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जिजीविषा: एक मूल्यवान रिश्ते को खो दिया, क्या सिखाती है पंचतंत्र के 'मित्र भेद' में वर्णित यह कहानी

Sun, 20 Oct 2024 07:39 PM IST
Ananya Mishra अनन्या मिश्रा
Updated Sun, 20 Oct 2024 07:39 PM IST
सार

पंचतंत्र के ‘मित्र भेद’ में वर्णित यह कहानी हमें अपने वास्तविक स्वरूप को गलत समझने के खतरों और बाहरी प्रभावों को निर्देशित करने की अनुमति देने के परिणामों के बारे में सिखाती है। पिंगलक एक मूल्यवान रिश्ते को खो दिया।

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Survival: IIM Indore Dr. Ananya Mishra Column Long live my lion!
जिजीविषा: डॉ. अनन्या मिश्रा का कॉलम। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक बार एक घने जंगल में पिंगलक नाम का एक बूढ़ा शेर रहता था। अद्भुत था वह। शक्तिशाली। अद्वितीय। कोई भी प्राणी उसे चुनौती देने की हिम्मत नहीं करता था। वहीं, अपने मालिक द्वारा छोड़े जाने के बाद, संजीवक नाम का बैल जंगल में भटक गया और पिंगलक को मिल गया। शुरू में पिंगलक ने बैल को खा लेने की योजना बनाई, क्योंकि उसका बल पिंगलक के शासन के लिए हानिकारक हो सकता था। लेकिन, संजीवक की बुद्धि और वाकपटुता ने उसका विश्वास जीत लिया और वे घनिष्ठ मित्र बन गए। संजीवक राज्य के मामलों में पिंगलक को सलाह देने लगा और उनकी मित्रता प्रगाढ़ हो गई। हालांकि, पिंगलक के दो ईर्ष्यालु और असुरक्षित मंत्रियों– करटक और दमनक ने पिंगलक को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की, कि संजीवक उसके खिलाफ साजिश कर रहा है। संदेह और भय से भ्रमित हो कर, पिंगलक ने अंततः अपने प्रिय मित्र को धोखा दिया, जिससे संजीवक का दुखद अंत हुआ।

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पंचतंत्र के ‘मित्र भेद’ में वर्णित यह कहानी हमें अपने वास्तविक स्वरूप को गलत समझने के खतरों और बाहरी प्रभावों-जैसे भय, संदेह और अहंकार को अपने कार्यों को निर्देशित करने की अनुमति देने के परिणामों के बारे में सिखाती है। पिंगलक के मामले में, उसकी आंतरिक उथल-पुथल और असुरक्षा ने उसे उसके वास्तविक स्व और बुद्धि से दूर कर दिया, जिसके कारण उसने एक मूल्यवान रिश्ते को खो दिया। जिस तरह पिंगलक ने अपने डर को अपने ऊपर हावी होने दिया, उसी तरह हम अक्सर बाहरी कारकों- अपने अहंकार, असुरक्षा और सामाजिक अपेक्षाओं को अपने निर्णयों को निर्धारित करने देते हैं, जिससे हम अपने सच्चे स्व को समझने से रोकते हैं। यह हमें देही, आत्मा और पुरुष की अवधारणाओं की ओर ले जाता है।
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मैं इसकी चर्चा क्यों कर रही हूं? क्योंकि यह हमारे सीमित दृष्टिकोण से उत्पन्न होने वाले भ्रमों के बारे में सिखाता है – उन भ्रमों के बारे में, जो हमारे ‘स्व’ की समझ को धुंधला कर देते हैं। वे भ्रम जो अक्सर शक्ति, अहंकार और अज्ञानता के साथ उत्पन्न होते हैं। वे भ्रम जो हमें हमारी उच्च वास्तविकता को देख सकने की शक्ति को क्षीण कर देते हैं। हमारे जीवन में शामिल शक्तियां - हमारा शरीर, मन, इच्छाएं और भावनाएं – उसी शेर और सियार जैसी हैं। हम सांसारिक चिंताओं में उलझ जाते हैं, अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाते हैं।
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यह हमें वेदांत की तीन अवधारणाओं की ओर ले जाता है: देही (अवतार में रहने वाला प्राणी), आत्म (स्व), और पुरुष (ब्रह्मांडीय चेतना)। इन्हें समझने से न केवल हमें अपने अस्तित्व की जटिलताओं को सुलझाने में मदद मिलती है, बल्कि यह हमें भय, इच्छा और अज्ञानता के चक्र से भी मुक्त करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे पिंगलक अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लेता तो सियारों के छल-कपट से स्वयं को मुक्त कर सकता था।

भगवद्गीता में कहा गया है, "देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कुमारं यौवनं जरा" (2.13) जिस तरह देहधारी आत्मा बचपन से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था में जाती है, उसी प्रकार वह दूसरे शरीर में भी प्रवेश करती है। 
देही का अर्थ है आत्मा, जो शरीर के भीतर रहती है, लगातार एक जीवन अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन से गुजरती है, कर्म और भौतिक इच्छाओं से बंधी रहती है। पिंगलक की तरह, जिसने स्वयं को अपने बिगड़ते शरीर और अपनी कथित शक्तिहीनता के साथ खो दिया, हम भी अक्सर स्वयं को शरीर और उसके क्षणभंगुर अनुभवों के साथ ही सम्बद्ध करते हैं। किन्तु हम वास्तव में कौन हैं? आत्मा, या सच्चा स्व, इस क्षणभंगुर शरीर और मन से परे है। जबकि देही कर्म से बंधी हुई है, आत्मा शुद्ध रहती है। ठीक वैसे ही जैसे सूरज कभी बादलों से धुंधला नहीं होता , आत्मा भी दुनिया की अशुद्धियों से अछूती रहती है, जो इसे अस्पष्ट करते हैं।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, यह विचार अब्राहम मास्लो द्वारा वर्णित ‘सेल्फ-एक्चुअलाइज़ेशन’ यानि आत्मबोध की अवधारणा के साथ संरेखित है, जो ‘ऑथेंटिक सेल्फ’ यानि प्रामाणिक स्व के सिद्धांत की चर्चा करता है। आत्मबोध हमारी सम्पूर्ण क्षमता को साकार करने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है। यह तब होता है जब हम अहंकार से प्रेरित इच्छाओं से परे अपने सच्चे स्व के साथ जुड़ जाते हैं। इसमें बाहरी मान्यता की अपेक्षा से लेकर आंतरिक पूर्ति की तलाश तक का बदलाव शामिल है। देही (भौतिक स्व) के रूप में पहचान करने से लेकर खुद को आत्मा के रूप में पहचानने तक की यात्रा इस मनोवैज्ञानिक विकास को दर्शाती है।

विज्ञान में, मानवतावादी मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्रसिद्ध कार्ल रॉजर्स ने ‘कॉन्ग्रूएंस’ यानि अनुरूपता शब्द को परिभाषित किया। यह हमारे वास्तविक स्व को हमारे आदर्श स्व के साथ संरेखित करने के महत्व पर जोर देता है। यानि ‘हम क्या हैं’, को ‘हमने क्या होना चाहिए’ से जोड़ता है। जब हम प्रामाणिक रूप से जीते हैं और अपनी सच्ची प्रकृति को अपनाते हैं, तो इन दो स्व के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। सामाजिक अपेक्षाओं और सतही इच्छाओं से प्रेरित ‘फॉल्स सेल्फ’ यानि मिथ्या वाले आत्म को छोड़ने और ‘ऑथेंटिक सेल्फ’ यानि प्रामाणिक आत्म को अपनाने की प्रक्रिया, आत्मबोध के समानांतर है। तंत्रिका विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है कि प्रामाणिक जीवन जीने से तनाव कम होता है और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, क्योंकि यह हम कौन हैं और हम दुनिया के सामने स्वयं को कैसे प्रस्तुत करते हैं, के बीच संज्ञानात्मक असंगति को कम करता है। 

किन्तु, यह प्राचीन ज्ञान हमारे समकालीन जीवन पर कैसे लागू होता है? ऐसे, कि हम निरंतर उन विकर्षणों से घिरे रहते हैं जो देही के साथ हमारी पहचान को मजबूत करते हैं। सोशल मीडिया, करियर के दबाव और सामाजिक अपेक्षाएँ बाहरी उपलब्धियों और दिखावे के प्रति हमारे लगाव को बढ़ाती हैं। हम सफलता, बाहरी सुंदरता और प्रसिद्धि के पीछे भागते हैं। हम मानते हैं कि इनसे हमें खुशियाँ मिलेंगी – ठीक वैसे ही जैसे पिंगलक ने अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए सत्ता पर कब्ज़ा करने की कोशिश की थी। लेकिन सत्य तो यह है कि यह खोज अक्सर चिंता, असंतोष और खालीपन की गहरी भावना की ओर ले जाती है।

भगवद्गीता में कहा गया है कि “न हन्यते हन्यमाने शरीरे" – आत्मा  न तो जन्म लेती है और न ही मरती है; शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती है। इस प्रकार, यह ज्ञान हमें आंतरिक शक्ति के साथ जीने की अनुमति देता है, यह जानते हुए कि जीवन के उतार-चढ़ाव से हमारे सच्चे सार को नुकसान नहीं पहुँचाया जा सकता है। यह हमारी पूर्ण क्षमता का बोध है, जो केवल तभी हो सकता है जब हम अपनी अहंकार-प्रेरित इच्छाओं से ऊपर उठकर अपने गहरे, आध्यात्मिक स्व के साथ जुड़ जाएं। 

लेकिन, यात्रा यहीं नहीं रुकती। अंतिम बोध यह है कि आत्मा पुरुष, सार्वभौमिक चेतना से अलग नहीं है। अद्वैत वेदांत में, इसे प्रसिद्ध वाक्यांश "अहम ब्रह्मास्मि" - मैं ब्रह्म हूँ के माध्यम से व्यक्त किया गया है। जब हम पहचानते हैं कि हम उस सर्वोच्च शक्ति के साथ एक हैं, तो हम सभी जीवन की परस्पर संबद्धता देखते हैं। हमारी व्यक्तिगत इच्छाएँ, भय और चिंताएँ पुरुष की विशालता की तुलना में फीकी पड़ जाती हैं। हमें एहसास होता है कि हम एक अस्त-व्यस्त दुनिया में संघर्ष करने वाले अलग-थलग प्राणी नहीं हैं; हम एक भव्य, ब्रह्मांड का हिस्सा हैं।


यह बोध शांति और उद्देश्य की गहरी भावना लाता है। यह हमें अहंकार की संकीर्ण सीमाओं से मुक्त करता है और हमें दुनिया के साथ सद्भाव में रहने की अनुमति देता है। देही, आत्मा और पुरुष की अवधारणाएँ हमें याद दिलाती हैं कि भले ही हम भौतिक दुनिया में रहते हैं, लेकिन हमारा असली सार आध्यात्मिक ही है। अपना ध्यान क्षणभंगुर से शाश्वत पर केंद्रित करके, हम आधुनिक जीवन की चुनौतियों का सामना अनुग्रह और आंतरिक शांति के साथ कर सकते हैं। हममें से प्रत्येक के भीतर का शेर भी जागने का इंतज़ार कर रहा है - दुनिया को जीतने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय पाने के लिए। 
 

(लेखक आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं।) 
 

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