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मौत के बाद खुलेगा संक्रमण का राज: एम्स 331 शवों पर कर रहा शोध, संक्रमण और बेवजह होने वाली मौतों की होगी जांच
Tue, 13 Oct 2026 05:19 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Tue, 13 Oct 2026 05:19 PM IST
सार
एम्स भोपाल की पीएचडी शोधार्थी अश्विनी चंद्रन 331 शव-परीक्षण मामलों में बैक्टीरिया और फंगस का अध्ययन कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में प्रस्तुत इस शोध से छिपे संक्रमण, अस्पतालों में संक्रमण के पैटर्न और दवाओं के प्रति रोगाणुओं के बढ़ते प्रतिरोध को समझने में मदद मिल सकती है।
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एम्स भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
किसी मरीज की मौत के पीछे गंभीर संक्रमण था या नहीं, बीमारी पैदा करने वाला कौन-सा जीवाणु जिम्मेदार था और क्या समय रहते इसकी पहचान हो सकती थी? ऐसे सवालों के जवाब तलाशने में एम्स भोपाल का शोध अहम साबित हो सकता है। संस्थान की पीएचडी शोधार्थी अश्विनी चंद्रन 331 शव-परीक्षण मामलों में बैक्टीरिया और फंगस का अध्ययन कर रही हैं। उनका शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित एक वेबिनार में प्रस्तुत किया गया है। इससे संक्रमण के छिपे कारणों और कुछ ऐसी मौतों को समझने में मदद मिलने की उम्मीद है, जिनमें बीमारी की वास्तविक वजह स्पष्ट नहीं हो पाती। एम्स भोपाल के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग का यह शोध केवल मौत के कारणों की पड़ताल तक सीमित नहीं है। इसके निष्कर्ष संक्रमण की पहचान, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण और एंटीबायोटिक जैसी दवाओं के प्रति रोगाणुओं में बढ़ते प्रतिरोध को समझने में भी उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, इन निष्कर्षों से सीधे किसी मौत का कारण तय करने या भविष्य में मौतें रोकने का दावा नहीं किया जा सकता। इसके लिए शोध के परिणामों और उनकी चिकित्सकीय पुष्टि का महत्व होगा।
331 शवों की जांच से क्या मिलेगा फायदा?
मृत्यु के बाद शरीर के रक्त और ऊतकों में मौजूद सूक्ष्मजीवों का अध्ययन पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी कहलाता है। इसमें बैक्टीरिया और फंगस की मौजूदगी की जांच की जाती है। इस प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु से पहले गंभीर संक्रमण मौजूद था या नहीं और वह मौत में किस हद तक योगदान दे सकता था। इस शोध का एक बड़ा फायदा यह है कि इससे संक्रमण के ऐसे पैटर्न सामने आ सकते हैं, जिनकी जानकारी सामान्य चिकित्सा जांच से नहीं मिल पाती। अस्पतालों में होने वाले संक्रमणों के प्रकार और रोगाणुओं में दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध के संकेतों को समझने में भी ऐसे आंकड़े उपयोगी हो सकते हैं। इससे संक्रमण की रोकथाम और उपचार की रणनीति तैयार करने के लिए बेहतर वैज्ञानिक आधार मिल सकता है।
अनसुलझी मौतों की जांच में भी उपयोगी हो सकता है शोध
कुछ मामलों में मरीज की हालत तेजी से बिगड़ती है और मौत का स्पष्ट कारण तय करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। सेप्सिस यानी संक्रमण के प्रति शरीर की गंभीर प्रतिक्रिया ऐसी ही स्थितियों में से एक है। यह समय पर पहचान और उपचार न मिलने पर जानलेवा हो सकती है। शव-परीक्षण के साथ सूक्ष्मजीवों और संक्रमण से जुड़े संकेतकों की जांच करने से चिकित्सकों तथा फॉरेंसिक विशेषज्ञों को मृत्यु के संभावित कारणों का आकलन करने में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है। इससे जांच की दिशा तय करने और उपलब्ध साक्ष्यों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, केवल बैक्टीरिया या फंगस मिलने से यह साबित नहीं होता कि वही मृत्यु का कारण था। निष्कर्ष के लिए अन्य चिकित्सकीय और फॉरेंसिक साक्ष्यों का मिलान जरूरी होता है।
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सेप्सिस की पहचान पर शोध पत्र भी प्रकाशित
अश्विनी चंद्रन का एक शोध पत्र इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लीगल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। इसमें मृत्यु के बाद रक्त में प्रोकैल्सिटोनिन (पीसीटी) की जांच के जरिए सेप्सिस को मृत्यु का कारण पहचानने की उपयोगिता का व्यवस्थित विश्लेषण किया गया है। प्रोकैल्सिटोनिन शरीर में गंभीर संक्रमण के दौरान बढ़ सकने वाला एक संकेतक है। शोध पत्र में यह आकलन किया गया है कि मृत्यु के बाद रक्त में इसकी मात्रा से सेप्सिस की पहचान करने में कितनी मदद मिल सकती है। यह जांच मृत्यु के कारणों की पड़ताल में एक अतिरिक्त सुराग दे सकती है, लेकिन इसे अकेले निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
यह भी पढ़ें-एमपी में फिर बदलेगा मौसम: दो दिन बारिश के आसार, भोपाल-इंदौर में दिन की गर्मी और रात की ठंडक रहेगी बरकरार
यूरोप के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक मंच पर मिली जगह
अश्विनी चंद्रन को यूरोपियन सोसाइटी ऑफ क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी एंड इन्फेक्शियस डिजीज (ईएससीएमआईडी) के दो अध्ययन समूहों ईएसजीएफओआर और ईएफआईएसजी द्वारा आयोजित वेबिनार में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया। इस आयोजन में चार वक्ताओं ने अपने शोध और अनुभव साझा किए। उनका 331 शव-परीक्षण मामलों पर आधारित अध्ययन पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी के बड़े अध्ययनों में शामिल बताया गया है। पीएचडी शोध में डॉ. अरनीत अरोड़ा पर्यवेक्षक हैं, जबकि डॉ. जयंती यादव, डॉ. निरंजन साहू, डॉ. आयुष गुप्ता, डॉ. सागर खदंगा और डॉ. टी. करुणा सह-मार्गदर्शक हैं। फफूंद संक्रमण और मृत्यु के बाद उनकी जांच से जुड़े पहलुओं में डॉ. टी. करुणा का मार्गदर्शन भी अहम रहा है। एम्स भोपाल के लिए यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संस्थान के शोध को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के सामने प्रस्तुत करने का अवसर मिला है। वहीं, आम लोगों के लिए इस तरह के शोध की अहमियत संक्रमण के कारणों को बेहतर समझने, जांच के वैज्ञानिक तरीकों को मजबूत करने और भविष्य में संक्रमण नियंत्रण की रणनीतियों को अधिक प्रभावी बनाने की संभावनाओं में है।
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331 शवों की जांच से क्या मिलेगा फायदा?
मृत्यु के बाद शरीर के रक्त और ऊतकों में मौजूद सूक्ष्मजीवों का अध्ययन पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी कहलाता है। इसमें बैक्टीरिया और फंगस की मौजूदगी की जांच की जाती है। इस प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु से पहले गंभीर संक्रमण मौजूद था या नहीं और वह मौत में किस हद तक योगदान दे सकता था। इस शोध का एक बड़ा फायदा यह है कि इससे संक्रमण के ऐसे पैटर्न सामने आ सकते हैं, जिनकी जानकारी सामान्य चिकित्सा जांच से नहीं मिल पाती। अस्पतालों में होने वाले संक्रमणों के प्रकार और रोगाणुओं में दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध के संकेतों को समझने में भी ऐसे आंकड़े उपयोगी हो सकते हैं। इससे संक्रमण की रोकथाम और उपचार की रणनीति तैयार करने के लिए बेहतर वैज्ञानिक आधार मिल सकता है।
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अनसुलझी मौतों की जांच में भी उपयोगी हो सकता है शोध
कुछ मामलों में मरीज की हालत तेजी से बिगड़ती है और मौत का स्पष्ट कारण तय करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। सेप्सिस यानी संक्रमण के प्रति शरीर की गंभीर प्रतिक्रिया ऐसी ही स्थितियों में से एक है। यह समय पर पहचान और उपचार न मिलने पर जानलेवा हो सकती है। शव-परीक्षण के साथ सूक्ष्मजीवों और संक्रमण से जुड़े संकेतकों की जांच करने से चिकित्सकों तथा फॉरेंसिक विशेषज्ञों को मृत्यु के संभावित कारणों का आकलन करने में अतिरिक्त जानकारी मिल सकती है। इससे जांच की दिशा तय करने और उपलब्ध साक्ष्यों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, केवल बैक्टीरिया या फंगस मिलने से यह साबित नहीं होता कि वही मृत्यु का कारण था। निष्कर्ष के लिए अन्य चिकित्सकीय और फॉरेंसिक साक्ष्यों का मिलान जरूरी होता है।
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सेप्सिस की पहचान पर शोध पत्र भी प्रकाशित
अश्विनी चंद्रन का एक शोध पत्र इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लीगल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। इसमें मृत्यु के बाद रक्त में प्रोकैल्सिटोनिन (पीसीटी) की जांच के जरिए सेप्सिस को मृत्यु का कारण पहचानने की उपयोगिता का व्यवस्थित विश्लेषण किया गया है। प्रोकैल्सिटोनिन शरीर में गंभीर संक्रमण के दौरान बढ़ सकने वाला एक संकेतक है। शोध पत्र में यह आकलन किया गया है कि मृत्यु के बाद रक्त में इसकी मात्रा से सेप्सिस की पहचान करने में कितनी मदद मिल सकती है। यह जांच मृत्यु के कारणों की पड़ताल में एक अतिरिक्त सुराग दे सकती है, लेकिन इसे अकेले निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
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यूरोप के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक मंच पर मिली जगह
अश्विनी चंद्रन को यूरोपियन सोसाइटी ऑफ क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी एंड इन्फेक्शियस डिजीज (ईएससीएमआईडी) के दो अध्ययन समूहों ईएसजीएफओआर और ईएफआईएसजी द्वारा आयोजित वेबिनार में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया। इस आयोजन में चार वक्ताओं ने अपने शोध और अनुभव साझा किए। उनका 331 शव-परीक्षण मामलों पर आधारित अध्ययन पोस्टमार्टम माइक्रोबायोलॉजी के बड़े अध्ययनों में शामिल बताया गया है। पीएचडी शोध में डॉ. अरनीत अरोड़ा पर्यवेक्षक हैं, जबकि डॉ. जयंती यादव, डॉ. निरंजन साहू, डॉ. आयुष गुप्ता, डॉ. सागर खदंगा और डॉ. टी. करुणा सह-मार्गदर्शक हैं। फफूंद संक्रमण और मृत्यु के बाद उनकी जांच से जुड़े पहलुओं में डॉ. टी. करुणा का मार्गदर्शन भी अहम रहा है। एम्स भोपाल के लिए यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संस्थान के शोध को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के सामने प्रस्तुत करने का अवसर मिला है। वहीं, आम लोगों के लिए इस तरह के शोध की अहमियत संक्रमण के कारणों को बेहतर समझने, जांच के वैज्ञानिक तरीकों को मजबूत करने और भविष्य में संक्रमण नियंत्रण की रणनीतियों को अधिक प्रभावी बनाने की संभावनाओं में है।
