वकालत और नौकरी छोड़, शुरू की सेब की बागवानी और बना डाला ये रिकॉर्ड
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हिमाचल की राजधानी शिमला शहर से कुछ ही दूरी पर स्थित कोटखाई तहसील में मेरा गांव है। जब मैं छोटा था, तब मेरे पिता शिमला के एक बैंक में नौकरी करते थे। कई दूसरे हिमाचलवासियों की तरह मेरे परिवार के पास भी सेब का बगीचा था। मैं अपने मां-बाप की सबसे बड़ी संतान था।
यही वजह थी कि न चाहते हुए भी दस-बारह साल की उम्र से ही सेब की बागवानी से जुड़े तमाम काम सीख गया था। लेकिन मुझे वह काम पसंद बिल्कुल नहीं था। मैं तो वकील बनना चाहता था, सो बागवानी के बारे में ज्यादा न सोचते हुए मैंने वकालत की पढ़ाई की। मगर छह महीने की प्रैक्टिस में ही वकालत से मेरा मोह भंग हो गया।
सामाजिक सरोकारों ने ध्यान खींचा, तो पत्रकारिता की पढ़ाई कर डाली। शिमला के एक अखबार में नौकरी भी मिल गई। संयोग ही था कि नौकरी के दौरान मुझे बागवानी बीट की रिपोर्टिंग सौंपी गई। इस काम ने मुझे बागवानी को देखने का दूसरा नजरिया दिया। दरअसल, तुलनात्मक रूप से इस महंगे फल की बागवानी में वैसे तो कोई किसान गरीब नहीं होता, पर बागवानी ऐसी भी नहीं हो रही थी, जिसे तरक्की की संज्ञा दी जा सके।
मैं सेब के किसानों की समस्याओं की खबरें लाता। प्रदेश सरकार तथा दूसरी संस्थाओं के दूसरे अफसरों के इंटरव्यू करता। एक दिन ऐसे ही एक इंटरव्यू के दौरान मुझे एक अधिकारी ने बताया कि भारत में सेब का उत्पादन वैश्विक स्तर पर कितना पिछड़ा है। उन्होंने जानकारी दी कि तकनीक और उन्नत किस्मों की मदद से चीन जैसे देशों में हिमाचल से करीब पांच गुना ज्यादा सेब पैदा किया जाता है। यह बात मेरे दिमाग में रह-रह के घूमने लगी। एक तरफ मेरा रुख बागवानी की ओर बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर नौकरी में अरुचि भी बढ़ रही थी। मन में अंतर्द्वंद्व चरम पर था कि एक दिन मैंने बागवानी की ओर लौटकर, इसे बेहतर बनाकर दूसरों को इसके लाभ से परिचित कराने की ठान ली।
'स्कूल जाती बेटी की जिम्मेदारी भी मुझपर थी'
तब तक मेरी शादी हो चुकी थी और स्कूल जाती बेटी की जिम्मेदारी भी मुझपर थी। फिर भी मैंने नौकरी छोड़ने का जोखिम उठाया। बेहतर बागवानी के लिए मैंने विदेशी किताबें पढ़ने के साथ हर संभव शोध किया। मैंने साहित्य से अर्जित ज्ञान का इस्तेमाल किया और चार साल की मेहनत के बाद 2012 में रिकार्ड 52 पेटी प्रति हेक्टेयर सेब उगा डाला, जोकि राज्य के औसत सात से दस पेटी सेब से कई गुना ज्यादा था।
मैंने दोगुने उत्साह से अपना काम जारी रखा। जब मुझे लगा कि मेरी सारी तकनीक प्रमाणित और सही हैं, मैंने बागवानी के अपने तरीके को दूसरों को बताना शुरू कर दिया। दरअसल उन्नत बागवानी करने वाला मैं कोई पहला किसान नहीं था, पर अधिकांश लोग मुनाफे के स्वार्थ से नहीं निकल पाते। मैं पत्रकार तो पहले से था ही, सो मैंने तय किया कि सेब की बागवानी की सभी नई जानकारियां लोगों तक पहुंचाने के लिए पत्रिका और नए डिजिटल मीडिया का सहारा लूंगा।
मुझे खुशी है कि आज न सिर्फ हजारों किसान मेरी त्रैमासिक पत्रिका के माध्यम से लाभान्वित हो रहे हैं, बल्कि दऑर्चर्डब्लूम नाम से मेरी वेबसाइट/फेसबुक पेज पर भी प्रतिदिन भारी संख्या में हिट्स आ रहे हैं। इसके अलावा समय-समय पर मैं किसानों के लिए फ्री कैंप भी आयोजित करता हूं। हजारों किसान मेरे बगीचे का दौरा करके मेरी तकनीक अपनाकर अपनी आय बढ़ा चुके हैं। ऐसा नहीं कि मेरा ज्ञान पूर्ण हो चुका है। मैं अब भी सेब की तमाम विदेशी किस्में आयात करके उनका हिमाचल में प्रयोग करता रहता हूं।