Parliament LIVE: 'कांग्रेस की हार का कारण EVM नहीं, नेतृत्व है...', चुनाव सुधार पर लोकसभा में अमित शाह का जवाब
Parliament Winter Session Lok Sabha Rajya Sabha Proceedings LIVE News: संसद के शीतकालीन सत्र का आज आठवां दिन है। आज संसद में चुनाव आयोग द्वारा कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जोरदार बहस हुई। अमर उजाला के इस लाइव ब्लॉग में पढ़ें संसद के दोनों सदनों की कायवाही से जुड़े तमाम अपडेट्स
लाइव अपडेट
देश के लिए मरना आरएसएस की विचारधारा- अमित शाह
राहुल जी ने कल कहा था कि सभी संस्थाओं में आरएसएस के लोग रख लिए जाते हैं। क्या इस देश में कोई कानून है कि आरएसएस के लोग संस्थाओं में नहीं आ सकता। इस देश का गृह मंत्री आरएसएस से आया है। हम जनादेश से आए हैं। 1971 का चुनाव हुआ था, इंदिरा जी अपनी ही पार्टी में संघर्ष कर रही थीं। इंदिरा जी ने उस दौरान अपनी पार्टी की तरफ से खड़े किए गए नीलम संजीव रेड्डी की जगह वीवी गिरी को अपना प्रत्याशी बनाया और नेताओं से अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने के लिए कहा। इंदिरा जी ने उस समय कम्युनिस्टों से हाथ मिला लिया और राष्ट्रपति के चुनाव का नतीजा बदल दिया। वामपंथियों ने युवाओं को डायवर्ट करने का काम किया है। 2014 के बाद पीएम मोदी जी ने इसे परिष्कृत किया है। देश के लिए मरना ही आरएसएस की विचारधारा है। देश की संस्कृति का झंडा बुलंद करना ही आरएसएस की विचारधारा है। हम नहीं डरते। मैं 10 साल का था और नारे लगाता था कि असम की गलियां सूनी हैं इंदिरा गांधी खूनी है।चुनाव आयोग के सीसीटीवी पर कही ये बात
चुनाव आयोग ने कहा कि सीसीटीवी तक सामान्य व्यक्ति की पहुंच होनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय जाकर 45 दिन के अंदर सीसीटीवी फुटेज निकलवा सकता है। राजनीतिक दलों को अगर चुनाव प्रक्रिया पर शक है तो वे चैलेंज करें, सीसीटीवी फुटेज हासिल कर सकें। राजनीतिक एजेंट्स भी इसे लेकर याचिका लगा सकते हैं, लेकिन करता कोई नहीं है। आप सिर्फ आरोप लगाते हैं। अब अगर सीसीटीवी फुटेज को लेकर हर कोई सीसीटीवी फुटेज की मांग करेगा तो कैसे चलेगा।
इस देश को, लोकतंत्र को आप धूमिल नहीं कर सकते हैं। ढंग से भाषण तैयार करने सीखने चाहिए। एक उन्होंने कहा कि सीईसी को 2003 में कानून बनाकर इम्युनिटी दी। रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1950 में ही चुनाव आयोग के अधिकारियों को जो कुछ मिला है, उसमें हमने बदलाव नहीं किया है। हमने उसे सिर्फ आगे बढ़ाया है। चुनाव आयोग के कोई भी अधिकारी जिसके आयुक्त भी आते हैं उन पर चुनाव प्रक्रिया के लिए कोई मुकदमा नहीं चल सकता। हमने इसे देश के कानून में संगठित किया है।
मूल मुद्दा है अवैध घुसपैठियों को मतदाता सूची में रखने का। ये 200 बार भी बहिष्कार करेंगे फिर भी हम एक भी घुसपैठिये को वोट नहीं देने देंगे। ढूंढो, डिलीट करो, मतदाता सूची में नाम काटो और डिपोर्ट करो। ये क्यों सदन छोड़कर भाग गए। मैं इनके सामने सिर्फ घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने की बात कर रहा था। ये क्यों सदन से चले गए। जब मैंने नेहरू जी पर, इंदिरा जी पर, इनके पिता जी पर बात की, तब नहीं भागे। घुसपैठियों की बात की तो भाग गए। इन काम है घुसपैठियों को नॉर्मलाइज कर दो, फॉर्मलाइज कर दो।
घुसपैठ हो रही है बांग्लादेश भारत की सीमा से। वहां पर पुल 2216 किलोमीटर का बॉर्डर है। इसमें 1600 किमी से ज्यादा बॉर्डर बन चुका है। 563 किमी का बॉर्डर सिर्फ बंगाल से बच रहा है। असम से लेकर गुजरात तक हमने सारे बॉर्डर बंद कर लिए हैं। मैं कहना चाहता हूं टीएमसी वालों से कि बिहार में घुसपैठिये साफ हो गए। आप घुसपैठियों बचाएंगे तो आपका सफाया भी तय है।
घुसपैठिया सबसे पहले गांव में आता है। पटवारी, मुखिया को पता नहीं चलता। इनका आधार कहां बनता है, वहीं बनता है। बंगाल में इनका आधार बनता है। आप चुनाव तो जीत जाएंगे घुसपैठियों के आधार पर लेकिन देश की सुरक्षा के साथ समझौता कर रहे हो। खिलवाड़ कर रहे हो।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर क्या बोले शाह?
नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद आज तक कांग्रेस ने चुनाव आयोग को चुनाव सुधार के लिए एक भी सुझाव नहीं भेजा। यह मिलने गए हैं चुनाव आयोग में। चुनाव सुधार जो होता है, वह चुनाव के नियम जो तय होते हैं उसके लिए राजनीतिक दलों को बुलाया जाता है।कल विपक्ष के नेता ने तीन सवाल पूछे थे और चार सुझाव दिए थे। पहला सवा मैं बताना चाहता हूं कि 73 वर्ष तक देश में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का कोई कानून ही नहीं था। नियुक्ति प्रधानमंत्री सीधे कर देते थे। मैं आज पूरे देश को बताना चाहता हूं कि कुल अब तक जितने चुनाव आयुक्त बने और जितने मुख्य चुनाव आयुक्त हुए। ये सभी इसी प्रकार से आए। 1950 से 1989 तक चुनाव आयोग एक सदस्यीय था। कोई कानून नहीं था। प्रधानमंत्री जी फाइल भेजते थे राष्ट्रपति जी को और वो फाइल अप्रूव हो जाती थी। पूरे 55 साल प्रधानमंत्री जी ने चुनाव आयुक्त को नियुक्त किया। तब कोई सवाल नहीं था। लेकिन पीएम मोदी कुछ करते हैं तो उन पर सवाल। हम तो ऐसा करते भी नहीं हैं।
हमने तो चुनाव आयुक्त के चुनाव के लिए पैनल को बहुसदस्यीय बनाया। कांग्रेस पार्टी ने पुरानी परंपरा बनाई थी। लेकिन अब आरोप लगाया है कि वोट चोरी कर लिया, चुनाव चोरी कर लिया। 1950 से 2023 तक कोई कानून नहीं था और 2023 में एक मुकदमा हुआ। इसमें सुझाव आया कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में पारदर्शिता होनी चाहिए। हमारे सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इसमें थोड़ा समय लगेगा। हमें इस पर चर्चा करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक कानून नहीं बनता तब तक चीफ जस्टिस की अध्यक्ष में समिति बने, इसमें प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता हों।
यह कहते हैं कि 2012 में जब सीईसी की नियुक्ति होनी थी तब आडवाणी जी ने पत्र लिखकर कहा था कि एक प्रणाली बनाई जाए, लेकिन कोई प्रणाली नहीं बनी। आप कहते हैं कि वहां (सीईसी) के चुनाव में हमारी बात सिर्फ 33 फीसदी होती है। जनता त करती है कि 66 फीसदी कौन होगा। आप जीतिए और आप भी 66 फीसदी में जगह बनाइए। लेकिन आप तो 100 फीसदी रखकर गए थे उनकी नियुक्ति में। हमने तो इसमें आपको जगह दी। इनका जो भाषण तैयार करते हैं वे रिसर्च नहीं करते।
2014 में हारने के बाद विपक्ष ने ईवीएम को बनाया निशाना- अमित शाह
2014 में हारने की परंपरा शुरू हुई। इस परंपरा के बाद इन्होंने सबसे पहले ईवीएम को निशाना बनाया। ईवीएम इस देश में कौन लेकर आया। 15 मार्च 1989 को जब राजीव गांधी इस देश के प्रधानमंत्री थे, तब ईवीएम लाने का प्रावधान किया गया। इसके बाद ईवीएम के खिलाफ किसी ने याचिका की तो न्यायालय की पांच जजों की पीठ ने 2002 में उचित ठहराया। राजीव गांधी को भी ये लोग नहीं मानते, सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं मानते।1998 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में 16 विधानसभा सीटों पर इसका ट्रायल लिया गया। ईवीएम का उपयोग पहली बार 2004 में देश के स्तर पर हुआ। उस चुनाव में कौन जीता? वो जीत गए। उस वक्त ईवीएम की चर्चा बंद। 2009 का चुनाव यह जीत गए, चुप्पी साध ली। 2014 में हम जीते तो कौ, कौ, कौ, कौ, कौ। ये क्या है, जब कानून आप लाए, मशीन आप लाए। आप चुनाव जीते, मौज से देश पर राज किया। तब क्या।
पांच साल रिसर्च के बाद वीवीपैट को लाया गया। चुनाव आयोग ने निर्णय लिया कि पांच प्रतिशत ईवीएम और वीवीपैट के परिणामों की तुलना होगी। मैं आंकड़े लेकर आया हूं चुनाव आयोग से। आज तक 16 हजार वीवीपैट और ईवीएम का मिलान हुआ है। किसी में एक भी वोट की गड़बड़ी नहीं हुई है। इनके बीएलए चुनाव मतगणना में होते हैं और नतीजों पर हस्ताक्षर करते हैं।
2009 में चुनाव आयोग ने ईवीएम को लेकर मौका दिया। कोई छेड़छाड़ नहीं कर पाया। 2017 में भी चुनाव आयोग ने ऐसा ही किया कि कोई छेड़छाड़ कर के दिखाए। ये तो गए नहीं, कोई एक्सपर्ट भी नहीं गया। 2013 में चुनाव आयोग इस निर्णय पर पहुंचा कि सारे चुनाव ईवीएम से ही होंगे।
लेकिन मेरा दिमाग भी चलता है। मैंने भी सोचा कि कुछ गलती नहीं है तो लोग विरोध क्यों करते हैं। तब मुझे ध्यान आया कि यूपी और बिहार में जब इनके जमाने में चुनाव होते थे तब पूरे वोट के बक्से लूट लिए जाते थे। ईवीएम आने के बाद से यह बंद हो गया। चुनाव जीतने का तरीका तब भ्रष्ट तरीका था। लेकिन आज जनादेश से फैसला होता है और ये एक्सपोज हो चुके हैं।
हमारे प्रधानमंत्री जनसंपर्क में आजादी के बाद सबसे ज्यादा प्रवास करने वाली पीएम हैं। मैं जानता हूं नरेंद्र मोदी को। 2001 के बाद से एक भी दिन की छुट्टी नहीं, एक भी दिन का वैकेशन नहीं। सिर्फ जनता के काम में जुटे रहते हैं। कई बार जनता का काम करते हुए इनका (विपक्ष का) बीपी बढ़ जाता है। (विपक्ष पर निशाना साधते हुए)