एक महिला जिन्होंने तालीम देकर तोड़ी समाज की बेड़ियां
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मेरा जन्म जम्मू में हुआ था, लेकिन जब मैं पांच साल की थी, तब से मेरा परिवार कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर के एक बाहरी इलाके में रह रहा है। पिता घर छोड़कर कहीं चले गए थे, सो हमारे घर की माली हालत बहुत खराब थी। मां ने दूसरों के घरों में काम करके किसी तरह अपनी चार बेटियों को पाला। इस वजह से बचपन में मुझे ज्यादा पढ़ने का मौका नहीं मिला। मैंने आठवीं तक केवल उर्दू में पढ़ाई की। हालांकि अपने मोहल्ले में यह करने वाली भी मैं पहली लड़की थी।
उसके बाद मैंने पढ़ाई छोड़कर परिवार की मदद के लिए कई तरह के काम करने शुरू किए। मैं अपनी मां के काफी करीब थी, उनसे सब कुछ साझा करती थी। इक्कीस साल की उम्र में उन्होंने खुशी-खुशी मेरी पसंद के लड़के से शादी कर दी। वर्ष 1987 में शादी होने के बाद मुझे ससुराल में एक बड़े परिवार के बीच रहना पड़ा। मेरे अनपढ़ पति पर कई लोगों का पेट भरने की जिम्मेदारी थी।
यह देख मैंने भी काम करने का निश्चय किया। मैंने न सिर्फ खुद सिलाई-कढ़ाई करनी शुरू कर दी, बल्कि परिवार की दूसरी महिलाओं को भी काम सिखाया। इसके अलावा मैंने मोहल्ले के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू किया। दरअसल हमारे मोहल्ले में सिर्फ एक सरकारी स्कूल था, लेकिन वहां भी एक शिक्षक के भरोसे पांच कक्षाएं थीं। ऐसे में उस स्कूल की पढ़ाई का स्तर सहज ही समझा जा सकता है।
कुछ वक्त बाद मैंने एक कोचिंग सेंटर की शुरुआत कर दी। धीरे-धीरे मेरे अध्यापन का दायरा बच्चों को पार कर उन महिलाओं तक पहुंच गया, जो अपना नाम तक नहीं लिख पाती थीं। इस तरह कम से कम पच्चीस महिलाएं उर्दू में हस्ताक्षर करना और बुनियादी अक्षर ज्ञान सीख गईं। इन महिलाओं के लिए मैं अपने लंच ब्रेक का समय इस्तेमाल करती थी, क्योंकि ये महिलाएं केंद्र पर आकर औपचारिक कक्षाओं से नहीं जुड़ सकती थीं।
महिलाएं ही क्यों, लड़कियों के लिए भी कोचिंग केंद्र पर आना आसान नहीं था। अधिकतर लड़कियों को केवल घरेलू कामकाज सीखने की आजादी थी, पढ़ाई-लिखाई तो केवल लड़कों का काम माना जाता था। यह सब देखकर मैं विभिन्न परिवारों में जाकर उन्हें सभी के लिए शिक्षा की अहमियत के बारे में जागरूक करने लगी। मेरी बातों का लोगों पर फर्क पड़ा और मेरे कोचिंग सेंटर पर पढ़ने के बाद लगभग सभी बच्चे स्कूल भी जाने लगे। नतीजतन मैंने अपना कोचिंग सेंटर बंद कर दिया।
लेकिन मैंने पास-पड़ोस की महिलाओं को पढ़ाने के लिए समूह बनाकर हर रविवार को पढ़ाना जारी रखा। इस तरह लोग मुझे सिस्टर जी के नाम से पुकारने लगे। थोड़ा वक्त लगा, लेकिन शिक्षा को लेकर लोगों की मानसिकता में बदलाव आने लगा। एक सच यह भी है कि जितने लोगों ने मेरा साथ दिया, उससे कहीं ज्यादा लोग हमेशा मेरे खिलाफ रहे। कुछ लोगों ने मुझ पर मनगढ़ंत आरोप लगाकर पोस्टर तक चस्पा कर दिए।
यहां तक कि मेरे पति ने भी तलाक की धमकी दी। खुशकिस्मती यह रही कि मैं उन्हें मनाने में कामयाब रही। मेरी उम्र पचास पार हो चुकी है। मेरी कोशिशों का नतीजा है कि आज हमारे इलाके के कई स्कूलों में सैकड़ों-हजारों बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। लेकिन मैं आज भी उन लोगों के बीच जाती हूं, जो अपने बच्चों, खासकर लड़कियों को स्कूल भेजने से परहेज करते हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।