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हजारों परिंदों का पेट भरना ही मेरा आनंद है: जोसेफ सेकर
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 06 Feb 2018 03:22 PM IST
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वर्षों पहले सुनामी ने जब तांडव मचाया था, तब दक्षिण भारत के तटवर्ती शहरों में केवल इंसान ही नहीं, बल्कि दूसरे प्राणियों की जिंदगी पर भी उसका गहरा असर पड़ा था। इंसानों ने तो इतनी तरक्की कर ली है कि वे अपनी जिंदगी बहुत जल्द वापस पटरी पर ला सकते हैं।
लेकिन पशु-पक्षी क्या करें! देश के दूसरे हिस्सों के नागरिकों और सरकार ने भी सुनामी से प्रभावित लोगों के पुनर्वास में योगदान दिया। लेकिन उन बेजुबान परिंदों का क्या, जिनकी न तो सरकार है और न ही देश के दूसरे हिस्से में कोई चिंता करने वाला। तूफान ने पक्षियों की बसी-बसाई जिंदगी उजाड़ कर रख दी थी।
इंसानों की तरह कई पक्षियों ने भी उस भीषण तूफान में प्राण गंवाए थे। मगर असल दिक्कत तो उनके लिए थी, जो उस भयंकर आपदा में जिंदा बच गए थे। न उनका घर बचा और न ही पेट भरने का कोई जरिया। उस तबाही के बाद अपनी छत पर बैठकर मैंने न जाने कितने परिंदों को भूख से जूझते और तड़पकर मरते देखा था।
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मैं तिरसठ वर्षीय एक कैमरा मैकेनिक हूं और चेन्नई में रहता हूं। डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से मैं अपनी छत पर परिंदों का पेट भरने की व्यवस्था करता हूं। सुनामी के बाद से लगातार जारी इस सफर की इब्तिदा चावल के चंद दानों से हुई थी।
लेकिन बहुत जल्द आश्चर्यजनक तरीके से मेरी छत पर पंछियों की तादाद बढ़ने लगी, जिनके लिए चावल के दाने कम पड़ने लगे। मैं सुनामी के प्रभाव और परिंदों की बेबसी शीघ्र ही समझ गया था। फिर क्या था, मैंने इस काम को एक नई जिम्मेदारी के तौर पर स्वीकार किया।
मैंने तय किया कि मेरी छत पर आने वाला कोई भी पक्षी भूखा नहीं रहेगा, भले ही उसके लिए मुझे कितना भी धन क्यों न खर्च करना पड़े। मैंने नियमित तौर पर लकड़ी के पात्रों में पके चावल रखना जारी रखा। समय के साथ पक्षियों की तादाद बढ़ी, तो मैंने चावल की मात्रा भी बढ़ा दी।
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लेकिन पशु-पक्षी क्या करें! देश के दूसरे हिस्सों के नागरिकों और सरकार ने भी सुनामी से प्रभावित लोगों के पुनर्वास में योगदान दिया। लेकिन उन बेजुबान परिंदों का क्या, जिनकी न तो सरकार है और न ही देश के दूसरे हिस्से में कोई चिंता करने वाला। तूफान ने पक्षियों की बसी-बसाई जिंदगी उजाड़ कर रख दी थी।
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इंसानों की तरह कई पक्षियों ने भी उस भीषण तूफान में प्राण गंवाए थे। मगर असल दिक्कत तो उनके लिए थी, जो उस भयंकर आपदा में जिंदा बच गए थे। न उनका घर बचा और न ही पेट भरने का कोई जरिया। उस तबाही के बाद अपनी छत पर बैठकर मैंने न जाने कितने परिंदों को भूख से जूझते और तड़पकर मरते देखा था।
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मैं तिरसठ वर्षीय एक कैमरा मैकेनिक हूं और चेन्नई में रहता हूं। डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से मैं अपनी छत पर परिंदों का पेट भरने की व्यवस्था करता हूं। सुनामी के बाद से लगातार जारी इस सफर की इब्तिदा चावल के चंद दानों से हुई थी।
लेकिन बहुत जल्द आश्चर्यजनक तरीके से मेरी छत पर पंछियों की तादाद बढ़ने लगी, जिनके लिए चावल के दाने कम पड़ने लगे। मैं सुनामी के प्रभाव और परिंदों की बेबसी शीघ्र ही समझ गया था। फिर क्या था, मैंने इस काम को एक नई जिम्मेदारी के तौर पर स्वीकार किया।
मैंने तय किया कि मेरी छत पर आने वाला कोई भी पक्षी भूखा नहीं रहेगा, भले ही उसके लिए मुझे कितना भी धन क्यों न खर्च करना पड़े। मैंने नियमित तौर पर लकड़ी के पात्रों में पके चावल रखना जारी रखा। समय के साथ पक्षियों की तादाद बढ़ी, तो मैंने चावल की मात्रा भी बढ़ा दी।
इस तरह से उन परिंदों के साथ मेरा एक अलग ही रिश्ता बन गया। उनको चावल का दाना चुगते देखना मेरे लिए सुख और आनंद की एक नई परिभाषा बन गया। इस पूरे क्रम को धार मिली 2015 में, जब एक बार फिर चेन्नई पर कुदरत ने अपना कहर बरपाया।
इस बार बाढ़ की वजह से कई दूसरे पक्षियों की जिंदगी प्रभावित हुई। और बिना किसी आमंत्रण के बाढ़ के बाद मेरी छत पर परिंदों की आवक में बढ़ोतरी हो गई। शायद इसके पीछे की वजह पुराने नियमित और नए पक्षियों के बीच किसी प्राकृतिक संवाद की भूमिका रही हो। लेकिन नए मेहमान मेरे लिए और ज्यादा खुशी लेकर आए।
मैं हर सुबह अपनी छत साफ करता हूं, उनके लिए चावल पकाता हूं। और उनके द्वारा दाना चुगने के बाद दोबारा छत साफ करता हूं। मैं उन्हें दूसरी चीजें भी खिला सकता हूं, लेकिन मेरा अपना अनुभव है कि पके चावल खाना उनके लिए तुलनात्मक रूप से आसान है।
मेरी छत का क्षेत्रफल इतना है कि कुल तीन हजार पक्षी एक साथ दाना चुग सकते हैं, लेकिन मेरा अनुमान है कि इनकी तादाद इससे ज्यादा ही रहती है। मैं हर रोज करीब तीस किलो चावल पक्षियों को खिलाता हूं, जिसके लिए मेरी आमदनी के आधे हिस्से की जरूरत होती है। अपने इन बेजुबान दोस्तों के भोजन के लिए मैं हमेशा दस दिन का भंडार अग्रिम तौर पर रखता हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
इस बार बाढ़ की वजह से कई दूसरे पक्षियों की जिंदगी प्रभावित हुई। और बिना किसी आमंत्रण के बाढ़ के बाद मेरी छत पर परिंदों की आवक में बढ़ोतरी हो गई। शायद इसके पीछे की वजह पुराने नियमित और नए पक्षियों के बीच किसी प्राकृतिक संवाद की भूमिका रही हो। लेकिन नए मेहमान मेरे लिए और ज्यादा खुशी लेकर आए।
मैं हर सुबह अपनी छत साफ करता हूं, उनके लिए चावल पकाता हूं। और उनके द्वारा दाना चुगने के बाद दोबारा छत साफ करता हूं। मैं उन्हें दूसरी चीजें भी खिला सकता हूं, लेकिन मेरा अपना अनुभव है कि पके चावल खाना उनके लिए तुलनात्मक रूप से आसान है।
मेरी छत का क्षेत्रफल इतना है कि कुल तीन हजार पक्षी एक साथ दाना चुग सकते हैं, लेकिन मेरा अनुमान है कि इनकी तादाद इससे ज्यादा ही रहती है। मैं हर रोज करीब तीस किलो चावल पक्षियों को खिलाता हूं, जिसके लिए मेरी आमदनी के आधे हिस्से की जरूरत होती है। अपने इन बेजुबान दोस्तों के भोजन के लिए मैं हमेशा दस दिन का भंडार अग्रिम तौर पर रखता हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।