुद को संभालते हुए तय किया कि मैं हार मानकर बैठने के बजाय दुनिया के सामने अपनी आवाज उठाऊंगी। मेरी लड़ाई की पहली जरूरत यह थी कि मैं एचआईवी संक्रमित होने की पहचान सार्वजनिक करूं। भारत में नब्बे के दशक में किसी महिला के लिए यह काम इतना आसान नहीं था।
इस बीमारी के बारे में जागरूकता बेहद कम, जबकि अफवाहें चरम पर थीं। संभवतः मैं उस वक्त देश की पहिला महिला थी, जिसने अपने एचआईवी संक्रमण की पहचान सार्वजनिक की। मेरा यह साहस राष्ट्रीय सुर्खियों में शामिल हुआ, जिसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मैंने ससुराल की संपत्ति में अपना हक हासिल करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी, ससुराल वालों को अदालत तक ले गई। व्यक्तिगत मुद्दों के बाद मेरी नजर एचआईवी संक्रमित व्यक्तिओं, विशेषकर महिलाओं की सामाजिक स्थिति बेहतर करने पर गई।
विज्ञापन
मेरे पति और उसके परिवार ने शादी से पहले किसी को इस बीमारी के बारे में कुछ नहीं बताया था और इसी धोखे ने मुझे एचआईवी संक्रमण से ज्यादा परेशान किया। चंद महीनों के भीतर ही मेरे पति की एड्स की वजह से मृत्यु हो गई। मैं बीस साल की उम्र में ही विधवा हो चुकी थी।
विज्ञापन
मेरे साथ इससे भी बुरा तब हुआ, जब ससुराल वालों ने संपत्ति पर हक की आशंका में मुझे अपने घर से भी निकाल दिया। मैं तमिलनाडु के नमक्कल से ताल्लुक रखती हूं। एचआईवी की दहशत के बीच विधवा होने का दंश, ऐसी जिंदगी जीना भला कौन पसंद करेगा!
विज्ञापन
तमाम नकारात्मकता के बीच मैंने खुद को संभालते हुए तय किया कि मैं हार मानकर बैठने के बजाय दुनिया के सामने अपनी आवाज उठाऊंगी। मेरी लड़ाई की पहली जरूरत यह थी कि मैं एचआईवी संक्रमित होने की पहचान सार्वजनिक करूं। भारत में नब्बे के दशक में किसी महिला के लिए यह काम इतना आसान नहीं था।
इस बीमारी के बारे में जागरूकता बेहद कम, जबकि अफवाहें चरम पर थीं। संभवतः मैं उस वक्त देश की पहिला महिला थी, जिसने अपने एचआईवी संक्रमण की पहचान सार्वजनिक की। मेरा यह साहस राष्ट्रीय सुर्खियों में शामिल हुआ, जिसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मैंने ससुराल की संपत्ति में अपना हक हासिल करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी, ससुराल वालों को अदालत तक ले गई। व्यक्तिगत मुद्दों के बाद मेरी नजर एचआईवी संक्रमित व्यक्तिओं, विशेषकर महिलाओं की सामाजिक स्थिति बेहतर करने पर गई।
Trending Videos
दरअसल उस दौर में इस संक्रमण के बारे में जागरूकता न के बराबर थी। सरकार ने भी एचआईवी से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत की ही थी। बेहद कम लोगों को एचआईवी पॉजिटिव लोगों और उनके लिए जरूरी एआरवी थेरेपी के बारे में ज्ञात था। महिलाओं के मामले में यह संख्या लगभग शून्य थी।
इस संक्रमण के बारे में बचाव की जानकारी तो प्रसारित हो रही थी, लेकिन संक्रमित व्यक्ति के इलाज और देखभाल की चर्चा कहीं नहीं दिखती थी। अगर कोई एचआईवी पॉजिटिव है, तो वह कहां जाए, क्या करे, उसे कुछ नहीं पता होता था।
इन्हीं समस्याओं के मद्देनजर मैंने एक ऐसा नजरिया विकसित करने का फैसला किया, जो एचआईवी संक्रमित महिलाओं की मदद कर सके। इसके लिए मैं अपने जैसी कई महिलाओं से मिली। विशेषज्ञों और डॉक्टरों की सलाह ली।
इस मेहनत के बाद मैंने 1998 में चार संस्थापक महिलाओं का एक छोटा-सा समूह बनाया, जिसका नाम रखा पॉजिटिव वीमेन नेटवर्क। तब से आज तक करीब बीस वर्षों के सफर में मेरा समूह हर दिन विस्तृत होता गया। मैंने अनुभव किया है कि सही सूचना की मदद से किसी भी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति की जिंदगी में खुशियां भरी जा सकती हैं।
हम न सिर्फ उन्हें सही सूचना मुहैया कराते हैं, बल्कि उनके रोजगार के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण, ऋण आदि की भी व्यवस्था करते हैं। हमारे समूह की विभिन्न सेवाओं ने अब तक देश भर के तेरह राज्यों की तीस हजार से ज्यादा एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं की जिंदगी में सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करने में मदद की है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
इस संक्रमण के बारे में बचाव की जानकारी तो प्रसारित हो रही थी, लेकिन संक्रमित व्यक्ति के इलाज और देखभाल की चर्चा कहीं नहीं दिखती थी। अगर कोई एचआईवी पॉजिटिव है, तो वह कहां जाए, क्या करे, उसे कुछ नहीं पता होता था।
इन्हीं समस्याओं के मद्देनजर मैंने एक ऐसा नजरिया विकसित करने का फैसला किया, जो एचआईवी संक्रमित महिलाओं की मदद कर सके। इसके लिए मैं अपने जैसी कई महिलाओं से मिली। विशेषज्ञों और डॉक्टरों की सलाह ली।
इस मेहनत के बाद मैंने 1998 में चार संस्थापक महिलाओं का एक छोटा-सा समूह बनाया, जिसका नाम रखा पॉजिटिव वीमेन नेटवर्क। तब से आज तक करीब बीस वर्षों के सफर में मेरा समूह हर दिन विस्तृत होता गया। मैंने अनुभव किया है कि सही सूचना की मदद से किसी भी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति की जिंदगी में खुशियां भरी जा सकती हैं।
हम न सिर्फ उन्हें सही सूचना मुहैया कराते हैं, बल्कि उनके रोजगार के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण, ऋण आदि की भी व्यवस्था करते हैं। हमारे समूह की विभिन्न सेवाओं ने अब तक देश भर के तेरह राज्यों की तीस हजार से ज्यादा एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं की जिंदगी में सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करने में मदद की है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।