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रंग लाया अमृता का संघर्ष, महाराष्ट्र सरकार ने दिया अनाथों को नौकरी में 1 फीसदी आरक्षण

Tue, 03 Apr 2018 01:14 AM IST
अमृता करवंदे
अमृता करवंदे Updated Tue, 03 Apr 2018 01:14 AM IST
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Amruta Karvande struggle Maharashtra government announced one percent reservation for orphans
Amruta Karvande

मुझे अपनी मां और पिता का चेहरा याद नहीं है। बस इतना याद है कि जब मैं बहुत छोटी थी, तब से अनाथालय में रही हूं। मुझे नहीं पता कि वह कौन-सी मजबूरी थी, जिसने मेरे पिता को मुझे ढाई साल की उम्र में अनाथालय में छोड़ने पर विवश कर दिया था।

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मुझे खुद से दूर करते वक्त अनाथालय के रजिस्टर में उन्होंने मेरा नाम और उपनाम लिख दिया था। उनकी यही विरासत अब तक मेरे साथ है। अट्ठारह साल की उम्र तक मैं गोवा के मातृछाया (अनाथालय) में रही। अनाथालय में मेरी जैसी कई लड़कियां थीं। कई मर्तबा हमें परिवार, मां-बाप की कमी खलती, लेकिन हम जानते थे कि यह कमी कभी नहीं पूरी होने वाली। इन्हीं एहसासों ने मुझे वक्त से पहले समझदार बना दिया।
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समय बीतता गया और मैं बड़ी होती गई। जब मैं बालिग हो गई, तो अनाथालय के नियमों के मुताबिक, मुझे अनाथालय छोड़ना था। कागजी नियम के हिसाब से यह मान लिया जाता है कि अट्ठारह की उम्र में कोई भी व्यक्ति अपना ख्याल रख सकता है और उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं होती। लेकिन मुझे तो जरूरत थी! मैं अभी पढ़ रही थी और डॉक्टर बनना चाहती थी। अनाथालय की दूसरी लड़कियों की तरह मैं जल्द शादी करके घर बसाने का बिल्कुल भी नहीं सोच रही थी। मेरे लिए एक लड़का भी ढूंढ लिया गया था। मैं जिंदगी के एक ऐसे मोड़ पर थी, जब पहली बार मुझे एक बड़ा फैसला करना था।

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Amruta Karvande struggle Maharashtra government announced one percent reservation for orphans

या तो मैं शादी करके औरों की तरह सामान्य जिंदगी चुनती या फिर अनाथालय छोड़कर बिल्कुल अंजान दुनिया में अपना रास्ता खुद बनाती। मैंने दूसरा विकल्प चुना। उस वक्त मुझे कुछ नहीं पता था कि मैं क्या करूं, कहां जाऊं। सच कहूं, तो मैं भयानक डरी हुई थी। किसी तरह मैंने खुद को संभाला और पुणे आ गई। पुणे में भी मेरा कोई नहीं था, मुझे पहली रात स्टेशन पर बितानी पड़ी। यहीं से मेरा असल संघर्ष शुरू हुआ।

अस्तित्व के लिए मैंने घरों, दुकानों और अस्पतालों में काम किया। फिर इन्हीं काम के बदले मिले कुछ पैसों को जोड़कर एक कॉलेज में प्रवेश लिया। मैं दिन में काम करती और सांध्य कक्षाओं में हिस्सा लेती। मुझे रहने के लिए सरकारी छात्रावास मिला था। इसी तरह दिन में एक बार खाना खाकर मैंने आखिरकार स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली। डॉक्टर बनने का सपना तो कब का टूट चुका था, अब मैंने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की परीक्षा में बैठने का फैसला किया।

मैं परीक्षा में बैठी और 39 फीसदी अंक अर्जित किए। आरक्षण प्रवाधानों में नॉन क्रीमीलेयर के लिए पैंतीस फीसदी कट ऑफ था, पर मेरे पास नॉन क्रीमीलेयर परिवार से होने का कोई प्रमाण पत्र नहीं था। मेरे लिए यह सबसे नई समस्या थी। मुझे यह बात अखर गई कि देश में अनाथों के लिए आरक्षण की कोई पृथक व्यवस्था नहीं है। इस विषय पर गहन चिंतन करने के बाद मैंने तय कर लिया कि इस विषय को राज्य के मुख्यमंत्री तक पहुंचाऊंगी।

लेकिन मुख्यमंत्री से मिल पाना इतना आसान नहीं था। मगर मैंने भी उनसे मिलने की ठान रखी थी, जिसमें मुझे सफलता मिली भी। मुख्यमंत्री ने मेरी बात ध्यान से सुनी और इस बारे में कोई ठोस कदम उठाने का भरोसा दिलाया। मुलाकात के तीन महीने बाद ही महाराष्ट्र सरकार ने अनाथों के लिए सरकारी नौकरी में एक फीसदी आरक्षण का प्रावधान लाने का एलान कर दिया। मैं अभी एमए की पढ़ाई कर रही हूं और मैं चाहती हूं कि ऐसा पूरे देश में हो।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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