10वीं क्लास की लड़की अर्वा इम्तियाज कोच नहीं हैं, पर दिव्यांग खिलाड़ियों को बनाती हैं 'चैंपियन'
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मैं कोई कोच नहीं हूं, लेकिन खिलाड़ी मेरा इंतजार करते हैं। मैं खिलाड़ी भी नहीं हूं, लेकिन बैडमिंटन के खेल से मेरा गहरा वास्ता है। कश्मीर के श्रीनगर के सर्द माहौल में मैं हर सुबह शहर के इंडोर स्टेडियम में पहुंचकर बैडमिंटन खिलाड़ियों के एक विशेष समूह की मदद करती हूं। इस समूह के सभी सदस्य बोल नहीं सकते। मैं उनसे सांकेतिक भाषा के माध्यम से संवाद स्थापित करती हूं।
मैं सरकारी स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा हूं। मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरा यह सपना कभी सच हो पाएगा। मेरा परिवार बहुत गरीब है। ऑटोरिक्शा चलाने वाले मेरे पिता अक्सर समय पर मेरी स्कूल फीस भर पाने में अक्षम होते हैं। लेकिन गरीबी मेरे लिए कभी इतनी परेशानी की बात नहीं रही, क्योंकि बचपन से इससे भी बड़ी वजह मेरे साथ है। बदकिस्मती से मेरी मां और मेरे भाई मूक-बधिर हैं। परिवार के इसी माहौल की वजह से मुझे सांकेतिक भाषा का अच्छा ज्ञान है और मैं उसका इस्तेमाल दूसरों के लिए भी कर रही हूं।
बोलने की अक्षमता मेरी मां और भाई तक ही सीमित नहीं है। आनुवांशिकता की इस कड़ी में मेरे मामा भी शामिल हैं। मूक-बधिर होने के बावजूद मेरे मामा बैडमिंडन के अच्छे खिलाड़ी हैं। दिव्यांगता की वजह से एक साथ तीन-तीन परिजनों का जीवन संघर्ष मैंने बहुत करीब से देखा है। और ऐसे अन्य मूक-बधिरों के लिए कुछ करने की प्रेरणा मुझे अपने परिजनों को ही देख कर मिली।
हालांकि मेरा काम इतना असान नहीं है। मैं जानती थी कि मेरे मामा की तरह दूसरे मूक-बधिर बच्चे भी अच्छा खेल सकते हैं। लेकिन उन्हें बैडमिंटन कोर्ट तक लाना एक चुनौतीपूर्ण काम है। उनके मां-बाप को यह समझा पाना कि उनके बच्चे खेल सकते हैं, हमेशा मुश्किल रहा।
उनके मन में अनेक आशंकाएं रहती हैं कि किस तरह उनके बच्चे कोच से बातचीत कर पाएंगे। और बिना निर्देशों को समझे वे अच्छा खेलना कैसे सीखेंगे। मैं इसी समस्या का समाधान बनने की कोशिश में हूं। मैं फिलहाल जम्मू-कश्मीर स्पोर्ट्स एसोसिएशन से जुड़े 250 दिव्यांग खिलाड़ियों को रोजाना सांकेतिक भाषा के जरिये खेल के बारे में जानकारी देती हूं। ये जानकारियां कोच से मिले निर्देश होते हैं, जिन्हें वे सीधे समझ नहीं पाते।
समस्याएं यहीं खत्म नहीं होतीं। यदि खिलाड़ी अच्छा खेलना सीख गए, तो देश के दूसरे हिस्सों में होने वाली प्रतियोगिताओं में उनकी प्रतिभागिता सुनिश्चित करवा पाना भी अलग चुनौती होता है। उदाहरण के लिए, जब जम्मू-कश्मीर की टीम को राष्ट्रीय खेलों में शामिल होने के लिए रांची जाना था, तब दिव्यांग बच्चों के मां-बाप ने उन्हें भेजने से इन्कार कर दिया। उस वक्त मैंने खुद बच्चों के मां-बाप को भरोसा दिलाया कि उनके बच्चे रांची में सुरक्षित रहेंगे।
कुछ परिवार वाले मेरी बात मान जाते हैं, तो कई पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं ये सारे काम बिना किसी मुआवजे या मदद के करती हूं। दरअसल जब मैं सन्नाटे में किसी बेजुबान की आवाज बनती हूं, तो मुझे अच्छा लगता है। पर इस काम की वजह से मेरी पढ़ाई प्रभावित होती है। पिछले साल कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में टीम को ले जाने के कारण मैं कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाईं। मगर सच कहूं, तो मुझे इसका मलाल नहीं है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।