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इनाम के पैसों से मिलेगी चार कैदियों को आजादी: आयुष किशोर

Thu, 25 Jan 2018 05:14 PM IST
आयुष किशोर
आयुष किशोर Updated Thu, 25 Jan 2018 05:14 PM IST
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Four prisoners will get freedom from Reward money
आयुष किशोर - फोटो : अमर उजाला
मेरा जन्म तीस अक्तूबर, 2003 को हुआ। मैं भोपाल के शिवाजी नगर में रहता हूं। शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए हर साल राष्ट्रपति के हाथों दिए जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वालों की वर्ष 2016 की सूची में मेरा भी नाम था। पुरस्कार के तहत मुझे दस हजार रुपये मिले।
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इसके अलावा अच्छा छात्र होने के नाते स्कूल की ओर से भी मुझे 28 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि मिली। कम उम्र में इतना पैसा पाकर मैं बेहद खुश था। हालांकि मैं एक संपन्न परिवार की पृष्ठभूमि से आता हूं, फिर भी मैं चाहता, तो ये पैसे किसी सामान्य बच्चे की तरह अपनी उन इच्छाओं के पूर्ति में खर्च करता, जिन्हें घरवाले अब तक किसी न किसी बहाने से टाल देते थे।
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 व्यक्तिगत प्रयोग के लिए नया कंप्यूटर ले सकता था। वीडियो गेम प्ले स्टेशन खरीद सकता था या फिर नई साइकिल का शौक पूरा कर सकता था। मगर मैंने इनमें से किसी चीज के लिए पैसे खर्च नहीं किए। मैंने अपनी मां से पैसों के सबसे बेहतर इस्तेमाल के बारे में बात की।
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मेरी मां एक पुलिस अधिकारी हैं, इस वजह से उनका जेल और कैदियों से वास्ता पड़ता रहता है। मैं अक्सर उनसे जेल की जिंदगी के बारे में सवाल करता हूं। मेरी मां ने मुझे बताया था कि जेल के हर कैदी एक जैसे नहीं होते। उन्होंने मुझे कई ऐसे कैदियों के बारे में बताया, जिनसे वर्षों बीतने के बाद भी जेल में कोई मिलने नहीं आता।

कुछ बंदी ऐसे भी होते हैं, जो सलाखों के पीछे सिर्फ इसलिए भी हैं, क्योंकि उनकी हैसियत जुर्माना भरने तक की नहीं है। ऐसे लोग कारागार में खूब मेहनत करके काम करते हैं और वहां की दिहाड़ी बचाकर जुर्माना भरते हैं। मां बताती हैं कि चंद हजार रुपये न चुका पाने वाले भी कई कैदी जेल में अपनी अमूल्य जिंदगी काट रहे हैं।

मुझे यह सब जानकर बहुत बुरा लगा। मैंने सोचा कि भला कैसे घरवाले होंगे, जो अपने परिवार के सदस्य से मिलने तक नहीं जाते और कुछ रुपये का जुगाड़ करके उन्हें आजाद नहीं कराते। मेरे सामने पुरस्कार में मिले पैसों को ऐसे कैदियों की मदद के लिए खर्च करने से अच्छा विकल्प नहीं था।

मैंने अपनी मां की मदद से अपनी पुरस्कार राशि का सबसे बेहतर उपयोग करने की ठानी। इस दिशा में थोड़ी और मशक्कत की, तो पता चला कि भोपाल सेंट्रल जेल में चार ऐसे बंदी हैं, जो दस साल से ज्यादा वक्त से जेल में कैद हैं।

उनकी सजा भी पूरी हो चुकी है, लेकिन वे बाहर सिर्फ इसलिए नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि जरूरी जुर्माना चुकाने के लिए उनके पास पैसे नहीं है। मैंने तय किया कि मैं इनकी मदद करूंगा। ये सभी कैदी आगामी गणतंत्र दिवस यानी कल के दिन रिहा हो जाएंगे।

इन चारों में से एक छियालीस वर्षीय श्रीजन सिंह हैं, जो हत्या के आरोप में अपनी सजा काट रहे थे, लेकिन जेल में अपने अच्छे व्यवहार की वजह से उन्हें उनकी सजा पूरी होने से पहले ही रिहा किया जा रहा है। जेल के भीतर काम करके उन्होंने जुर्माने का कुछ अंश चुकता कर दिया था, पर पांच हजार रुपये अब भी बाकी थे, जिसे मैंने अदा किया।


गणित की कई देशी-विदेशी प्रतियोगिताओं में भाग लेकर मैंने कई पुरस्कार जीते हैं। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी मेरा नाम दर्ज है। लेकिन शिक्षा से जुड़ी वे सारी खुशियां; इस काम से मुझे मिली खुशी के आगे फीकी हैं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
 
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