लेडी प्रोफेसर में रिटायर होते ही छाया ऐसा जुनून, 12 साल में बना दिए 80 घर
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वर्ष, 2005 की बात है, मैं उस वक्त अपने कॉलेज में राष्ट्रीय सेवा योजना कार्यक्रम की संयोजक थी। मैं अपनी छात्रा आशा के घर गई हुई थी। आशा जिसे घर कह रही थी, दरअसल वह सार्वजनिक जगह पर प्लास्टिक शीट से बनाया गया एक बसेरा था। आशा के मां-बाप नहीं थे। उसकी दादी ने उसे पाला-पोसा था। उस घर में दरवाजा नहीं था। दरवाजे के नाम पर जो कपड़ा लटक रहा था, शायद वह आशा का कोई पुराना दुपट्टा था। मेरी आंखें भर आईं।
मैंने तुरंत निर्णय लिया कि मैं आशा का घर बनवाऊंगी। मैंने अपना प्रयास शुरू कर दिया। पंचायत से जमीन मिल गई, तो परिवार, दोस्तों, साथ में पढ़ाने वाले अध्यापकों और छात्रों से भी मदद मांगी। साठ हजार रुपये से तैयार हुए घर में रहने वाली आशा पढ़-लिखकर मेरी ही तरह अध्यापक बन गई और उसने एक सैनिक से शादी की।
यह मेरे सफर की एक शुरुआती घटना है। मैं केरल के पथानमथिट्टा में रहने वाली सेवानिवृत्त प्रोफेसर हूं। आशा का घर बनाने के बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जरूरतमंद लोगों के लिए घर मुहैया करने के लिए चंदा एकत्रित करना मेरे सामने बड़ी चुनौती बनकर सामने आया।
एकाध घर तो ठीक, पर एक अभियान के तौर पर इसे जारी रख पाना काफी मुश्किल हो रहा था। कॉलेज में पढ़ाने के काम के साथ तो यह बेहद थकाऊ भी था। मैंने तय किया कि मुझे अपना तरीका बदलना होगा। घर बनाने के लिए जरूरी वित्तीय जरूरतों के लिए एकल प्रायोजक एक अच्छा विकल्प था। इसी विचार के आधार पर मैंने अमीर दयालु लोगों से संपर्क करना शुरू कर दिया।
मैं हैरान थी कि मुझे अपनी उम्मीद से ज्यादा ऐसे लोग मिल गए, जिन्हें इस तरह से दान करने में कोई दिक्कत नहीं थी। बस उन्हें मेरे जैसे एक भरोसेमंद चेहरे की तलाश थी। इसी का नतीजा रहा कि मैंने करीब बारह साल में अब तक कुल अस्सी से ज्यादा घर तैयार कराए हैं। अध्यापन के आखिरी वर्षों में मेरे काम ने तेजी पकड़ी और रिटायर होने के बाद और भी ज्यादा समय इसी सेवा को देने लगी।
आवास को लेकर चल रही तमाम सरकारी योजनाओं के बीच घर किसके लिए बनाना है, इस पात्रता के चयन का तरीका भी मेरा अपना है। पिछले कई वर्षों में मैंने कई गरीब बस्तियों में घूमकर लोगों की बेबसी देखी है। वैसे तो इन सभी लोगों को पक्की छत की जरूरत है, पर अपनी सीमाओं को देखते हुए मैंने जानकारी जुटाकर प्राथमिकता के आधार पर जरूरतमंदों को घर बनाकर दिया है।
खास बात यह है कि अब तक बनवाए गए सभी घरों में मात्र दो घरों के लिए ही जमीन खरीदने की नौबत आई, बाकी सभी मामलों में या तो लाभार्थी शख्स के पास जमीन थी या स्थानीय निकायों ने जमीन दी। इस काम में मेरी लगन और ईमानदारी को देखते हुए कई अमीर सज्जनों ने मुझसे संपर्क साधा और मुझे पैसे दिए।
मैंने एक नियम बनाया था कि मैं एक घर बनाने के लिए एक से अधिक शख्स से पैसे नहीं लेती हूं, लेकिन, ऐसा भी हुआ, जब दानदाता ने मुझसे कहा कि वह इतना ही दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में मैं किसी और से पैसे न लेकर अपनी पूंजी लगाती हूं। मैंने पहला घर साठ हजार रुपये में बनाया था, जबकि आखिरी घर करीब तीन लाख में तैयार करके लाभार्थी को सुपुर्द किया है। महंगाई के बावजूद मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरा काम अनवरत चलता रहेगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।