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कोरोना महामारी और पर्यावरण के सबक: जो पर्यावरण से दूर गया, वो बीमारी के करीब गया

Fri, 04 Jun 2021 12:15 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: तेजस्वी मेहता Updated Fri, 04 Jun 2021 12:15 PM IST
सार

यदि हमें स्वस्थ रहना है तो बहुत आवश्यक है कि हम पर्यावरण का संरक्षण करें नहीं तो हमारी भावी पीढ़ियों को बहुत कुछ भोगना पड़ सकता है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। पर्यावरण से छेड़छाड़ त्रासदी को न्योता देने जैसा है। 

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World Environment Day June 5th: avoiding nature may be a invitation to diseases
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: हम दिन-ब-दिन असक्षम होते जाएंगे - फोटो : iStock

विस्तार

पिछले दिनों कोरोना महामारी के दौरान प्राणवायु को लेकर हुई किल्लत इस बात का संकेत है कि हम पर्यावरण से जितना दूर जाएंगे, बीमारियां उतना हमारे करीब आएंगी और हम दिन-ब-दिन असक्षम होते जाएंगे। यदि हमने पौधे लगाए होते तो शायद आज हमको इतना परेशान नहीं होना पड़ता लेकिन पेड़ों को तो हमने आधुनिकता की ओर बढ़ने की राह में अवरोध समझकर काट डाला। पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ न सिर्फ हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक साबित हो रही है बल्कि भविष्य के लिए भी रेड अलार्म है। पर्यावरण को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने में हम माना कि बहुत कुछ पा तो लेंगे पर खोने के नाम पर हम ऐसा कुछ खो देंगे जिसकी कीमत हमारे मन और शरीर को अदा करना होगी इसलिए पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य को याद करके हम अपने स्वास्थ्य के लिए भी वरदान पा सकते हैं। आइए जानते हैं कि किस तरह से इंसान की पर्यावरण को नजरअंदाज करने की यह गलती उसे बीमारियों के करीब ले जा रही है।  

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World Environment Day June 5th: avoiding nature may be a invitation to diseases
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: वो सबसे पहले माटी से दूर हो जाता है - फोटो : Social media

आगे बढ़ने की दौड़ ले जा रही पीछे
आगे बढ़ने की दौड़ में लोग आधुनिकीकरण की ओर इस तरह बढ़ रहे हैं कि वे महानगरियों की ओर सबसे पहले जाते हैं। महानगरियों में जनसंख्या इस कदर बढ़ गई है कि वे पर्यावरण के दुश्मन बनती जा रही हैं। छोटे- छोटे कमरों में बड़ा-बड़ा किराया देकर ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने पर मनुष्य का संपर्क सबसे पहले जमीन से छूट जाता है। वो सबसे पहले माटी से दूर हो जाता है। घुटन भरे वातावरण में रहने पर इंसान तनाव का शिकार होता जाता है। उसे सांस लेने के लिए खुली हवा नहीं मिल पाती है और यदि मिलती भी है तो अपने साथ प्रदूषण के कण लेकर आती है। 

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World Environment Day June 5th: avoiding nature may be a invitation to diseases
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: अपनी ही आयु को कम करते हैं - फोटो : social media

फेफड़ों की क्षमता हो जाती है कमजोर
जो लोग प्रकृति से दूर रहते हैं, अपना पूरा जीवन ऐसी फैक्ट्रियों में गुजार देते हैं जहां मानव जीवन को आसान बनाने के लिए ऐसे उत्पाद बनाए जाते हैं जो प्रकृति के लिए बहुत हानिकारक है। लोहा गलाने वाली, मशीनों का निर्माण करने वाली इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले कर्मचारियों की फेफड़ों की क्षमता उतनी नहीं होती है जितनी एक सामान्य व्यक्ति की होती है। प्रदूषण को ग्रहण कर-करके कर्मचारी अपनी ही आयु को कम करते हैं। फैक्ट्रियों के आसपास रहने वाले भी अनजाने में अपनी उम्र को खुद से कम कर रहे होते हैं, श्वास और फेफड़ों संबंधित बीमारियों को न्योता दे रहे होते हैं। 

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World Environment Day June 5th: avoiding nature may be a invitation to diseases
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: शरीर ऊर्जावान महसूस करता है - फोटो : Getty Images

नंगे पैर घास पर चलने की फुरसत ही कहां
एक समय था जब हम घंटों नंगे पैर घास पर दौड़ते थे और स्वस्थ भी रहते थे, न कोई बीमारियां और न ही कोई चिंता। प्रकृति की गोद में रक्तचाप से लेकर शुगर तक सब नियंत्रित होता था लेकिन आज घास के हमारे आसपास पते ही नहीं है। यदि सोसायटी में कोई बगीचा है भी तो उसमें पैदल नंगे पैर चलने की फुर्सत कहां किसी को। जबकि रक्तचाप के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद है इस तरह से नंगे पैर घास पर घूमना। यदि दिनभर थकान महसूस होती है तो इस तरह प्रकृति के करीब जाने से हमारा शरीर ऊर्जावान महसूस करता है। 

 

World Environment Day June 5th: avoiding nature may be a invitation to diseases
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: हम नदियों से दूर होते गए - फोटो : BBC

नदियां अब समस्याओं को आंचल में नहीं लेतीं
भारतीय सभ्यता में नदियों को मां के समान माना गया है। पानी के बारे में यह भी कहा जाता है कि वो उपचारक होता है। यही वजह है कि बीमारी होने पर कहा जाता है कि हवा-पानी बदल दिया जाए। नदी के पास जाकर ही अस्वस्थ व्यक्ति भी खुद को स्वस्थ महसूस करने लगता है लेकिन अब हमने नदियों को इस स्थिति में छोड़ा ही नहीं कि वे हमारी समस्याओं को अपने आंचल में लेकर, हमें मुक्त कर दें। हम नदियों से दूर होते गए और अस्पतालों के निकट जाते गए। पीने के पानी के लिए भी हमने आरओ जैसे विकल्पों को अधिक विश्वसनीय मान लिया। पानी के सारे खनिजों को ही खत्म डाला और शरीर और अपने पेट को कमजोर बना लिया। 

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