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ओंकारेश्वर: ‘वेद प्रामाण्यम विचार’ पर 95वीं शंकर व्याख्यानमाला, आत्मविद्या और वेदों के प्रमाण पर मंथन
Sun, 27 Sep 2026 07:56 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Sun, 27 Sep 2026 07:56 PM IST
सार
ओंकारेश्वर में 95वीं शंकर व्याख्यानमाला में ‘वेद प्रामाण्यम विचार’ विषय पर स्वामिनी तत्त्वप्रियानन्द सरस्वती ने वेदों के प्रामाण्य, आत्मविद्या और वेदांत की प्रासंगिकता पर विचार रखे। उन्होंने कर्मकांड, ज्ञानकांड और छह प्रमाणों की व्याख्या करते हुए आत्मज्ञान को अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान बताया।
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स्वामिनी तत्त्वप्रियानन्द सरस्वती
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की ओर से आयोजित 95वीं शंकर व्याख्यानमाला में ‘वेद प्रामाण्यम विचार’ विषय पर विशेष व्याख्यान हुआ। तत्त्वप्रियानन्द सरस्वती जी ने वेदों के प्रामाण्य, ज्ञान के स्वरूप, आत्मविद्या तथा जीवन में वेदांत की प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखे।
स्वामिनी जी ने कहा कि ‘वेद’ शब्द ‘विद्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ जानना अथवा ज्ञान है। वेदों में निहित ज्ञान को ‘आर्ष विद्या’ कहा गया है, क्योंकि ऋषियों ने इन शाश्वत सत्यों का साक्षात्कार किया और उन्हें मानव कल्याण के लिए परंपरा में संरक्षित किया। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार वैज्ञानिक प्रकृति में पहले से विद्यमान नियमों की खोज करते हैं, उसी प्रकार ऋषियों ने अस्तित्व और जीवन के मूल सत्यों का साक्षात्कार किया।
व्याख्यानमाला में वेद के दो प्रमुख पक्षों कर्मकांड और ज्ञानकांड (वेदांत) की भी विवेचना की गई। कर्मकांड में मनुष्य की विभिन्न इच्छाओं, आवश्यकताओं तथा उनके अनुरूप कर्मों का विधान है। मनुष्य स्वयं को अपूर्ण मानकर इच्छाओं की पूर्ति के माध्यम से पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करता है। इसके विपरीत वेदांत इच्छाओं की पूर्ति से आगे बढ़कर इच्छा करने वाले ‘स्वयं’ के स्वरूप की पड़ताल करता है और आत्मज्ञान के माध्यम से मनुष्य की मूल पूर्णता का बोध कराता है।
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आत्मविद्या किसी बाहरी वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का ज्ञान
उन्होंने भारतीय दर्शन में मान्य प्रत्यक्ष, अनुमान, अर्थापत्ति, उपमान, अनुपलब्धि और शब्द प्रमाण सहित छह प्रमाणों पर भी विस्तार से चर्चा की। स्वामिनी जी ने बताया कि इंद्रियों और सामान्य बुद्धि की पहुंच से परे आत्मतत्त्व को जानने में शब्द प्रमाण, विशेष रूप से वेदांत शास्त्र और गुरु-शिष्य परंपरा, का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मविद्या किसी बाहरी वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का ज्ञान है।
इस अवसर पर वेद, प्रमाण और आत्मविद्या के पारस्परिक संबंध पर हुई चर्चा ने वेदांत के दार्शनिक पक्ष को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान की। व्याख्यानमाला आध्यात्मिक जिज्ञासुओं और वेदांत के अध्ययन में रुचि रखने वाले साधकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी रही।
स्वामिनी तत्त्वप्रियानन्द सरस्वती जी वर्तमान में वडोदरा, गुजरात में वेदान्त और आध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। आपका अधिकांश व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन वडोदरा में ही बीता है, और आपका लालन-पालन एक सुखी, सुसंस्कृत तथा आध्यात्मिक वातावरण वाले परिवार में हुआ। जीवन के मूल उद्देश्य और आत्मज्ञान की जिज्ञासा ने आपको स्वामी ब्रह्मात्मानन्द सरस्वती जी के सान्निध्य तक पहुँचाया, जहाँ आपने शास्त्रों का अध्ययन किया। इसके पश्चात, आपने वर्ष 2010 से 2013 तक स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के कोयंबटूर आश्रम में रहकर वेदान्त शास्त्र और संस्कृत का गहन अध्ययन किया, जिसने आपके आध्यात्मिक जीवन को एक सुदृढ़ दिशा प्रदान की। वर्तमान में आप वेदान्त शास्त्र के अध्ययन, मनन और प्रचार-प्रसार के माध्यम से शास्त्र-प्रतिपादित आत्मज्ञान को सरल व व्यावहारिक रूप में साधकों तक पहुंचाने की निरंतर यात्रा में संलग्न हैं।
ज्ञात हो कि न्यास द्वारा पिछले 7 वर्षों से अधिक समय से निरंतर विविध विषयों पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से देशभर के लाखों श्रोता जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त न्यास द्वारा ओंकारेश्वर में एकात्मता का वैश्विक केंद्र - 'एकात्म धाम' विकसित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 108 फीट ऊंची आदि शंकराचार्य जी की 'एकात्मता की प्रतिमा' मान्धाता पर्वत पर स्थापित की गई। इससे अतिरिक्त अद्वैत लोक - संग्रहालय तथा आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की भी स्थापना की जा रही है।
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स्वामिनी जी ने कहा कि ‘वेद’ शब्द ‘विद्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ जानना अथवा ज्ञान है। वेदों में निहित ज्ञान को ‘आर्ष विद्या’ कहा गया है, क्योंकि ऋषियों ने इन शाश्वत सत्यों का साक्षात्कार किया और उन्हें मानव कल्याण के लिए परंपरा में संरक्षित किया। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार वैज्ञानिक प्रकृति में पहले से विद्यमान नियमों की खोज करते हैं, उसी प्रकार ऋषियों ने अस्तित्व और जीवन के मूल सत्यों का साक्षात्कार किया।
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व्याख्यानमाला में वेद के दो प्रमुख पक्षों कर्मकांड और ज्ञानकांड (वेदांत) की भी विवेचना की गई। कर्मकांड में मनुष्य की विभिन्न इच्छाओं, आवश्यकताओं तथा उनके अनुरूप कर्मों का विधान है। मनुष्य स्वयं को अपूर्ण मानकर इच्छाओं की पूर्ति के माध्यम से पूर्णता प्राप्त करने का प्रयास करता है। इसके विपरीत वेदांत इच्छाओं की पूर्ति से आगे बढ़कर इच्छा करने वाले ‘स्वयं’ के स्वरूप की पड़ताल करता है और आत्मज्ञान के माध्यम से मनुष्य की मूल पूर्णता का बोध कराता है।
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आत्मविद्या किसी बाहरी वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का ज्ञान
उन्होंने भारतीय दर्शन में मान्य प्रत्यक्ष, अनुमान, अर्थापत्ति, उपमान, अनुपलब्धि और शब्द प्रमाण सहित छह प्रमाणों पर भी विस्तार से चर्चा की। स्वामिनी जी ने बताया कि इंद्रियों और सामान्य बुद्धि की पहुंच से परे आत्मतत्त्व को जानने में शब्द प्रमाण, विशेष रूप से वेदांत शास्त्र और गुरु-शिष्य परंपरा, का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मविद्या किसी बाहरी वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का ज्ञान है।
इस अवसर पर वेद, प्रमाण और आत्मविद्या के पारस्परिक संबंध पर हुई चर्चा ने वेदांत के दार्शनिक पक्ष को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान की। व्याख्यानमाला आध्यात्मिक जिज्ञासुओं और वेदांत के अध्ययन में रुचि रखने वाले साधकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी रही।
स्वामिनी तत्त्वप्रियानन्द सरस्वती जी वर्तमान में वडोदरा, गुजरात में वेदान्त और आध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। आपका अधिकांश व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन वडोदरा में ही बीता है, और आपका लालन-पालन एक सुखी, सुसंस्कृत तथा आध्यात्मिक वातावरण वाले परिवार में हुआ। जीवन के मूल उद्देश्य और आत्मज्ञान की जिज्ञासा ने आपको स्वामी ब्रह्मात्मानन्द सरस्वती जी के सान्निध्य तक पहुँचाया, जहाँ आपने शास्त्रों का अध्ययन किया। इसके पश्चात, आपने वर्ष 2010 से 2013 तक स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के कोयंबटूर आश्रम में रहकर वेदान्त शास्त्र और संस्कृत का गहन अध्ययन किया, जिसने आपके आध्यात्मिक जीवन को एक सुदृढ़ दिशा प्रदान की। वर्तमान में आप वेदान्त शास्त्र के अध्ययन, मनन और प्रचार-प्रसार के माध्यम से शास्त्र-प्रतिपादित आत्मज्ञान को सरल व व्यावहारिक रूप में साधकों तक पहुंचाने की निरंतर यात्रा में संलग्न हैं।
ज्ञात हो कि न्यास द्वारा पिछले 7 वर्षों से अधिक समय से निरंतर विविध विषयों पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से देशभर के लाखों श्रोता जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त न्यास द्वारा ओंकारेश्वर में एकात्मता का वैश्विक केंद्र - 'एकात्म धाम' विकसित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 108 फीट ऊंची आदि शंकराचार्य जी की 'एकात्मता की प्रतिमा' मान्धाता पर्वत पर स्थापित की गई। इससे अतिरिक्त अद्वैत लोक - संग्रहालय तथा आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की भी स्थापना की जा रही है।
