कोरोना वायरस: क्या अब खत्म हो जाएगी 'टपरी' पर चाय पीने की संस्कृति?
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ऑफिस के बाहर चाय के स्टॉल कर्मचारियों के लिए ब्रेक लेने के अड्डे होते हैं। वहां वे घुलते-मिलते हैं, तरोताजा होते हैं। क्या वे दोबारा खुल पाएंगे? कोरोना वायरस महामारी फैलने से पहले दिल्ली में किसी भी दिन कर्मचारियों को दफ्तर से बाहर निकलकर चाय के स्टॉल (टपरी) की ओर बढ़ते देखा जा सकता था। वहां वे गर्म चाय की प्याली के साथ करारे समोसे और आलू भजिया तलाशते मिल जाते थे।
अदरक या इलाइची वाली दूध की चाय पीने के लिए सहकर्मियों के साथ बाहर निकलना भारतीय दफ्तरों का दस्तूर है। चाय के ये स्टॉल, ठेले या दुकानें दफ्तर के काम से ब्रेक लेने, बॉस के बारे में गॉसिप करने या निजी जिंदगी के बारे में बातें करने के अड्डे होते हैं। लेकिन 24 मार्च से भारत में कोविड-19 वायरस का प्रसार रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की शुरुआत हो गई। दूसरे देशों की तरह भारत में भी दफ्तर बंद कर दिए गए। कर्मचारी घर से काम करना सीख गए और उनकी पसंदीदा चाय की दुकानें बंद हो गईं।
अब एक-एक करके सभी राज्यों में लॉकडाउन में ढील मिल रही है, लेकिन चाय की टपरी और समोसे-भजिया की दुकानें अब भी नहीं खुल रहीं। जिन्होंने दुकानें फिर से खोली हैं, उनके ग्राहक घट गए हैं। दफ्तरों में उपस्थिति कम है और कर्मचारियों को अब भी दूर रहकर काम करने को प्रेरित किया जा रहा है। जो लोग ऑफिस जा रहे हैं वे भी चाय की दुकानों पर मेल-जोल का जोखिम नहीं उठा रहे और सोशल डिस्टेंसिंग के निर्देशों का पालन कर रहे हैं।
भारत के लोग चाय को गंभीरता से लेते हैं। भारत दुनिया में चीन के बाद चाय का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारतीय चाय बोर्ड के मुताबिक 80 फीसदी चाय की खपत देश में ही होती है। भारत के लगभग 88 फीसदी घरों में चाय पी जाती है। भारत में चाय किसी भी वक्त पी जा सकती है। चाय यहां कॉफी की तुलना में बहुत आम है।
'यह एक दस्तूर है'
अर्जुन किशोर दिल्ली से 30 किलोमीटर दूर गुरुग्राम की एक हेल्थकेयर कंपनी में सीनियर मैनेजर हैं। कोरोना वायरस आने से पहले वह दिन में पांच बार चाय और 'सुट्टा' (सिगरेट) ब्रेक लेते थे। उनके ऑफिस के बाहर स्ट्रीट-फूड दुकानों की कतार थी, जहां हर वक्त लोगों की भीड़ रहती थी।
किशोर कहते हैं, 'मैंने कुछ महीने पहले ही इस कंपनी को ज्वाइन किया है। यहां आप इसी तरह लोगों को जानते हैं। काम से अलग हमारी शख्सियत क्या है उसके बारे में अनौपचारिक बातें यहीं होती हैं। हम तनाव और बॉस के साथ बुरे तजुर्बे के बारे में भी बातें करते हैं, साथ ही निजी जिंदगी के बारे में भी।'
दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाली डॉक्टर मैत्री चंद का कहना है कि इस तरह के ब्रेक तरोताजा कर सकते हैं। 'जब आप बाहर निकलते हैं तो परिवेश बदलता है। आप कांच और कंक्रीट से बाहर खुले में आते हैं जहां सूरज की सीधी रोशनी मिलती है। बाहर आना और ताजी हवा लेना एक दस्तूर बन गया है।'
डॉक्टर मैत्री के मुताबिक, एक जैसे तजुर्बों को साझा करने से लोग करीब आते हैं। वह एक रिसर्च का हवाला देती हैं, जिसके मुताबिक अगर दफ्तर में दोस्ताना माहौल हो तो उत्पादकता बढ़ती है। कर्मचारी काम पर जाने के लिए प्रेरित होते हैं, क्योंकि वहां उनको सहकर्मियों के साथ बातें करने का मौका मिलता है और वे अकेलापन महसूस नहीं करते।
बेंगलुरू की समाज विज्ञानी अरुल कणि का मानना है कि सार्वजनिक जगहों के बारे में भारतीयों की सोच अमेरिका और यूरोप के लोगों से अलग है। सामुदायिक जगहों पर कुछ खाते समय यहां गप्पें मारने की संस्कृति है। 'वहां सभी बराबर होते हैं। ज्यादातर लोगों की वहां तक बेरोक-टोक पहुंच होती है। चाय की इन दुकानों पर हर रोज रिश्ते बनते हैं, चाहे वे चाय और समोसे पर मिलने वाले सहकर्मी हों या सियासत पर बहस करने वाले छात्र।'
महाराष्ट्र के पुणे की जूही देसाई अनुसंधान और विकास प्रबंधक हैं। वह अपने एक सहकर्मी के साथ नींबू की चाय पीने के लिए टपरी पर रुकती हैं। वहां वे एक बन मस्का खाते हैं जो दो लोगों के लिए काफी होता है। जूही कहती हैं, 'काम पर हम कई चीजों पर बात नहीं कर सकते, क्योंकि वह मेरा जूनियर है। इसलिए हम वहां चाय पीते हैं और वक्त बिताते हैं।'
ज्यादातर भारतीय कंपनियों में पारंपरिक रूप से पद के मुताबिक एक मॉडल बना है, जिसमें मैनेजर का स्टेटस अलग होता है, कर्मचारियों का अलग। ऑफिस में मैनेजर और कर्मचारी खुलकर बातें नहीं कर सकते। 2019 का एक शोध बताता है कि भारतीय दफ्तरों का यह माहौल कर्मचारियों को थका देने वाली प्रमुख वजहों में से एक है। बर्नआउट की अन्य वजहें हैं- काम के लंबे घंटे, काम और जिंदगी के बीच संतुलन और काम का बोझ। ऐसे में चाय की टपरी दफ्तर के अंदर और बाहर की चीजों पर चर्चा करने के लिए एक माकूल जगह होती है।
अस्तित्व की तलाश
कोरोना वायरस और उसके बाद के लॉकडाउन ने भारत में रेहड़ी पटरी वालों की व्यवस्था को प्रभावित किया है। यह व्यवधान रोज के चाय ब्रेक के नुकसान से कहीं ज्यादा बड़ा है। पहले लॉकडाउन के एलान के कुछ ही दिन बाद शहरों से प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ। दिहाड़ी मजदूर, जैसे रेहड़ी पटरी वाले, निर्माण और घरेलू मज़दूर ज्यादातर गांवों से आते हैं। शहरों में उनकी नौकरी चली गई और पैसे कमाने के मौके खत्म हो गए। कई लोग अपने घर जाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हुए, क्योंकि सार्वजनिक परिवहन के साधन उपलब्ध नहीं थे। कुछ लोग घर नहीं पहुंच पाए और उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
फूड टूरिज्म कंपनी दिल्ली फूड वॉक के संस्थापक अनुभव सप्रा का कहना है कि स्ट्रीट फूड बेचने वाले ज्यादातर लोग पिछड़े राज्यों से आते हैं, जैसे बिहार, राजस्थान, ओडिशा और उत्तर प्रदेश। यहां तक कि पुरानी दिल्ली में स्ट्रीट फूड की दुकानों में काम करने वाले भी बिहार के हैं। वे घर लौट गए हैं इसलिए अब इस बिजनेस को चलाने का कोई तरीका नहीं है।
गुरुग्राम में चाय और नाश्ता बेचने वाले किशोर चौधरी को लॉकडाउन में दुकान खोलने की अनुमति नहीं थी। उनके साथ दुकान लगाने वाले अधिकतर लोग अपने गांव चले गए। किशोर की दुकान पर रोजाना करीब 500 ग्राहक आते थे। वह महीने में लगभग 30 हजार रुपये कमाते थे। दफ्तरों से आगे वह सुबह 7 बजे से 11 बजे के बीच दुकान लगाते थे।
लॉकडाउन में पहली ढील मिली तो किशोर वापस अपने 'ठीये' (दुकान की जगह) पर आए, लेकिन दिनभर में दो या तीन ग्राहक ही आए। उनको अपनी दुकान बंद करनी पड़ी। पश्चिमी दिल्ली में चाय बेचने वाले पवन कुमार के पास भी कम ग्राहक आते हैं, दिनभर में इक्का-दुक्का।
ग्राहकों में अधिकतर ट्रक और ऑटो रिक्शा ड्राइवर होते हैं जिनके पास एक कप चाय के 10 रुपये चुकाने के भी पैसे नहीं होते। लेकिन क्या कोरोना वायरस 'टपरी संस्कृति' को पूरी तरह खत्म कर देगा? सप्रा को ऐसा नहीं लगता। उनको भरोसा है कि प्रवासी मजदूर वापस शहरों में आएंगे। गांवों में कमाई के मौके नहीं हैं, इसलिए चाय की टपरी "सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक जरूरत है।'
बदलता परिदृश्य
भारत की चाय स्टॉल की संस्कृति जब वापसी करेगी तो चाय दुकानदारों को नए माहौल में ढलना होगा। सप्रा कहते हैं, 'हमें उनको मास्क पहनना, सैनिटाइजर का उपयोग करना और डिजिटल भुगतान लेना सिखाना होगा। डिस्पोजेबल कप के इस्तेमाल और कचरा प्रबंधन के बारे में बताना होगा।'
रेहड़ी पटरी वालों के राष्ट्रीय एसोसिएशन ने उनको प्रशिक्षित करने की योजना बनाई है ताकि वे अपने बिजनेस को फिर से खड़ा कर सकें। केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने सभी रेहड़ी पटरी वालों को 10 हजार रुपये का आसान कर्ज देने का एलान किया है ताकि उनको पूंजी मिले और वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। सरकारी प्रेस रिलीज में कहा गया है, 'आमतौर पर वे छोटी पूंजी से काम करते हैं जिसे वे अनौपचारिक स्रोतों से उधार लेते हैं। उस पैसे पर वे रोजाना एक प्रतिशत तक ब्याज देते हैं यानी साल में करीब 400 प्रतिशत ब्याज।'
समाज विज्ञानी कणि को लगता है कि महामारी का असर अधिक स्थायी होगा। लोग चाय की टपरी पर कम आएंगे और ज्यादा देर नहीं रुकेंगे। वहां बातें छोटी होंगी। इसके अलावा, मास्क पहनकर चाय और सुट्टा ब्रेक लेना मुश्किल है। 'दफ्तर के नियम भी बदल रहे हैं। कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिव इन चाय की दुकानों पर अजनबियों से भी मिल लेते थे। नए नियमों के तहत यह सब मुश्किल हो गया है।'
डॉक्टर मैत्री चंद का कहना है कि भारत के लोग इसके नये तरीके खोज लेंगे। 2016 में भारत के प्रधानमंत्री ने जाली नोटों को चलन से बाहर करने, टैक्स चोरी रोकने और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए नोटबंदी की थी। शुरुआत में रेहड़ी पटरी वालों पर तगड़ी चोट पड़ी, लेकिन उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया और डिजिटल भुगतान लेना शुरू कर दिया।
सामाजिक मेल-जोल और मानवीय संबंधों की जरूरत चाय की टपरी को दफ्तर की संस्कृति का अहम हिस्सा बनाती है। इसलिए जब चाय के स्टॉल दोबारा खुलेंगे तब चाहे जैसे हो, लोग अपने सहकर्मियों के साथ वहां गर्म चाय की चुस्की लेने जरूर आएंगे।