बदनाम गलियों के 'भविष्य' को सुनहरा आयाम देना है मेरा मुकाम
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कोलकाता की बदनाम सोनागाछी की बस्तियों में उस दिन मैं सर्वेक्षण के लिए गया हुआ था। मैं एक दंपत्ति से बात कर रहा था। पास में ही उनका बच्चा भी खेल रहा था। तभी एक ग्राहक आया। महिला ने हमारी बातचीत बीच में ही छोड़ दी। वह ग्राहक से बातचीत करने के लिए कमरे में चली गई। मैं हैरान था। मेरे दिमाग में यही ख्याल आया कि कैसे कोई औरत अपने बच्चे के सामने ऐसा कर सकती है! उस वक्त यही लगा कि इससे बुरा कुछ भी नहीं हो सकता कि किसी बच्चे को यह नजारा देखना पड़े।
वैसे तो मैं एक आईटी मैनेजर हूं, मगर मैं आर्ट ऑफ लिविंग संस्था और श्रीश्री रविशंकर के विचारों से प्रभावित हूं। उन्हीं की प्रेरणा से मैं पूर्णकालिक नौकरी करने के साथ पिछले कई वर्षों से एक विशेष सामाजिक परियोजना के तहत सोनागाछी में देह व्यापार के दलदल में फंसे लोगों के बच्चों के पुनर्वास के लिए काम कर रहा हूं। उस दिन मैं अपनी टीम के साथ
वहां के लोगों की समस्याओं को जानने के लिए सोनागाछी गया था। लोगों को हमारी किसी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था।
उन्हें लगा कि हम भी किसी सामान्य एनजीओ की तरह उनकी बस्ती में आए हैं, जो कुछ दिन काम करके वहां से चले जाएंगे। वेश्यालय प्रबंधकों को हमसे जो दिक्कतें थीं, सो अलग। अपने काम के लिए बड़ी मुश्किल से हमें वहां जगह मिली। चूंकि मैंने तय कर लिया था कि मैं वहां के बच्चों पर केंद्रित रहूंगा और उन्हीं को अच्छी शिक्षा आदि से बेहतर इंसान बनाने का जतन करूंगा। लेकिन कई मुश्किलों के बाद केवल केंद्र खोल देने से ही कुछ नहीं होने वाला था।
लोग अपने बच्चों को हमारे पास भेजने को राजी ही नहीं थे। जिन दो-चार बच्चों के साथ हमने अपना कार्यक्रम शुरू भी किया, उनका भावनात्मक स्तर एकदम जुदा था। मैं सामान्य बच्चों से बात करने का अभ्यस्त था। पर उन बच्चों ने बहुत कम उम्र में दुनिया की इतनी बुराइयां देख रखी थीं कि उनके लिए बुराइयों की परिभाषा ही बदल चुकी थी। पांच साल का बच्चा भी ऐसी बातें करता, जो हमारी दुनिया में बड़े लोग भी न कर पाएं।
प्यार-दुलार जैसी बुनियादी मानवीय व्यवहार से उनका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं था। 2012 में केंद्र खोलने के अगले दो वर्षों तक हमें काफी परेशानी हुई। 2014 से हमने विधिवत अपना काम शुरू कर दिया। सबसे पहले एक-एक दरवाजे तक जाकर मैंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि हम उनके बच्चों की बेहतरी के लिए काम करना चाहते हैं। धीरे-धीरे ही सही, हमारे केंद्र पर बच्चों का आना शुरू हो गया। मैं अपनी टीम के साथ उन बच्चों को सामान्य पढ़ाई के साथ योग, ध्यान व दूसरी जरूरी गतिविधियों से परिचित कराने लगा। बीतते वक्त के साथ हमारे काम का अच्छा परिणाम दिखने लगा।
मेरी सबसे बड़ी सफलता यही रही कि इन बदनाम गलियों के करीब दो सौ बच्चे, जिनके दिमाग में सपनों का भी टोटा रहता है, आज मुख्यधारा की जिंदगी के बारे में सोच रहे हैं। मेरे पास उन्हें आगे तक ले जाने की भी योजना है। मेरी टीम उन लोगों के पुनर्वास के लिए भी काम करती है, जो सोनागाछी की गलियों में रिटायर हो चुके हैं। महज चालीस वर्ष की उम्र में 'बेकार' हो जाने वाले ऐसे लोगों की समस्या और भी ज्यादा है। मैं तो यह चाहता हूं कि सोनागाछी की पूरी पहचान ही बदल जाए, लेकिन इसके लिए हर उस शख्स को सोचना होगा, जो वहां जाते हैं और बिना ऐसा कुछ सोचे वापस लौट आते हैं।