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मध्य प्रदेश के चुनाव क्यों डालेंगे मोदी पर असर
जयप्रकाश पाराशर,भोपाल
Updated Mon, 02 Dec 2013 11:41 AM IST
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मध्य प्रदेश में 8 दिसंबर को मतगणना होने के पहले सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस के शिविरों में सन्नाटा है। मीडिया में भले ही दोनों दलों के नेता बढ़-चढ़कर दावे कर रहे हों, लेकिन अंदरखाने में डर व्याप्त है। सब समझ रहे हैं कि नतीजा कुछ भी हो सकता है।
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मध्य प्रदेश के नतीजे नरेंद्र मोदी के भाग्य को भी प्रभावित करने वाले हैं। खुद मोदी ने मध्य प्रदेश की सभाओं में कहा है कि केंद्र सरकार का रास्ता मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ से होकर जाता है।
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भाजपा विधायकों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी और बागी उम्मीदवारों ने भाजपा नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रखी हैं तो कांग्रेस में भी महसूस किया जा रहा है कि बागी उम्मीदवार और बसपा के उम्मीदवार कहीं गणित न बिगाड़ दें।
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राज्य की कुल 230 सीटों में से सरकार बनाने का आंकड़ा 116 सीटों का है। भाजपा के पास 143 सीटें थीं।
जब 2009 में लोकसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने 43.45 फीसदी वोट हासिल करके 16 सीटें प्रदेश में जीती थीं। कांग्रेस को 40 फीसदी वोटों के साथ 12 सीटें मिली थीं। करीब 6 फीसदी वोटों के साथ बसपा को एक सीट मिली थी।
मोदी पर जनमत
भाजपा ने अंतिम क्षणों में करीब 1 करोड़ नए मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नरेंद्र मोदी को मैदान में उतार दिया था। नए मतदाताओं का बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी का समर्थक माना जाता है।
विधानसभा चुनाव के नतीजे इस बात का संकेत साफ दे देंगे कि नए वोटर का कितना प्रतिशत भाजपा हासिल कर पाई। यह इस बात का संकेत भी देगा कि भाजपा को मध्य प्रदेश के लोकसभा चुनावों में कितनी सीटें मिलने की संभावना है।
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भाजपा का दावा
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि उनकी सरकार का कोई मंत्री नहीं हार रहा, उसके अगले दिन ही शिवराज सरकार के मंत्री बाबूलाल गौर ने कहा कि कुछ मंत्री हार सकते हैं।
शिवराज सरकार के कम से कम दस मंत्रियों के चुनाव हारने का खतरा मंडरा रहा है। रामकृष्ण कुसमारिया, सरताज सिंह, विजय शाह, जयंत मलैया, अनूप मिश्रा, केएल अग्रवाल, नरोत्त्म मिश्रा, हरिशंकर खटीक, कैलाश विजयवर्गीय जैसे धाकड़ नेताओं का भविष्य दांव पर लगा है।
प्रदेश भाजपा प्रवक्ता डॉ. हितेश वाजपेयी का कहना है, ‘राज्य में कोई एंटी-इनकंबेंसी नहीं है, केवल मीडिया में है। मध्य प्रदेश में वास्तव में प्रो-इनकंबेंसी है। लोग शिवराज सरकार की उपलब्धियों पर वोट करेंगे और करीब 150 सीटें भाजपा को प्राप्त होने वाली हैं।’
भाजपा में ही कई नेता डरे हुए हैं और नहीं मानते कि भाजपा को डेढ़ सौ सीटें मिल पाएंगी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक सर्वे के हवाले से कहा जा रहा है कि भाजपा को मुश्किल से 100-110 सीट के आसपास मिल पाएंगी। भाजपा यदि 110 सीटों से ज्यादा जुटा लेती है तो उसे बसपा और निर्दलीयों में से उन लोगों को अपने साथ लाना होगा, जो उससे बगावत करके चुनाव जीतेंगे।
कांग्रेस का दावा
कांग्रेस नेता एंटी-इनकंबेंसी को लेकर काफी उत्साहित हैं। प्रवक्ता जेपी धनोपिया का कहना है, ‘कांग्रेस 130-150 सीटें पाने वाली है।’
अटेर से चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस नेता सत्यदेव कटारे का कहना है, ‘कांग्रेस की सरकार पूर्ण बहुमत लेकर बनने वाली है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कांग्रेस को कम से कम 23 सीटें मिलेंगी, जो पिछली बार से 10 ज्यादा है। रीवा-सीधी-सतना में भी कांग्रेस को पहले से काफी ज्यादा सीटें मिलेंगी। भोपाल और महाकौशल में कांग्रेस को मिलने वाले समर्थन को देखा जाए तो पूर्ण बहुमत हासिल होने वाला है।’
कांग्रेस के ही शिविर में कई नेताओं को लगता है कि कांग्रेस 100-110 के आसपास जा सकती है। तब उसे बसपा और निर्दलीयों की मदद लेनी होगी।
कांग्रेस के कई नेता अंदरखाने में स्वीकार करते हैं कि उसके वर्तमान विधायकों में से कई एंटी-इनकंबेंसी का शिकार हो सकते हैं और उन्हें हार का मुंह देखना पड़ सकता है।
बसपा और निर्दलीय
द्विदलीय व्यवस्था वाले मध्य प्रदेश में इस बार दोनों ही पार्टियों से बागी उम्मीदवार बड़ी संख्या में खड़े हुए हैं। बसपा को पिछली बार भी 8 सीटें मिली थीं। ग्वालियर-चंबल और रीवा-सीधी-सतना के क्षेत्रों को मिलाकर बसपा को 8-10 सीटें हासिल हो सकती हैं। अन्य व निर्दलियों को मिला दिया जाए तो यह संख्या 15 तक जा सकती है। तब दोनों ही दलों में से जिसे ज्यादा सीटें मिलेंगी, उसे इनकी मदद लेनी पड़ सकती है।
कुल सीटें 230
बहुमत के लिए आवश्यक 116
मतगणना की तिथि 8 दिसंबर 2013
भाजपाः पार्टी को 150 सीटें मिलने और तीसरी बार सरकार बनाने का दावा। 2008 में 143 सीटें थीं। एंटी-इनकंबेंसी और कई दिग्गजों के चुनाव हारने का डर।
कांग्रेसः खोने के लिए कुछ नहीं। पूर्ण बहुमत हासिल करने का दावा। वर्तमान 65 विधायकों मे से आधे के चुनाव हारने का डर।
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