{"_id":"5a7aff924f1c1b514a8b7ef9","slug":"this-is-the-reason-that-children-are-forced-to-see-adult-things","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"'एडल्ट' चीजें देखने को क्यों मजबूर हैं बच्चे, वजह चौंकाने वाली","category":{"title":"Lifestyle","title_hn":"लाइफ स्टाइल","slug":"lifestyle"}}
'एडल्ट' चीजें देखने को क्यों मजबूर हैं बच्चे, वजह चौंकाने वाली
बीबीसी हिन्दी
Updated Wed, 07 Feb 2018 07:51 PM IST
विज्ञापन
123
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत के पहले सुपरहीरो के तौर पर पहचान बनाने वाले मुकेश खन्ना ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से नाराज़गी जताते हुए भारतीय बाल फिल्म सोसाइटी (सीएफएसआई) के चेयरमेन पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि खन्ना ने बताया कि उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं हुआ है। उनका कार्यकाल इस साल अप्रैल में खत्म होने वाला था, लेकिन करीब दो महीने पहले ही उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
मुकेश ने मंत्रालय पर पर्याप्त फंड न देने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मंत्रालय बच्चों के लिए फिल्म बनाने को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाता। शक्तिमान में 'शक्तिमान' और महाभारत में 'भीष्म पितामह' जैसे किरदार निभा चुके मुकेश का कहना है कि वो पहले भी कई बार इस बात की शिकायत कर चुके थे, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया।
मुकेश कहते हैं कि बच्चों के लिए फिल्मों की भरमार है, लेकिन ये फिल्में कभी रिलीज ही नहीं हुईं। बच्चों को कभी मालूम ही नहीं चल पाता है कि उनके लिए भी फिल्में बनती हैं। ''मुझे लगता है कि मुझसे पहले जो भी लोग यहां रहे उन्होंने कभी बच्चों के लिए फिल्म बनाने के बारे में इस तरीके से सोचा ही नहीं। शायद यही वजह है कि जो फिल्में वयस्क देखते हैं, वही छोटे बच्चे भी देखते हैं।''
विज्ञापन
विज्ञापन
मुकेश ने मंत्रालय पर पर्याप्त फंड न देने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मंत्रालय बच्चों के लिए फिल्म बनाने को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाता। शक्तिमान में 'शक्तिमान' और महाभारत में 'भीष्म पितामह' जैसे किरदार निभा चुके मुकेश का कहना है कि वो पहले भी कई बार इस बात की शिकायत कर चुके थे, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया।
विज्ञापन
मुकेश कहते हैं कि बच्चों के लिए फिल्मों की भरमार है, लेकिन ये फिल्में कभी रिलीज ही नहीं हुईं। बच्चों को कभी मालूम ही नहीं चल पाता है कि उनके लिए भी फिल्में बनती हैं। ''मुझे लगता है कि मुझसे पहले जो भी लोग यहां रहे उन्होंने कभी बच्चों के लिए फिल्म बनाने के बारे में इस तरीके से सोचा ही नहीं। शायद यही वजह है कि जो फिल्में वयस्क देखते हैं, वही छोटे बच्चे भी देखते हैं।''
विज्ञापन
मुकेश कहते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में आठ फिल्में बनाईं और मंत्रालय से कहा कि वो फंड बढ़ाए। उनका दावा है कि उनकी चिट्ठी प्रधानमंत्री तक जा चुकी है, लेकिन कोई भी ऐक्शन नहीं लिया गया। उनके अनुसार, ''मैं फिल्में डिस्ट्रीब्यूट करना चाहता हूं, लेकिन वो कहते हैं इसे टेंडर कर दो। लेकिन आप ही सोचिए जिस देश में बच्चों की फिल्म को लेकर इतनी उदासीनता हो वहां टेंडर निकालकर क्या मिलेगा।''
मुकेश कहते हैं, ''कई बार चेयरपर्सन होने के बावजूद मुझे फैसले लेने में दिक्कत आई, लेकिन सबसे बड़ी समस्या पैसों की है। मैं यहां 25 फिल्में अप्रूव करके बैठा हूं लेकिन मेरे पास पैसा सिर्फ चार फिल्मों का है।'' मुकेश कहते हैं कि बड़े-बड़े निर्देशक जैसे अनुपम खेर, राजकुमार संतोषी, नीरज पांडेय संयुक्त रूप से बच्चों के लिए फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें देने के लिए हमारे पास पैसे ही नहीं हैं। ''बच्चों के पास अपनी फिल्में ही नहीं हैं। ऐसे में वो मजबूरी में सास-बहू वाले सीरियल देख रहे हैं या फिर गंदी-गंदी फिल्में।''
अगर आपको लग रहा था कि मंत्रालय आपका सहयोग नहीं कर रहा तो आपने इतनी देर से इस्तीफा क्यों दिया? इस सवाल के जवाब में मुकेश कहते हैं, ''मेरे पास 12 फिल्में थी। उनका बजट अप्रूव कराना मेरी जिम्मेदारी थी। साथ ही ये सारी समस्याएं बीते एक साल में ज्यादा बढ़ी हैं।'' मुकेश मानते हैं कि 'यहां लोगों की सोच है कि फिल्में बनाकर गोदाम में डाल दो। वो कहां लगेंगी, लोगों तक कैसे पहुंच पाएंगी इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।'
मुकेश कहते हैं, ''कई बार चेयरपर्सन होने के बावजूद मुझे फैसले लेने में दिक्कत आई, लेकिन सबसे बड़ी समस्या पैसों की है। मैं यहां 25 फिल्में अप्रूव करके बैठा हूं लेकिन मेरे पास पैसा सिर्फ चार फिल्मों का है।'' मुकेश कहते हैं कि बड़े-बड़े निर्देशक जैसे अनुपम खेर, राजकुमार संतोषी, नीरज पांडेय संयुक्त रूप से बच्चों के लिए फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें देने के लिए हमारे पास पैसे ही नहीं हैं। ''बच्चों के पास अपनी फिल्में ही नहीं हैं। ऐसे में वो मजबूरी में सास-बहू वाले सीरियल देख रहे हैं या फिर गंदी-गंदी फिल्में।''
अगर आपको लग रहा था कि मंत्रालय आपका सहयोग नहीं कर रहा तो आपने इतनी देर से इस्तीफा क्यों दिया? इस सवाल के जवाब में मुकेश कहते हैं, ''मेरे पास 12 फिल्में थी। उनका बजट अप्रूव कराना मेरी जिम्मेदारी थी। साथ ही ये सारी समस्याएं बीते एक साल में ज्यादा बढ़ी हैं।'' मुकेश मानते हैं कि 'यहां लोगों की सोच है कि फिल्में बनाकर गोदाम में डाल दो। वो कहां लगेंगी, लोगों तक कैसे पहुंच पाएंगी इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।'
क्यों नहीं चुना कोई दूसरा रास्ता?
मुकेश कहते हैं कि 'ऑनलाइन विकल्प हैं, लेकिन इससे सीएफएसआई का कोई भला नहीं होगा। डिजिटल माध्यम से बच्चों तक फिल्में पहुंच तो जाएंगी, लेकिन इससे किसी को सीएफएसआई के बारे में नहीं पता चलेगा। फ़िल्म का हिट होना जरूरी है। तभी लोगों को ये समझ आएगा कि बच्चों के लिए भी फिल्में बनना जरूरी है।'
बड़ों का कन्टेंट, बच्चों के लिए कैसे हो सकता है?
मुकेश कहते हैं, 'आज के समय में इससे खतरनाक कुछ नहीं। चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को अपने से दोगुनी उम्र की वो बातें पता होती हैं जो उसे उस वक्त नहीं पता होनी चाहिए। ये सारी चीज़ें कहीं न कहीं बच्चे में अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम करती हैं।'
इस मामले पर हमने पूर्व चेयरपर्सन अमोल गुप्ते से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने व्यस्त होने की बात कहकर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से साफ मना कर दिया। इस मामले पर जब सीएफएसआई के एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर राजेश गोहिल से बात की तो उन्होंने कहा कि वो इस संबंध में कोई टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। ''हम लोग सरकारी कर्मचारी हैं और अभी ये मामला उनके और मंत्रालय के बीच है। ऐसे में हम इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। फिलहाल उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है तो आगे क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता।''
मुकेश कहते हैं कि 'ऑनलाइन विकल्प हैं, लेकिन इससे सीएफएसआई का कोई भला नहीं होगा। डिजिटल माध्यम से बच्चों तक फिल्में पहुंच तो जाएंगी, लेकिन इससे किसी को सीएफएसआई के बारे में नहीं पता चलेगा। फ़िल्म का हिट होना जरूरी है। तभी लोगों को ये समझ आएगा कि बच्चों के लिए भी फिल्में बनना जरूरी है।'
बड़ों का कन्टेंट, बच्चों के लिए कैसे हो सकता है?
मुकेश कहते हैं, 'आज के समय में इससे खतरनाक कुछ नहीं। चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को अपने से दोगुनी उम्र की वो बातें पता होती हैं जो उसे उस वक्त नहीं पता होनी चाहिए। ये सारी चीज़ें कहीं न कहीं बच्चे में अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम करती हैं।'
इस मामले पर हमने पूर्व चेयरपर्सन अमोल गुप्ते से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने व्यस्त होने की बात कहकर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से साफ मना कर दिया। इस मामले पर जब सीएफएसआई के एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर राजेश गोहिल से बात की तो उन्होंने कहा कि वो इस संबंध में कोई टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। ''हम लोग सरकारी कर्मचारी हैं और अभी ये मामला उनके और मंत्रालय के बीच है। ऐसे में हम इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। फिलहाल उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है तो आगे क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता।''
इस पर वरिष्ठ फिल्म समीक्षक और लेखक गौतम कौल का कहना कि इस तरह की टिप्पणी पहले तो कभी सुनने में नहीं आई, लेकिन मुकेश खन्ना की बात को सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। ''खन्ना जी जो कह रहे हैं वो आधा सच हो सकता है, लेकिन पूरी सच नहीं। इसमें एक दूसरा पक्ष ये भी हो सकता है कि वो एक बार फिर से कमर्शियल इंटरटेनमेंट की ओर लौटना चाहते हों और इस पद पर रहते हुए वो स्वतंत्र रूप से इसे कर नहीं पा रहे हों।''
कौल कहते हैं कि मुकेश खन्ना एक जाना-पहचाना नाम हैं। वो चाहते तो दूरदर्शन या दूसरे चैनलों से नेगोशिएट कर सकते थे। इसके अलावा कई और चैनल भी हैं जो डॉक्यूमेंट्री प्रसारित करते हैं। संभव है कि यहां पर रॉयल्टी का मामला फंसता हो। इसके साथ ही ये समझ लेना जरूरी है कि कमर्शियल डिस्ट्रीब्यूटर चिल्ड्रंन फिल्में नहीं उठाता। चिल्ड्रेन फिल्म की कैटगरी हटाकर भी तो बच्चों के लिए फिल्म बनाई जा सकती है और 'जंगल बुक' इसका बेहतरीन उदाहरण है। हालांकि कौल, मुकेश के आरोपों को भी एक सीमा तक सही मानते हैं।
क्या है सीएफएसआई?
सीएफएसआई की स्थापना आज़ादी के कुछ ही समय बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई थी। 1955 से सीएफएसआई ने बतौर स्वायत्त संस्थान काम करना शुरू किया। 1957 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सीएफएसआई की फिल्म 'जलदीप' को पहला इनाम मिला था। सीएफएसआई का मकसद बच्चों के लिए ऐसी फिल्मों का निर्माण करना है जो उनके विकास में सहायक हो। सीएफएसआई की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार अब तक वह 10 अलग-अलग भाषाओं में 250 फिल्मों का निर्माण कर चुकी है।
...लेकिन इस बीच सवाल वहीं का वहीं रह जाता है कि भारत में बच्चों के लिए मनोरंजन की भारी कमी है और इस कमी को वो बड़ों वाले कन्टेंट देखकर ही पूरा कर रहे हैं।
कौल कहते हैं कि मुकेश खन्ना एक जाना-पहचाना नाम हैं। वो चाहते तो दूरदर्शन या दूसरे चैनलों से नेगोशिएट कर सकते थे। इसके अलावा कई और चैनल भी हैं जो डॉक्यूमेंट्री प्रसारित करते हैं। संभव है कि यहां पर रॉयल्टी का मामला फंसता हो। इसके साथ ही ये समझ लेना जरूरी है कि कमर्शियल डिस्ट्रीब्यूटर चिल्ड्रंन फिल्में नहीं उठाता। चिल्ड्रेन फिल्म की कैटगरी हटाकर भी तो बच्चों के लिए फिल्म बनाई जा सकती है और 'जंगल बुक' इसका बेहतरीन उदाहरण है। हालांकि कौल, मुकेश के आरोपों को भी एक सीमा तक सही मानते हैं।
क्या है सीएफएसआई?
सीएफएसआई की स्थापना आज़ादी के कुछ ही समय बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई थी। 1955 से सीएफएसआई ने बतौर स्वायत्त संस्थान काम करना शुरू किया। 1957 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सीएफएसआई की फिल्म 'जलदीप' को पहला इनाम मिला था। सीएफएसआई का मकसद बच्चों के लिए ऐसी फिल्मों का निर्माण करना है जो उनके विकास में सहायक हो। सीएफएसआई की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार अब तक वह 10 अलग-अलग भाषाओं में 250 फिल्मों का निर्माण कर चुकी है।
...लेकिन इस बीच सवाल वहीं का वहीं रह जाता है कि भारत में बच्चों के लिए मनोरंजन की भारी कमी है और इस कमी को वो बड़ों वाले कन्टेंट देखकर ही पूरा कर रहे हैं।