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बहन के लिए बना सबसे कम उम्र का हेडमास्टर
बाबर अली
Updated Fri, 30 Mar 2018 08:15 AM IST
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फाइल फोटो
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जूट का कारोबार करने वाले मेरे पिता मुझे अधिकारी बनाना चाहते थे, इसलिए मैं स्कूल जाता था। लेकिन वह मेरी छोटी बहन को कुछ नहीं बनाना चाहते थे, इसलिए वह घर पर ही रहती थी। नौ साल की उम्र में, जब मैंने चौथी कक्षा पास कर ली, तब मेरे पिता ने घर से दस किलोमीटर दूर एक दूसरे स्कूल में मेरा दाखिल करा दिया।
मैं अब बस से स्कूल जाने लगा था। एक दिन शाम को बस स्टैंड से जब मैं घर वापस आ रहा था, मैंने देखा कि मेरे हमउम्र दर्जनों बच्चे स्कूल न जाकर खेतों में काम कर रहे हैं। मुझे पहली बार अपनी बहन समेत आसपास के उन सभी बच्चों का स्कूल न जाना अखरा। उस कच्ची उम्र में ही मुझे लगा कि इन बच्चों को खेतों में नहीं, बल्कि स्कूल में होना चाहिए।
मुझे सबसे पहले अपनी बहन की फिक्र हुई, जो मां के साथ घर में ही रहती थी। उस दिन के बाद मैं स्कूल से जो भी सीख कर आता, उसे अपनी बहन को सिखाता। कुछ ही दिनों में मैंने पढ़ाने का दायरा पड़ोस के कुछ और बच्चों तक फैला दिया। इस तरह से मैंने घर के आंगन में ही छह लड़कियों समेत कुल आठ बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।
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एक तरह से मेरे घर में एक छोटा-सा स्कूल शुरू हो गया। मां तो हमारे साथ थीं, पर मेरे पिता को लगा कि इस काम से मेरी पढ़ाई प्रभावित होगी, सो उन्होंने मेरे घरेलू स्कूल को बंद करा दिया। मैंने इसका तोड़ गांव से कुछ दूरी पर जंगल में स्कूल शुरू करके निकाला। लेकिन कुछ ही दिनों में पिता जी वहां भी पहुंच गए।
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मैं अब बस से स्कूल जाने लगा था। एक दिन शाम को बस स्टैंड से जब मैं घर वापस आ रहा था, मैंने देखा कि मेरे हमउम्र दर्जनों बच्चे स्कूल न जाकर खेतों में काम कर रहे हैं। मुझे पहली बार अपनी बहन समेत आसपास के उन सभी बच्चों का स्कूल न जाना अखरा। उस कच्ची उम्र में ही मुझे लगा कि इन बच्चों को खेतों में नहीं, बल्कि स्कूल में होना चाहिए।
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मुझे सबसे पहले अपनी बहन की फिक्र हुई, जो मां के साथ घर में ही रहती थी। उस दिन के बाद मैं स्कूल से जो भी सीख कर आता, उसे अपनी बहन को सिखाता। कुछ ही दिनों में मैंने पढ़ाने का दायरा पड़ोस के कुछ और बच्चों तक फैला दिया। इस तरह से मैंने घर के आंगन में ही छह लड़कियों समेत कुल आठ बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।
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एक तरह से मेरे घर में एक छोटा-सा स्कूल शुरू हो गया। मां तो हमारे साथ थीं, पर मेरे पिता को लगा कि इस काम से मेरी पढ़ाई प्रभावित होगी, सो उन्होंने मेरे घरेलू स्कूल को बंद करा दिया। मैंने इसका तोड़ गांव से कुछ दूरी पर जंगल में स्कूल शुरू करके निकाला। लेकिन कुछ ही दिनों में पिता जी वहां भी पहुंच गए।
मेरी जिद के कारण आखिरकार पिता जी को एक रिटायर्ड शिक्षक से सलाह लेनी पड़ी कि उनका बेटा छोटी-सी उम्र में जो कर रहा है, वह कहां तक सही है! खुशनसीबी से उन शिक्षक ने मेरे काम को सराहा। उसके बाद तो जैसे मेरे जीवन का मकसद ही बदल गया। मैं दोगुने उत्साह के साथ अपने काम में जुट गया।
मेरे उत्साह के पीछे एक एक और बड़ी वजह रही। मेरे घर के पास ही रामकृष्ण आश्रम था। यों ही रास्ते में एक दिन आश्रम के एक गुरु जी ने स्वामी विवेकानंद की सूक्तियों वाली एक किताब मुझे दी थी। स्वामी विवेकानंद के विचार पढ़ने के बाद मैं उनका अनुनायी बन गया।
सच कहूं, तो स्वामी जी की शिक्षाओं ने ही मुझे वंचित बच्चों को पढ़ाने के लिए सबसे ज्यादा प्रोत्साहित किया। अच्छी बात यह रही कि किसी दूसरे धर्म गुरु से प्रभावित होने पर मुझे सामाजिक ताने सुनने को जरूर मिले, पर एक दस साल के लड़के के साथ उसका परिवार हमेशा से साथ रहा।
सामाजिक संकीर्णताओं से निकलते हुए मैंने बच्चों को पढ़ाना जारी रखा और ग्यारह साल की उम्र में मेरा विधिवत स्कूल चलने लगा। अनेक दानदाताओं ने मेरे काम की तारीफ के साथ मेरी हर संभव मदद भी की। देशी-विदेशी मीडिया के जरिये पूरे देश के लोगों में मेरी पहचान सबसे कम उम्र के हेडमास्टर के तौर पर हो गई।
जब नाम हुआ, तो पास के ही एक स्कूल के प्रिंसिपल मुझसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने हमारे स्कूल को ढेरों किताबें दान करके मेरे स्कूल का नाम रखा- आनंद शिक्षा निकेतन। आज मेरी पच्चीस साल की उम्र में ही अब तक सैकड़ों बच्चे हमारे स्कूल से निःशुल्क पढ़ाई करके डिग्री कॉलेजों में अध्ययनरत हैं। मेरे पहले आठ विद्यार्थी, जिनमें मेरी बहन भी शामिल थी, आज हमारे स्कूल के शिक्षक हैं।
मेरे उत्साह के पीछे एक एक और बड़ी वजह रही। मेरे घर के पास ही रामकृष्ण आश्रम था। यों ही रास्ते में एक दिन आश्रम के एक गुरु जी ने स्वामी विवेकानंद की सूक्तियों वाली एक किताब मुझे दी थी। स्वामी विवेकानंद के विचार पढ़ने के बाद मैं उनका अनुनायी बन गया।
सच कहूं, तो स्वामी जी की शिक्षाओं ने ही मुझे वंचित बच्चों को पढ़ाने के लिए सबसे ज्यादा प्रोत्साहित किया। अच्छी बात यह रही कि किसी दूसरे धर्म गुरु से प्रभावित होने पर मुझे सामाजिक ताने सुनने को जरूर मिले, पर एक दस साल के लड़के के साथ उसका परिवार हमेशा से साथ रहा।
सामाजिक संकीर्णताओं से निकलते हुए मैंने बच्चों को पढ़ाना जारी रखा और ग्यारह साल की उम्र में मेरा विधिवत स्कूल चलने लगा। अनेक दानदाताओं ने मेरे काम की तारीफ के साथ मेरी हर संभव मदद भी की। देशी-विदेशी मीडिया के जरिये पूरे देश के लोगों में मेरी पहचान सबसे कम उम्र के हेडमास्टर के तौर पर हो गई।
जब नाम हुआ, तो पास के ही एक स्कूल के प्रिंसिपल मुझसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने हमारे स्कूल को ढेरों किताबें दान करके मेरे स्कूल का नाम रखा- आनंद शिक्षा निकेतन। आज मेरी पच्चीस साल की उम्र में ही अब तक सैकड़ों बच्चे हमारे स्कूल से निःशुल्क पढ़ाई करके डिग्री कॉलेजों में अध्ययनरत हैं। मेरे पहले आठ विद्यार्थी, जिनमें मेरी बहन भी शामिल थी, आज हमारे स्कूल के शिक्षक हैं।