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Ujjain: विक्रम विश्वविद्यालय में रामायण युग पर रिसर्च, धनुषकोड़ी जाकर रामसेतु के पत्थरों पर शोध करेगी टीम

Sun, 21 Jan 2024 09:25 AM IST
अर्पित याज्ञनिक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: अर्पित याज्ञनिक Updated Sun, 21 Jan 2024 09:25 AM IST
सार

राम नाम लिखे पत्थरों पर शोध के बाद तैयार कृत्रिम पत्थर से बिल्डिंग और पुल-पुलिया बनाए जा सकेंगे। भूकंप वाले क्षेत्रों में घरों के निर्माण में काम आएगा, लैब में तैयार कृत्रिम मटेरियल।

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Ujjain News: Vikram University team will go to Dhanushkodi and research on the stones of Ram Setu
साउथ का धनुषकोड़ी स्थान जहां उज्जैन से रिसर्च टीम जाएगी - फोटो : Amar Ujala Digital

विस्तार

विक्रम विश्वविद्यालय में रामायण युग पर हो रहे रिसर्च पर एक बड़ी तैयारी की जा रही है। दरअसल दो वर्ष पहले राम सेतु से बने पत्थरों के परीक्षण कर उन्हें बनाने के लिए विक्रम विश्वविद्यालय ने एक एमओयू साइन किया था। इसके तहत विक्रम विश्वविद्यालय की चयनित रिसर्च टीम साउथ के धनुष कोड़ी जाकर रिसर्च करेगी।

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इस प्रोजेक्ट के बारे में उज्जैन विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अखिलेश पांडे ने बताया कि रामसेतु में उपयोग किए गए राम नाम लिखे पत्थरों के रिसर्च के लिए विक्रम विश्वविद्यालय की चयनित रिसर्च टीम साउथ के धनुष कोड़ी जाकर रिसर्च करेगी। दो वर्ष पहले विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन ने उज्जैन के शासकीय इंजीनियरिंग कालेज के साथ मेमोरेन्डम ऑफ अंडरस्टेडिंग (एमओयू) साइन किया था। इस रिसर्च में रामसेतु के पत्थरों का लैब परीक्षण करने के बाद इसी तरह के मटेरियल का निर्माण किया जाएगा। 
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एमओयू के अनुसार विक्रम विश्वविद्यालय के स्कूल आफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलाजी (एसओइटी) के विद्यार्थी गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कालेज की लैब में प्रोजक्ट कर सकेंगे। दोनों संस्थान के विद्यार्थी रामसेतु निर्माण में उपयोग किए तैरने वाले पत्थरों पर शोध कर समतुल्य मटेरियल का निर्माण करेंगे। 
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रिसर्च टीम का परीक्षण सफल रहा तो बहुत जल्द ही उज्जैन की लैब में ही रामसेतु जैसे तैरने वाले पत्थरों का निर्माण किया जाएगा। बायो डिग्रेडेबल मटेरियल एवं मशरूम मायसिलियम का उपयोग कर हल्की ईंट बनाई जाएगी और पानी में तैरने वाली ईंट बनाई जाएगी। कुलपति ने कहा है कि प्राचीन ग्रन्थों और पुराणों का अध्ययन कर नवशोध को बढ़ाएंगे। 

कुलपति के अनुसार रामायण की उस घटना के बारे में तो सब जानते होंगे, जब राम का नाम लिखने पर पत्थर तैरने लगे थे। इन पत्थरों का उपयोग करके श्रीराम और राम जी की वानर सेना समुद्र पार कर श्रीलंका पहुंची थी। विक्रम विश्वविद्यालय इस पत्थर पर रिसर्च करने की शुरुआत की थी। इस रिसर्च पर शोधकर्ताओं ने सभी डाटा कलेक्ट कर लिया है। टीम साउथ भी जा रही है और जल्द ही लैब में ये पत्थर बनाएं जाएंगे। इस स्ट्रक्चर का कृत्रिम रूप से निर्माण वैज्ञानिकों के लिए बड़ी उपलब्धि साबित होगी। यह मटेरियल भूकंप वाले क्षेत्रों में घरों के निर्माण में काम आएगा। इनका प्रयोग कर देश में हल्के बिल्डिंग और पुल-पुलिया बनाए जा सकेंगे।


3500 साल पुराना है रामसेतु
रामायण के अनुसार रामसेतु 3500 साल पुराना है, तो कुछ लोग इसे 7000 हज़ार साल पुराना बताते हैं। नासा, इसरो, आईआईटी जैसे कई संस्थानों ने यह तो पता लगा लिया है कि यह पत्थर प्यूबिक मटेरियल से बना है। इस रिसर्च में इस पर और आगे शोध किया जाएगा। यह जानने का प्रयास किया जाएगा कि इस पत्थर का स्ट्रक्चर क्या है और उसमें कितना वजन झेलने की क्षमता है।

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