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गांधी के सपने के लिए खपा दी जिंदगी, 33 साल के संघर्ष के बाद मिली पहचान

Tue, 14 Aug 2018 03:15 PM IST
गौर हरि दास
गौर हरि दास Updated Tue, 14 Aug 2018 03:15 PM IST
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Gour Hari Das- after 33 years struggle gets recognition as freedom fighter
गौर हरि दास

वह एक सर्द सुबह थी। अपने परिवारवालों के साथ मैंने कई दूसरे राष्ट्रवादी ग्रामीणों को भी मैदान में इकट्ठा कर लिया था। अचानक कुछ सिपाही आए और ऊपर से आदेश का हवाला देकर हमसे झंडा छीन लिया। ओडिशा के इकदा गांव में अपने पिता और भाई के साथ उस वक्त के अनाधिकारिक भारतीय ध्वज फहराने के जुर्म में 26 जनवरी, 1945 को पहली दफा मुझे जेल में भेजा गया। तब मेरी उम्र मात्र चौदह बरस थी। मैं हमेशा अपने पिता के मुंह से आजादी की बातें सुनता था।

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वह गांधी जी के प्रखर अनुयायी थे। उन्हीं के माध्यम से मैंने गांधी जी को जाना। आजादी के लिए लड़ी जा रही निर्णायक लड़ाई के दौरान जब गांधी जी ओडिशा आए, तो मैंने भी उनका भाषण सुना। बस उसी दिन से मैं भी अपने पिता की तरह उनका अनुयायी बन गया। चूंकि चालीस के दशक की शुरुआत में मैं बहुत छोटा था, सो मेरी भूमिका भी उम्र के हिसाब से तय थी। असहयोग आंदोलन के वक्त मैंने कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभाई।
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जब मैं पहली और अंतिम बार बापू से मिला, तो उन्होंने मेरे काम की तारीफ की। मेरी सोलह साल की उम्र में देश आजाद हो गया था। लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मैं ताउम्र गांधी के विचारों के जरिये देश की सेवा करता रहूंगा। पहले तो मैंने सेवाग्राम में गांधी जी की 'नई तालीम' हासिल की, फिर बाद में विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ने के लिए बिहार गया। और आखिर में मैं मुंबई के खादी और ग्रामोद्योग आयोग से जुड़ गया, जहां से मैं 1989 में सेवानिवृत्त हो गया।

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इस सफर में कई अच्छे-बुरे मौके आए। 1972 में सरकार की ओर से एक सर्कुलर जारी हुआ था, कि सभी पूर्व स्वतंत्रता सेनानी अपने नाम एक आवेदन पत्र में लिखकर आयोग को भेज दें। मैंने भी आवेदन किया था। बाद में उस आवेदन का क्या हुआ, मैंने इसकी ज्यादा फिक्र नहीं की। इसके पीछे यह निश्चिंतता थी कि मुझे खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने की नौबत नहीं आएगी। मगर कई वर्षों बाद मेरे बेटे को पूर्व स्वतंत्रता सेनानी कोटे से एक इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला, जबकि उसने मेरे जेल से छूटने वाली पर्ची जमा की थी। मैंने कलेक्टर दफ्तर से लेकर मंत्रालयों के चक्कर लगाए।

महाराष्ट्र सरकार से जवाब मिला कि वह दूसरे राज्यों के पूर्व स्वतंत्रता सेनानियों की मदद नहीं करती। मेरे मन में खयाल आया कि क्या मैं सिर्फ ओडिशा के लिए जेल गया था! खैर, अपने एक पड़ोसी मित्र की मदद से मुझे आवेदन के करीब 33 साल बाद 2009 में पूर्व स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र हासिल हुआ। लेकिन इस प्रमाण पत्र के मिल जाने से मैं खुश नहीं हूं। यदि इस प्रमाण पत्र की कहीं जरूरत न पड़ती, तो शायद मुझे खुशी होती।

जिस तरह के देश की कल्पना कभी गांधी जी ने की थी, वैसा है नहीं। यहां तक कि ब्रिटिशकाल में भी अंग्रेज अपने काम को आज की तुलना में ज्यादा ईमानदारी से निभाते थे। हालांकि बाद में सरकार ने मुंबई में मुझे जमीन देने का प्रस्ताव दिया, पर मैंने मना कर दिया। मैंने कह दिया कि जमीन उसे दे दी जाए, जिसे इसकी ज्यादा जरूरत है। मैं आज भी एक एनजीओ के लिए काम कर रहा हूं। मुझे हर महीने दस हजार रुपये तनख्वाह में मिलते हैं, जिसमें से आठ हजार रुपये मैं अनाथालय, वृद्धाश्रम और धार्मिक संस्थाओं को दान कर देता हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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