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खुद नहीं बन पाए एथलीट तो तैयार कर दिए कई नेशनल चैंपियन

Fri, 24 Nov 2017 11:43 AM IST
अनिल कुमार पाटिल
अनिल कुमार पाटिल Updated Fri, 24 Nov 2017 11:43 AM IST
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bashindey anil kumar patil trains kids in sports
अनिल पाटिल - फोटो : anil patil

मेरा सपना था कि मैं एथलीट बनूं। मैंने अपने सपने को जीना भी शुरू कर दिया था, जब 1992 में आयोजित एक अंडर-18 प्रतियोगिता मैं मैंने आठ सौ मीटर की दौड़ दो मिनट दो सेकंड में पूरी करके राज्य स्तर का रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन आगे सही तरह से प्रशिक्षण और उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण मुझे न चाहते हुए भी अपना रास्ता बदलना पड़ा। मैंने कृषि विज्ञान विषय में डिप्लोमा किया और एक चीनी मिल में बतौर फील्डमैन की नौकरी कर जीवन यापन करने लगा। बावजूद इसके खेलों को भूला पाना मेरे लिए मुश्किल था। यही कारण था कि मैं खेल का मैदान कभी नहीं भूल पाया।

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मैंने एक दूसरे तरीके से खेलों से जुड़ने की योजना बनाई। मैंने सोचा कि भले ही मार्गदर्शन के अभाव में मैं खिलाड़ी नहीं बन पाया, पर मेरी जैसी सोच रखने वाले दूसरे जरूरतमंद नए लड़कों को अपने अनुभवों से कुछ न कुछ सिखाया जा सकता है। मैंने नौकरी के साथ मुफ्त एथलेटिक्स ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी। शुरुआती स्तर पर मेरे परिवार ने मेरे फैसले का समर्थन नहीं किया। पर जैसे ही मेरे सिखाए छात्रों ने प्रतियोगिताओं में अच्छे परिणाम लाने शुरू कर दिए, उनका रवैया मेरे प्रति बदल गया।
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दरअसल छात्रों के प्रशिक्षण के लिए तमाम तरह के छोटे-छोटे खर्चे करने पड़ते थे, जिसे मैं अपनी बचत से ही पूरा करता था। मैंने प्रशिक्षण देने के लिए दो आयु वर्ग बनाए हैं। 18 साल से ऊपर के छात्रों के लिए, जो किसी को शारीरिक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं, उनके लिए अलग सत्र और 18 साल से नीचे के उन छात्रों के लिए अलग सत्र, जो सिर्फ विभिन्न खेलों में जाना चाहते हैं। इसके लिए मैंने सुबह-शाम नौकरी से बचे समय को चुना है।
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bashindey anil kumar patil trains kids in sports
खिलाड़ी - फोटो : players

इस पूरे प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए मेरे एक दोस्त ने मुझे जमीन मुहैया कराई है। कोल्हापुर और सांगली जिले के आसपास के गांव के गरीब छात्र, जिन्हें सच में निःशुल्क प्रशिक्षण की जरूरत होती है, मेरे पास आते हैं। पिछले 20 सालों में मैंने एक हजार से ज्यादा छात्रों को प्रशिक्षित किया है। प्रत्येक वर्ष मेरे प्रशिक्षण केंद्र से निकले कम से कम तीन छात्र अपनी-अपनी खेल स्पर्धाओं में राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतते हैं।
कुछ वक्त पहले न्यू जलपाईगुड़ी में आयोजित अंडर-17 आयु वर्ग में तीन सौ मीटर की राष्ट्रीय दौड़ में मेरे एक छात्र किरण बिंदगे ने स्वर्ण जीता है। इसके अलावा वर्ष 2010-11 में मेरा छात्र चीन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की मैराथन में भाग ले चुका है। कई ऐसे मौके हैं, जब मेरे छात्रों ने मुझे मेरी मेहनत का सर्वोत्तम उपहार दिया है। इस पूरे सफर में कुछ ऐसे अवसर भी आए हैं, जब पैसों की कमी ने मेरे काम में खलल डालने का प्रयास किया है। ऐसे मौकों पर मेरे पूर्व छात्रों ने मेरी मदद की है। मेरे कुछ शुभचिंतकों ने मुझे सलाह भी दी कि मैं अपना केंद्र निःशुल्क न रखकर पेशेवर बना दूं और छात्रों से शुल्क लेना शुरू कर दूं, पर मैंने ऐसी कोई भी सलाह मानने से इन्कार कर दिया, क्योंकि मैंने यह काम ही निःशुल्क ट्रेनिंग के उद्देश्य से शुरू किया था।
एथलेटिक्स मेरा जुनून है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर अपने जुनून को मैं मुकाम तक नहीं पहुंचा पाया। यही वजह है कि मुझे लगता है कि मैंने खुद को अपरिवर्तनीय नुकसान पहुंचाया है। पर यही एहसास मुझे एक सहायक बनकर दूसरों को उनके लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद करता है।

विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित। प्रवाह डेस्क, अमर उजाला

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