एमपी: ओरछा में योद्धा स्वरूप में दर्शन देंगे रामराजा सरकार, दशहरे पर 400 साल पुरानी राजसी परंपरा का निर्वहन
ओरछा में विजयादशमी पर रामराजा सरकार के दरबार में 400 साल पुरानी राजसी परंपरा निभाई जा रही है। इस विशेष अवसर पर प्रभु राम योद्धा स्वरूप में दर्शन देंगे। शस्त्र पूजन के बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के द्वार खोले जाएंगे।
विस्तार
बुंदेलखंड की अयोध्या के रूप में प्रसिद्ध ओरछा में विजयादशमी का पर्व विशेष राजसी अंदाज में मनाया जा रहा है। इस रियासत के एकमात्र और जीवंत शासक माने जाने वाले श्री रामराजा सरकार प्रजा को योद्धा के स्वरूप में दर्शन देंगे। ओरछा में दशहरा केवल धार्मिक उत्सव न होकर 400 वर्ष पुरानी उस राजसी परंपरा का प्रतीक है, जिसमें राजा की विजय यात्रा, शस्त्र पूजन और विजय प्रस्थान का आयोजन होता है। इस वर्ष भी दशहरे के दिन मंदिर के कपाट अपने सामान्य समय नहीं खुले। प्रभु राम रावण का संहार करने वाले प्रतापी योद्धा का रूप धारण करेंगे। गर्भगृह में विशेष अनुष्ठान होने के उपरांत दोपहर में आम श्रद्धालुओं के लिए दरबार खोला जाएगा, ताकि सभी भक्त अपने राजा के विजय प्रस्थान का साक्षी बन सकें।
योद्धा स्वरूप में प्रभु के दर्शन
सामान्य दिनों में ओरछा के मंदिर में भगवान राम के शांत, सौम्य और वात्सल्य भाव से परिपूर्ण बाल रूप के दर्शन होते हैं। हालांकि दशहरे के दिन उनका यह रूप पूर्णतः परिवर्तित होकर चक्रवर्ती सम्राट और प्रतापी योद्धा के रूप में दिखाई देता है। इस विशेष अवसर पर प्रभु के विग्रह को राजसी युद्ध पोशाक धारण कराई जाती है। उनके दाहिने हाथ में सोने और चांदी से जड़ित चमचमाती असली तलवार सौंपी जाती है, जबकि बाएं हाथ में ढाल सजाई जाती है।
यह योद्धा स्वरूप इस महान विचार को दर्शाता है कि आदर्श शासक केवल राजसिंहासन पर बैठने के लिए नहीं होता, बल्कि अपनी प्रजा की रक्षा, समाज में न्याय की स्थापना और दुष्ट शक्तियों के विनाश के लिए सदैव तत्पर रहता है। प्रभु के इस अलौकिक और तेजस्वी स्वरूप का दर्शन करने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु ओरछा पहुंचते हैं।
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गर्भगृह में गुप्त अनुष्ठान और पूजन
दशहरे के दिन प्रातः मंदिर के गर्भगृह में केवल मुख्य पुजारियों का प्रवेश होता है। आम जनता के प्रवेश से पहले गर्भगृह के भीतर अत्यंत गोपनीय और विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। मुख्य पुजारी इस दौरान प्रभु के प्राचीन शस्त्रों का विधि-विधान से पूजन करते हैं। शस्त्र पूजा की प्रक्रिया पूर्ण होने के पश्चात ही भगवान राम का अलौकिक शृंगार कर उन्हें विजय यात्रा के लिए सुसज्जित किया जाता है।
मुख्य पुजारी पंडित रमा महाराज ने बताया कि संपूर्ण पूजा विधान होने के बाद मंदिर के मुख्य द्वार खोले जाएंगे। इसके बाद ही आम जनता और श्रद्धालु राजा रामराजा सरकार के दरबार में उपस्थित होकर उनकी विजय यात्रा का दर्शन कर सकेंगे और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे।
राजसी पान प्रसाद और कौमी एकता
दशहरे पर ओरछा आने वाले श्रद्धालुओं को साधारण मिष्ठान के बजाय राजसी परंपरा के अनुसार विशेष पान का बीड़ा, इत्र और इत्र की खाड़ी का प्रसाद प्रदान किया जाता है। यह अनूठी परंपरा प्राचीन बुंदेला सैन्य संस्कृति से जुड़ी है। जब बुंदेला राजा दशहरे के दिन सीमा पार विजय अभियान या युद्ध यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे, तब राजमहल से विदा लेते समय राजमाता या पटरानी उन्हें अपने हाथों से पान का बीड़ा खिलाती थीं और सुगंधित इत्र छिड़कती थीं।
इसके अतिरिक्त यह दरबार कौमी एकता की भी अद्भुत मिसाल प्रस्तुत करता है। प्रभु के राजसी जरीदार वस्त्र और मुकुट पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानीय मुस्लिम कारीगरों द्वारा अत्यंत श्रद्धा के साथ तैयार किए जाते हैं। इस प्रकार ओरछा का दशहरा अपनी सर्वधर्म समभाव की विशिष्ट संस्कृति और ऐतिहासिक परंपरा को आज भी पूरी जीवंतता के साथ संजोए हुए है।
