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सवर्णों का आंदोलन, कहीं खड़ी न कर दे भाजपा के लिए मुसीबत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Updated Wed, 19 Sep 2018 03:17 PM IST
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करणी सेना
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मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों को देखते हुए सभी राजनीतिक दल इस समय मतदाताओं की नाराजगी को दूर करने और उन्हें संतुष्ट करने में लगे हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए सवर्णों का आंदोलन अब एक चुनौती बनता जा रहा है। वर्तमान में इस चुनौती का सबसे ज्यादा सामना भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जन आर्शीवाद यात्रा को करना पड़ रहा है।
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करणी सेना ने जिस तरह उज्जैन में एससी-एसटी एक्ट के विरोध में भीड़ जुटाई उससे मध्यप्रदेश का राजनीतिक माहौल काफी गर्म हो गया है। सामान्य वर्ग एवं अनुसूचित जाति-जनजाति के बीच पदोन्न्ति में आरक्षण से शुरू हुआ यह विवाद अब बड़े विरोध का रूप लेता जा रहा है। जहां भाजपा इससे चिंतित है वहीं कांग्रेस के लिए यह फायदा पहुंचाने वाली बात हो सकती है। भाजपा के पारंपरिक वोट अपना रुख बदलते है तो इसका सबसे ज्यादा लाभ प्रदेश में कांग्रेस को ही होगा।
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वहीं दूसरी ओर इससे अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के मतदाता पशोपेश में आ गए हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि सही मायनों में उनके हितों का ध्यान कौन सी पार्टी रखेगी। एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन से भाजपा ने ये संदेश तो दिया ही है कि वह उनके हितों की रक्षा करेगी। अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग की 82 सीटें (अजा-35, अजजा-47) हैं। इस बात को ध्यान में रखकर कोई भी दल इन्हें हल्के में नहीं ले रहा है।
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एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट को लेकर अब करणी सेना चित्तौड़ में अपने आगे की रणनीति तैयार करने वाली है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 23 सितंबर को इस संबंध में बैठक होने वाली है। इस बैठक में आंदोलन को और तेज करने और कई राज्यों तक पहुंचाने पर विचार किया जाएगा। वहीं सपाक्स (सामान्य, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक समाज संस्था) ने चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला कर लिया है जो कि सवर्ण वोट बैंक के लिए एक और विकल्प के रूप में सामने रहेंगे। इन परिस्थितियों को देखते हुए भाजपा के लिए इस बार सत्ता की राह मुश्किल भरी होगी।
