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इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास से बचाया कलाकारों का वजूद

Tue, 13 Mar 2018 08:52 PM IST
सीवी राजू
सीवी राजू Updated Tue, 13 Mar 2018 08:52 PM IST
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CV Raju of Etikoppaka village, understood situation and challenges faced by the artisans
C.V. Raju

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले में नदी किनारे बसा मेरा गांव एतिकोप्पका लकड़ी के पारंपरिक खिलौनों के लिए जाना जाता है। ये खिलौने आसपास के इलाके के लोगों की जीवन शैली का हिस्सा हैं। न सिर्फ खिलौने, बल्कि लकड़ी से बने अन्य उत्पाद, मसलन छोटे-छोटे डिब्बों को दुल्हन के शृंगार कक्ष में सामान्य तौर पर देखा जा सकता है।

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'लकापिदाथलू' को कौन भूल सकता है, जो रसोई में काम आने वाला एक रंगीन सेट होता है। मेरे गांव में दो सौ से ज्यादा परिवारों की जिंदगी इन्हीं हस्तनिर्मित काष्ठ उत्पादों पर आधारित है। लेकिन इन पर तब ग्रहण लग गया, जब बाजार ने प्लास्टिक को तवज्जो देनी शुरू की। कला के अद्भुत नमूने सस्ते प्लास्टिक से मात खाने लगे। इसका नतीजा यह निकला कि जो कलाकार विशुद्ध रूप से प्राकृतिक तरीके से उत्पादों का निर्माण करते थे, वे भी बाजार में अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए रासायनिक रंगों का इस्तेमाल करने लगे। यह बदलाव उस पहचान के विरुद्ध था, जिसके लिए एतिकोप्पका के उत्पाद जाने जाते थे।
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प्राकृतिक रंग यहां की खूबसूरती है। इन रंगों से बने खिलौने बच्चों को हानि नहीं पहुंचाते थे। और जैसा कि अपेक्षित था, नकली रंग से बने खिलौनों की मांग तेजी से घटने लगी। खिलौनों का ऑर्डर देने वाले एतिकोप्पका से मुंह मोड़ने लगे। जंगलों की घटती तादाद भी कलाकारों के लिए दोहरी मुसीबत बन गई। जिस मुलायम लकड़ी का प्रयोग सर्वाधिक होता था, वह दुर्लभ होती जा रही थी। कलाकारों के लिए पैसे कमा पाना हर बीतते दिन के साथ और मुश्किल होता जा रहा था। अपनी कला को जिंदा रखने के लिए वे गांव छोड़कर शहर की ओर पलायन करने को मजबूर हो गए।

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CV Raju of Etikoppaka village, understood situation and challenges faced by the artisans
C.V. Raju

यहीं से मेरा काम शुरू हुआ। मैं खुद कृषि स्नातक हूं। कलाकारों की हर छोटी-बड़ी समस्या से मैं अच्छी तरह वाकिफ था। ये लोग कुदरती तरीके से 'दीवी-दीवी' पेड़ से लाल रंग निकालते थे, पर इनके विलुप्तप्राय होने के बाद सिंथेटिक रंगों ने जगह बनाई थी। टाइटेनियम डाइक्साइड जैसे रसायनों का प्रयोग होने लगा था। मैं इस नई आदत के खिलाफ था। मैं यह भी चाहता था कि मेरे गांव के कलाकार कौशलविहीन व्यक्ति की तरह बाहर जाने के बजाय गांव में ही रहें।

इन कलाकृतियों को बचाने के लिए मैंने सबसे पहले प्राकृतिक रंग वाले इन खिलौनों के बारे में जागरूकता फैलानी शुरू की। इससे धीरे-धीरे ही सही, पर कलाकारों को अपनी कला की कीमत का एहसास हुआ। लेकिन प्राकृतिक रंगों की अनुपलब्धता उनकी एक बड़ी समस्या थी। इसके लिए मैंने वस्त्रोद्योग के लिए प्रयुक्त होने वाले कुदरती रंगों के निर्माण से संबंधित प्रशिक्षण शिविरों में हिस्सा लिया।

वहां मैंने जाना कि कैसे तमाम तरह की वनस्पतियों की जड़ों, तनों, पत्तियों, फलों और बीजों से रंग बनाया जा सकता है। इस काम में मेरी मदद शिल्प परिषद ने भी की। अनेक प्रयोगों के बाद मैंने इन कुदरती रंगों को विभिन्न माध्यमों में संरक्षित करने का तरीका खोज लिया। लेकिन इतनी कवायद गांव की कला बचाने को काफी नहीं थी। उत्पाद बनाने के लिए सबसे अच्छी लकड़ी की दुर्लभता अब भी एक बड़ी चुनौती थी।

हमारे लिए यहां वन संरक्षण कमिटी काम आई, जिसने न केवल हमें तात्कालिक विकल्प मुहैया कराए, बल्कि बड़े पैमाने पर ऐसी प्रजाति के पेड़ों का रोपण भी किया। इस तरह इच्छाशक्ति, कुछ नए तरीके और सामूहिक प्रयास ने एतिकोप्पका को फिर से अपनी पहचान को समृद्ध करने का अवसर दिया है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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