टैक्सी ड्राइवर ने लोगों को दिया संदेश, प्रकृति हमारी सबसे अच्छी दोस्त, इसे नष्ट नहीं करें
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करीब डेढ़ दशक से मैं कोलकाता की सड़कों पर टैक्सी चला रहा हूं। कुछ साल पहले की बात है, मुझे रात में अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर शराब की एक खाली बोतल पड़ी मिली। उस बोतल का आकार आकर्षक था। मैंने उसका प्रयोग करते हुए उसमें एक मनीप्लांट लगाकर पिछली सीट के पीछे रख दिया। कुछ हफ्तों बाद वह पौधा इतना बड़ा हो गया कि उसकी लताएं खिड़कियों तक जा पहुंचीं। मुझे लगा, इससे यात्रियों को दिक्कत होगी, लेकिन सवारियों को वह पौधा अच्छा लगा।
लोगों के इसी प्रोत्साहन ने मुझे टैक्सी के अंदर और पौधे रखने को प्रेरित किया। धीरे-धीरे मैंने पिछली सीट के पीछे का हिस्सा खूबसूरत पौधों से सुसज्जित छोटे-छोटे गमलों से भर दिया। टैक्सी के अंदर किए गए इस तरह के प्रयोग के बाद मेरी साथी मेरा मजाक बनाया। मेरे बारे में उल्टी-सीधी बातें कही जाने लगी। ताना मारते हुए एक ड्राइवर ने मुझसे कहा कि अपने सिर पर पौधा लगाकर क्यों नहीं चलते! यह था तो ताना, लेकिन इसे सुनकर मेरे दिमाग में एक नए विचार ने जन्म ले लिया।
मैंने सोचा क्यों न अपनी गाड़ी की छत पर घास उगा दी जाए। वैसे तो एक टैक्सी ड्राइवर के पास बहुत ज्यादा बचत नहीं होती, मगर फिर भी मैंने करीब पच्चीस हजार रुपये खर्च करके टैक्सी की छत पर घास उगाने का इंतजाम कराया। छत पर लगी घास की ट्रे का वजन पैंसठ किलो के आसपास था, जिससे गाड़ी का वजन थोड़ा बढ़ गया और ईंधन की खपत बढ़ गई। लेकिन अच्छी बात यह रही कि इससे कार की छत को कोई नुकसान नहीं हुआ। इस काम का एक मात्र मकसद यही था कि लोग मेरी टैक्सी के प्रति आकर्षित हों और उनके मन में पर्यावरण के प्रति लगाव पैदा हो। मगर घास लगाने से एक और फायदा हुआ।
मेरी कार के अंदर का तापमान किसी भी नॉन एसी कार के मुकाबले बहुत कम रहने लगा। एक वक्त ऐसा भी आया, जब मुझे किसी वजह से पैसों की सख्त जरूरत थी और मुझे अपनी टैक्सी तक बेचनी पड़ गई थी। उसके बाद से मैं किराये की टैक्सी चला रहा हूं। मोटरमालिक को मेरा पुराना शौक पता था, सो उसने मुझे अपनी गाड़ी में पौधे लगाने की इजाजत दे दी। मैं बचपन से ही अनेक संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले पौधारोपण कार्यक्रमों में हिस्सा लेता रहा हूं।
और हर कार्यक्रम में मैं महसूस करता हूं कि पौधे तो खूब लगाए जाते हैं, लेकिन उनकी देखभाल कोई नहीं करता। मैं अपनी सवारियों से भी आग्रह करता हूं कि वे न सिर्फ पौधे लगाएं, बल्कि उनकी देखभाल भी करें। मैं उनको पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संदेशों वाले पर्चे भी बांटता हूं। इन पर्चों में लिखे संदेश कविता के रूप में होते हैं। इसके अलावा मैं उन सवारियों को पौधे और बीज भी भेंट करता हूं, जो मेरी बातों को गंभीरता से लेते हैं।
दूसरे टैक्सी ड्राइवर, जो सवारियों से मीटर से भी ज्यादा किराया लेने की चेष्टा रखते हैं, कभी उन लोगों ने मुझे पागल तक कहा था, लेकिन उन्हीं में से अधिकतर आज मेरी तारीफ करते नहीं थकते। मैं ‘आमरा सबुज साथी’ (हम हरियाली के दोस्त) नाम से एक एनजीओ भी चलाता हूं, जिसका यही मकसद है कि लोगों के बीच यह संदेश जाए कि कोई भी कहीं भी पौधा लगा सकता है। हमें इसके लिए विशाल बगीचों की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति हमारी सबसे अच्छी दोस्त है, इसे नष्ट मत करें। मानव जाति के लाभ के लिए प्रकृति को बचाएं।