'पक्षियों के लिए पत्नी ने मंगलसूत्र बेच दिया था'
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कन्याकुमारी का दक्षिणी तट यहां से बहुत दूर नहीं है। यहां चहुंओर हरियाली है। कुंथानकुलम का यह इलाका उन विदेशी पक्षियों के लिए जन्नत सरीखा है, जो सर्दियों में दक्षिण भारत के जलाशयों के प्रति आकर्षित होते हैं। कुल मिलाकर मेरे गांव में जैव विविधता की कमी नहीं है। मैं इसी हरे-भरे, सुंदर और मनभावन वातावरण में पला-बढ़ा हूं। बचपन में मैं अपने पिता के साथ मछलियां पकड़ने जाता था।
इन तमाम खूबसूरत परिंदों से मेरा परिचय उन्होंने ही कराया। हमारे यहां लोगों के व्यवहार में एक खास आदत शामिल है। वे इन पक्षियों को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते। उनका मानना है कि ये पक्षी अच्छी बारिश की वजह हैं और गांव की समृद्धि में इनका विशेष योगदान है। परंपराओं को सींचते-सींचते इन पक्षियों के प्रति मेरी दिलचस्पी कब अथाह प्रेम में बदल गई, पता ही नहीं चला। यह प्रेम सिर्फ मेरा ही नहीं, बल्कि समान रूप से मेरी पत्नी का भी था। हम दोनों ने मिलकर इन पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करने का फैसला किया। हमारे काम में इन पक्षियों को शिकारियों से रक्षा करने के साथ आंधी-तूफान और अन्य प्राकृतिक अनहोनियों से इनके घोसलों को नष्ट होने से बचाना शामिल था।
मुझे अच्छी तरह याद है कि एक बार मुझे पांच दर्जन से अधिक विदेशी पक्षियों की देखभाल के लिए करीब पचास हजार रुपयों की जरूरत थी। मेरी कमाई इतनी नहीं थी कि घर से दस-पंद्रह हजार रुपयों से अधिक निकलते। कोई चारा न देखकर मेरी पत्नी ने मंगलसूत्र समेत अपने सारे जेवर बेच दिए। यही नहीं, उसने रुपये एकत्र करने के लिए एक महिला मंडली का भी गठन किया। मैं जब छोटा था, तब प्रख्यात पक्षी विज्ञानी सलीम अली मेरे गांव आए थे।
उन्होंने मुझसे और अन्य ग्रामीणों से पक्षियों के व्यवहार संबंधी कई महत्वपूर्ण जानकारी साझा की थीं। मेरे काम में उनकी प्रेरणा का भी हाथ है। अपने काम को और बेहतर करने के लिए मैं कई शोध परियोजनाओं का हिस्सा बना। इससे मुझे सभी पक्षियों के वैज्ञानिक नाम मालूम हुए। मेरा काम देखते हुए वन विभाग ने मुझे अभयारण्य की देखभाल करने की नौकरी दे दी। बरसों तक मैं अपनी पत्नी के साथ जंगल के काम में मगन रहा। हम दोनों को अपने काम की ईमानदारी के लिए कई पुरस्कार भी मिले।
हम कोई ऐसा काम नहीं कर रहे थे, जिससे खूब आमदनी हो। मगर हमने जो कमाया, वह अमूल्य था। जाने-माने फिल्मकार सुरेश एलमन ने हमारे जीवन पर आधारित एक खूबसूरत वीडियो भी बनाया। बदकिस्मती से मेरी पत्नी आज जीवित नहीं है। मरने से पहले उसने मुझसे यह वायदा लिया था कि मैं ताउम्र पक्षियों के लिए ही काम करूंगा।
किसी व्यक्ति के काम में उसकी पत्नी की भागीदारी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है! दशकों के अनुभव ने मुझे चिड़ियों की दो सौ से अधिक प्रजातियों के रहन-सहन, भोजन और व्यवहार का ठीक-ठाक जानकार बना दिया है। कंुथानकुलम पक्षी अभयारण्य में समय-समय पर पक्षियों के आकर्षण में कई प्रकृतिप्रेमी, फिल्मकार और छायाकार आते रहते हैं। इन सबको मेरी जरूरत पड़ती है। ये लोग प्यार से मुझे बर्डमैन कहकर पुकारते हैं। आजकल की नई पीढ़ी का व्यवहार देखकर मुझे चिंता होती है। यद्यपि सरकार पक्षियों के संरक्षण के लिए थोड़ा-बहुत काम कर रही है, लेकिन इस दिशा में सामुदायिक स्तर पर कोई पहल नहीं दिखती।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।