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'मैं किसानों की बेहतरी के लिए काम करना चाहता हूं, क्योंकि इनके बिना हमारे अस्तित्व की कल्पना नहीं'

Thu, 30 Aug 2018 02:14 PM IST
अजय गोपी
अजय गोपी Updated Thu, 30 Aug 2018 02:14 PM IST
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Ajay Gopi- Work for Betterment of farmers and founder of Hands on Agriculture
अजय गोपी

मालूम नहीं, क्यों मेरे पिता मुझे इलेक्ट्रीशियन बनाना चाहते थे, जबकि मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैं क्या बनना चाहता था, यह तो नहीं पता था, लेकिन मैं कुछ नया करना चाहता था।

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मैं कर्नाटक के मंगलूरू में रहने वाला बाईस साल का युवा उद्यमी हूं। शुरू से ही फोटोग्राफी मेरा शौक रहा है। बचपन से ही मैं कई रचनात्मक चीजें बनाता रहा हूं। फिर चाहे वह पेंट के माध्यम से हो या कागज आदि से। लेकिन जब जिंदगी में कुछ बनने का मौका आया, तो मुझसे कहा गया कि मुझे अपनी सारी रचनात्मकता बतौर इलेक्ट्रीशियन दिखानी चाहिए। मुझे यह नामंजूर था। मैं अपने लिए कोई ऐसा ठिकाना ढूंढने लगा, जो मेरी भावनाओं को समझ सके। मुझे वह माहौल प्रदान करे, जहां मैं स्वतंत्र रूप से अपने दिमाग का प्रयोग कर सकूं। इसी बीच मुझे बंगलूरू की एक ऐसी संस्था के बारे में पता चला, जो बच्चों को उनके मनमुताबिक शिक्षा प्रदान करके उनके सपने पूरे करने में मदद करती है।
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यह मेरी खुशकिस्मती ही थी कि डिजाइन एजुकेशन फॉर योरसेल्फ (डेफी) नामक इस संस्था से मैं जुड़ गया। हालांकि इसके लिए मुझे अपना घर छोड़ना पड़ा। यहां रहकर मुझे अपनी किसी भी योजना के विकास के लिए पूरी आजादी और मदद मिली। यहां अनेक कंप्यूटरों की मदद से तमाम तरह की निःशुल्क शैक्षणिक गतिविधियां भी चलाई जाती हैं। मतलब कि यदि किसी छात्र के दिमाग में कोई भी विचार अंकुरित हो रहा है, तो यहां उसके पोषण की पूरी व्यवस्था है।

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किसानों को एक्वापोनिक्स खेती के लिए प्रोत्साहित करता हूं

आगे चलकर मैं यहीं की एक परियोजना का मुखिया बन गया। चूंकि मैं एक किसान परिवार से आता हूं, इसलिए खेती और इससे जुड़ी खबरों से मेरा वास्ता पड़ता रहा है। मुझे पता है कि राज्य में हर साल सैकड़ों किसान बारिश पर निर्भरता और कर्ज के कुचक्र में फंसकर खुदकुशी कर लेते हैं। मैंने इसी समस्या को ध्यान में रखकर कोई समाधान निकालने की सोची। इस दिशा में क्या कुछ किया जा सकता है, यह जानने के लिए इंटरनेट पर घंटों बिताए।

इसी दरम्यान मेरे एक जीवविज्ञानी मित्र, जो कि काम के सिलसिले में अमेरिका तक जा चुके हैं, ने मुझे एक सलाह दी। उन्होंने मुझे एक नई तरह की खेती-'एक्वापोनिक्स' के बारे में बताया। इस तरीके की खेती में आम तौर पर लगने वाले पानी के महज दस फीसदी पानी की मदद से पौधे दोगुनी रफ्तार से बढ़ते हैं। मछलियों और पौधों को मिलाकर की जाने वाली खेती के बारे में मैंने कुछ किसानों को बताया। उनसे बात करने के बाद मुझे अंदाजा हो गया कि वे मेरी बात इतनी आसानी से नहीं मानने वाले हैं। मुझे उन्हें मनाने के लिए पहले परिणाम दिखाना था।

मुझे एक तरकीब सूझी। मैंने किसानी करने वाले उन बच्चों को विश्वास में लेना शुरू किया, जो डेफी में पढ़ने आते थे। इसके लिए मैंने बाकायदा एक छोटा एक्वापोनिक्स सेटअप तैयार किया। मेरी कवायद का असर दिखने लगा, जब कुछ किसान मेरा सेटअप देखने आने लगे। वहां हो रही विशेष खेती के नमूने देखने के बाद उन्होंने उस तंत्र को अपनाने के लिए हामी भर दी। जल्द ही मैंने तरानीरू नाम से अपना स्टार्टअप शुरू कर दिया। इसके तहत मैं किसानों को एक्वापोनिक्स खेती के लिए प्रोत्साहित करता हूं। मैं उन किसानों की बेहतरी के लिए काम करना चाहता हूं, जो हमारा पेट भरते हैं और जिनके बिना हमारे अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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