संगीत के सुरों से बदल रहा झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों का बचपन
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उनका गान बहुत सुरीला नहीं है। गिटार कुछ और कहता है और हारमोनियम की धुन कुछ और ही कहना चाहती है। लेकिन फिर भी इस संगीत के प्रति मेरी दिलचस्पी जरा-सी भी कम नहीं हुई है, क्योंकि यह संगीत उन बच्चों की आवाज के सहारे मेरे दिल को सुकून देता है, जो अपने उल्लास को आंतरिक सुरों से सजाते हैं।
मैं दिल्ली के एक संपन्न परिवार में पली-बढ़ी 29 वर्षीय युवती हूं। रिटायर होने से पहले मेरे पिता शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे, इसलिए चाहे-अनचाहे देश में शिक्षा की वास्तविक स्थिति से मेरा वास्ता पड़ता रहता था। यही वजह थी कि दिल्ली के प्रसिद्ध लेडी श्रीराम कॉलेज से इतिहास से स्नातक करने के दौरान मैं एक संस्था से बतौर स्वयंसेवक जुड़ी थी। वह संस्था समाज के निचले तबके के लोगों के शैक्षणिक उत्थान की दिशा में काम कर रही थी।
झुग्गियों में रहने वाले बच्चों की दोस्ती किताबों से करवाना मेरा काम रहता था। संगीत से जुड़ाव मेरे व्यक्तित्व में एक अतिरिक्त खूबी रही है। मेरी दिलचस्पी संगीत में ही अपना करियर बनाने की थी, लेकिन किसी वजह से ऐसा नहीं हो सका था। मैंने स्कूली दौर में अपनी इस खासियत को कई मंचों पर प्रदर्शित किया है। और जो चीज अपने भीतर होती है, बाहरी दुनिया में उस तत्व की उपस्थिति या अनुपस्थिति हमें शर्तिया प्रभावित करती है।
इस बात का एहसास मुझे उन बच्चों के साथ काम करने पर हुआ। उनकी सादी दुनिया में संगीत के रंगों का स्पष्ट अभाव देखा जा सकता था। मेरे दिमाग में इस स्थिति को बदलने का विचार आया। मैं कई लोगों को जानती थी, जो संगीत से जुड़े थे। मैंने उनकी मदद से वंचित बच्चों के लिए एक संगीत कार्यशाला आयोजित की। कार्यशाला में संगीत के प्रति बच्चों का उत्साह देखने लायक था। उनके उत्साह ने ही मेरे विचार को संकल्प में बदल दिया। मुझे संगीत के माध्यम से बच्चों को सिखाने-पढ़ाने में आनंद आने लगा। वास्तव में कला और संगीत इंसानों की जिंदगी किस तरह सकारात्मक रूप से निर्देशित करते हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मेरे सामने था।
अपने काम को और बेहतर तरीके से काम करने के लिए 2008 में मैंने म्यूजिक बस्ती नाम से एक संस्था गठित की। तब से लेकर आज तक मैं झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों को किताबी ज्ञान से इतर अन्य प्रामाणिक गतिविधियों से सिखाने की कोशिश करती हूं। इन गतिविधियों में संगीत सबसे प्रमुख है। शुरुआत में मेरे काम करने का कोई संरचनात्मक ढांचा नहीं था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, मेरी टीम भी बढ़ती गई और काम करने का तरीका भी व्यवस्थित होता गया।
मौजूदा समय में मैं स्कूलों के साथ मिलकर एक वर्षीय कार्यक्रम चलाती हूं, जिनमें पेशेवर तरीके से गरीब बच्चों को संगीत से जुड़ी गतिविधियों में शामिल किया जाता है। ये बच्चे समय-समय पर कई म्यूजिक कंसर्ट में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर पाते हैं। इसके अलावा जरूरी रूप से सालाना हम एक बड़ा कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं, जिसमें पूरी मेहनत से बच्चे खुद ही गाना कंपोज करते हैं, गाते-बजाते हैं।
मेरा उद्देश्य यही है कि मैं किसी भी स्तर पर बच्चों के विकास में रचनात्मकता की बढोतरी कर सकूं। और जिस काम में मुझे आनंद आता है, मैंने वही तरीका चुना। ऐसा करने में कई चुनौतियां आती हैं, मगर यकीन करिए, अगर आप दृढ़ संकल्पित हैं, तो वे आपके सामने नहीं टिकेंगीं।