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जोड़ों के दर्द में लाभदायक है सिद्धासन, जानें कई गजब के फायदे
ऊर्जा डेस्क, अमर उजाला
Updated Sun, 16 Sep 2018 10:53 AM IST
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योगासन की दुनिया में सिद्धासन को सबसे उत्तम की श्रेणी में रखा जाता है।लोगों को शायद ही पता हो कि सिद्धासन 84 लाख आसनों में सबसे सर्वेश्रेष्ट आसन है। माना जाता है कि इस आसान को करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है क्योंकि इस आसन का अभ्यास करने से कामवासना समाप्त होकर ब्रह्मचर्य प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
यह आसन मानसिक ठहराव देते हुए सूक्ष्म्नाड़ी से प्राण का प्रवाह सुनिश्चित करते हुए कुंडलिनी जागरण में सहायता करता है।इतना ही नहीं इस आसन का नियमित अभ्यास करने से शरीर की समस्त नाड़ियों का शुद्धिकरण होने के साथ पूरे शरीर में तरोताजगी आ जाती है। इस आसन का अभ्यास करने से 72 हजार नाड़ियों की अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है।
आर्थराइटिस, गठिया या जोड़ों के दर्द की समस्या मूलरूप से वातरोग है। सिद्धासन से जठराग्नि तेज होने के कारण पाचन क्रिया बेहतर होती है और वायुतत्व संतुलित होता है। बायीं एड़ी को गुदा और जननेन्द्रिय के बीच रखें।
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दायीं एड़ी को जननेन्द्रिय के ऊपर इस प्रकार रखें कि यौनांग के ऊपर दबाव न पड़े। दोनों तलवे जांघों के बीच में रहें। दोनों हाथों को दोनों घुटनों के ऊपर ज्ञानमुद्रा में रखें। सहज श्वास चलने दें। ध्यान दोनों भौहों के बीच केंद्रित करें। पांच मिनट तक अभ्यास करें। घुटने या कमर दर्द, सायटिका और स्लिप डिस्क होने पर इसे न आजमाएं। जब मन शांत हो, तभी इसका अभ्यास करें।
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यह आसन मानसिक ठहराव देते हुए सूक्ष्म्नाड़ी से प्राण का प्रवाह सुनिश्चित करते हुए कुंडलिनी जागरण में सहायता करता है।इतना ही नहीं इस आसन का नियमित अभ्यास करने से शरीर की समस्त नाड़ियों का शुद्धिकरण होने के साथ पूरे शरीर में तरोताजगी आ जाती है। इस आसन का अभ्यास करने से 72 हजार नाड़ियों की अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है।
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आर्थराइटिस, गठिया या जोड़ों के दर्द की समस्या मूलरूप से वातरोग है। सिद्धासन से जठराग्नि तेज होने के कारण पाचन क्रिया बेहतर होती है और वायुतत्व संतुलित होता है। बायीं एड़ी को गुदा और जननेन्द्रिय के बीच रखें।
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दायीं एड़ी को जननेन्द्रिय के ऊपर इस प्रकार रखें कि यौनांग के ऊपर दबाव न पड़े। दोनों तलवे जांघों के बीच में रहें। दोनों हाथों को दोनों घुटनों के ऊपर ज्ञानमुद्रा में रखें। सहज श्वास चलने दें। ध्यान दोनों भौहों के बीच केंद्रित करें। पांच मिनट तक अभ्यास करें। घुटने या कमर दर्द, सायटिका और स्लिप डिस्क होने पर इसे न आजमाएं। जब मन शांत हो, तभी इसका अभ्यास करें।