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एक मंत्री जो वोट मांगने ही नहीं गया
जयप्रकाश पाराशर/अमर उजाला, भोपाल
Updated Sun, 01 Dec 2013 03:47 PM IST
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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव-2013 में पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव आत्मविश्वास से भरे एक ऐसे उम्मीदवार रहे, जो अपना प्रचार करने के लिए विधानसभा क्षेत्र में ही नहीं गए।
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सागर जिले की रहली सीट से विधानसभा में आने वाले गोपाल भार्गव पिछले 28 साल से लगातार विधायक रहे हैं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी विदिशा और बुदनी से चुनाव लड़ा और फार्म भरने के बाद वे शायद ही वहां लौट पाए। उनकी पत्नी और बेटे ही उनका चुनाव प्रबंधन करते रहे।
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भार्गव ने अमर उजाला से एक बातचीत में बताया, 'मैं साल में 365 दिन लोगों के बीच रहता हूं। उनके हर सुख-दुख में साथ रहता हूं। भोपाल के अस्पतालों में अब तक अपने क्षेत्र के लोगों का करोड़ों रुपए का इलाज करा चुका हूं। कई अस्पतालों का तो मुझे अब भी उधार चुकाना है। दूसरे नेता बकाया देख लेंगे तो घबरा जाएंगे। लोगों की हर छोटी जरूरत का ध्यान रखता हूं। लोगों ने मुझे कहा कि आपको वोट मांगने आने की जरूरत नहीं।'
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भार्गव उन गिनती के विधायकों में से हैं, जो विरोधी दल की लहर के बावजूद निरंतर जीतते आ रहे हैं। भाजपा के ऐसे ही एक नेता बाबूलाल गौर भोपाल में दसवीं बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
भाजपा के ही कई विधायकों को पांच साल में ही एंटी-इनकंबेंसी का डर सता रहा है, तब गोपाल भार्गव का यह आत्मविश्वास चौंकाने वाला है। भाजपा की रंजना बघेल जैसे मंत्रियों पर नोट बांटने के आरोप लगे हैं।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने वाला कदम
इंदौर के समाजवादी नेता अनिल त्रिवेदी जैसे लोग गोपाल भार्गव के इस कदम से सहमत नहीं हैं। त्रिवेदी कहते हैं कि आत्मविश्वास होना अच्छी बात है, लेकिन यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने वाला कदम है। चुनाव में जनसंपर्क करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पूरा करता है।
अन्ना इफेक्ट
दिलचस्प बात यह है कि अन्ना से जो चीज अरविंद केजरीवाल नहीं सीख पाए, वह बात गोपाल भार्गव ने सीख ली। गोपाल भार्गव का कहना है कि अन्ना के आंदोलन के दौरान मेरे मन में विचार आया कि चुनावी प्रचार प्रसार में क्यों खर्च किया जाए। इसे क्यों न सादगीपूर्ण बनाया जाए। यदि जनप्रतिनिधि पूरे पांच साल लोगों के संपर्क में रहे और उनके काम करता रहे तो उसे वोट मांगने जाने की जरूरत नहीं। हालांकि पूरे चुनाव में गोपाल भार्गव का चुनाव प्रबंधन उनके बेटे के हाथ में था।
जनता के साथ रिश्ता
लगातार 28 साल तक विधायक रहने के बाद क्या वोट मांगने नहीं जाना जोखिम भरा नहीं है? भार्गव का कहना है, 'मैं नहीं गया तो क्या हुआ? लोग तो मेरे पास आते रहे। वे मुझसे कहते थे कि आप वोट मांगने निकले तो हम बुरा मान जाएंगे। जनता के साथ मेरा रिश्ता ऐसा ही है।'
जोखिम
राजनीतिक विश्लेषकों का ख्याल है कि गोपाल भार्गव ने यह बड़ा जोखिम लिया था, क्योंकि शिवराज सरकार के कई विधायकों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी काफी ज्यादा रही है और भार्गव की जीत का अंतर भी कम हो सकता है।
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