'बच्चों में शिक्षा का अलख जगाने के लिए मैंने अपने घर को स्कूल में बदल दिया'
मैं समाज सेवा के लिए बड़े-बड़े काम नहीं कर सकता और न ही किसी को इस काम के लिए बहुत अधिक चंदा दे सकता हूं, मगर कम से कम मैं समाज के सकारात्मक परिवर्तन के लिए कुछ तो जरूर कर सकता हूं। मेरे पिता ने दूसरे विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया था। बाद में उन्होंने कटक शहर के बख्शीबाजार इलाके में चाय की एक दुकान खोल ली। कुछ वक्त तक सब कुछ ठीक रहा, फिर पिता जी बीमार पड़ गए।
उनकी गंभीर बीमारी की वजह से मुझे न चाहते हुए भी पढ़ाई छोड़कर दुकान चलानी पड़ी। और फिर अगले एक दशक से भी ज्यादा समय तक मेरी जिंदगी चाय के प्यालों के इर्द-गिर्द चलती रही। मेरी जिंदगी की कहानी में मोड़ तब आया, जब मैंने गरीब जरूरतमंद बच्चों के लिए कुछ करने के बारे में सोचा। परिवार की खातिर ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ने के कारण मुझे बहुत अच्छी तरह पता है कि शिक्षा का महत्व क्या है। लेकिन यह महत्व उन लोगों को नहीं पता था, जो आसपास के झुग्गियों में रहते थे। आर्थिक कारणों से वे लोग अपने बच्चों को पढ़ने के लिए नहीं भेजते थे।
मैं जब भी ऐसे बच्चों को देखता, तो मुझे उनके भविष्य की विकृत तस्वीर नजर आती। दिमाग में कई बार खयाल आया कि इनके लिए कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए, लेकिन चाय की दुकान की आमदनी से उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता था। लोगों को समझाने का भी कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि उनकी बस्ती से स्कूल की दूरी भी ज्यादा थी। मैंने अपने घर के एक कमरे को स्कूल में तब्दील कर दिया। जब मैंने बच्चों के लिए स्कूल खोल दिया, तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को पढ़ने न भेजने का नया बहाना ढूंढ लिया। वे मुझसे कहते कि उनके बच्चों को पढ़ने की जरूरत ही क्या है? मगर मैं अपने फैसले को लेकर ढृढ़ था। मुझे पता था कि आज नहीं तो कल इन्हें जरूर अक्ल आएगी और मेरे स्कूल में बच्चे पढ़ने आएंगे।
मेरी उम्मीदें परवान चढ़ती गईं और एक कमरे से शुरू हुआ स्कूल शहर के कुछ नेक लोगों की मदद से निरंतर बड़ा होता गया। पिछले दो दशक से मैं चाय की दुकान की कमाई का आधा हिस्सा अपने स्कूल पर खर्च कर रहा हूं। इस दौरान मैंने सैकड़ों बच्चों को पढ़ाया है। फिलहाल मेरे स्कूल में प्राथमिक कक्षाओं की शिक्षा दी जाती है।
यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद बच्चों को दूसरे उच्च विद्यालयों में दाखिला दिलाने की व्यवस्था भी की जाती है। आशा आश्वासन (मेरा स्कूल) में अभी करीब 80 बच्चे पढ़ रहे हैं। मैं हर रोज 600 से 800 रुपये प्रति दिन कमा लेता हूं। कम कमाई मेरे लिए कभी कोई मुद्दा नहीं रहा, मैं सिर्फ अपने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के बेहतर भविष्य के बारे में सोचता हूं।
स्कूल चलाने के साथ-साथ मैं शहर के एक मेडिकल कॉलेज में नियमित जाता हूं। मैं जब भी उस मेडिकल कॉलेज में जाता हूं, वहां के मरीजों के लिए दूध, पानी और दूसरी खाने-पीने की वस्तुएं ले जाता हूं। यही नहीं, मैंने मेडिकल कॉलेज के शरीर विज्ञान विभाग के लिए मरणोपरांत देहदान का भी फैसला किया है, ताकि मरने के बाद मेरा शरीर मेडिकल के छात्रों के काम आ सके। मेडिकल कॉलेज में मेरी इन तमाम गतिविधियों से प्रभावित होकर सरकार ने मुझे कॉलेज कैंपस में एक दफ्तर मुहैया कराया है। मैं उस दफ्तर का इस्तेमाल दूध गर्म करने के लिए करता हूं, ताकि यही दूध मरीजों को दे सकूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।