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Shivrajyabhishek din 2021: जानिए मुगलों को परास्त करने वाले शिवाजी को लोगों ने शासक मानने से क्यों कर दिया था इनकार?
Sun, 06 Jun 2021 01:32 PM IST
Abhilash Srivastava
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Abhilash Srivastava
Updated Sun, 06 Jun 2021 01:32 PM IST
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शिवराज्याभिषेक दिनी 2021
- फोटो : Social media
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भारत के इतिहास में शूरवीरों की चर्चा, छत्रपति शिवाजी महाराज के बिना अधूरी है। मुगलों को नाकों चने चबवाने और भारत के इतिहास को गौरवशाली बनाने में शिवाजी महाराज का योगदान अविस्मरणीय है। यही कारण है कि 6 जून का दिन महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए बड़ा गौरवमयी माना जाता है। इसी दिन मुगलों को परास्त कर शिवाजी वापस लौटे थे और उनका सम्राट को रूप में राज्याभिषेक हुआ था। हर साल 6 जून को छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस लेख में हम जानेंगे कि मराठा इतिहास में यह दिन क्यों इतना अहम माना जाता है?
हिंदुओं के साथ मुगल शासक करते थे अत्याचार
छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। शिवाजी महाराज का जन्म इतिहास के एक ऐसे युग में हुआ था जब दक्षिण के बीजापुर (कर्नाटक) में आदिल शाह और उत्तर में आगरा/दिल्ली में मुगल बादशाहों का शासन था। ऐसा शासन जिसमें हिंदुओं के साथ घोर अत्याचार होता था। अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए मुगल शासकों ने अदालतों और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर ईरानी (फारसी) और मध्य एशियाई लोगों को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी, ऐसे में स्थानीय भारतीय जागीरों को किनारे कर दिया गया। लोगों के बीच में असंतोष का माहौल तो था लेकिन कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो इसके खिलाफ आवाज उठा सके।
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हिंदुओं के साथ मुगल शासक करते थे अत्याचार
छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है। शिवाजी महाराज का जन्म इतिहास के एक ऐसे युग में हुआ था जब दक्षिण के बीजापुर (कर्नाटक) में आदिल शाह और उत्तर में आगरा/दिल्ली में मुगल बादशाहों का शासन था। ऐसा शासन जिसमें हिंदुओं के साथ घोर अत्याचार होता था। अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए मुगल शासकों ने अदालतों और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर ईरानी (फारसी) और मध्य एशियाई लोगों को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी, ऐसे में स्थानीय भारतीय जागीरों को किनारे कर दिया गया। लोगों के बीच में असंतोष का माहौल तो था लेकिन कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो इसके खिलाफ आवाज उठा सके।
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शिवाजी राज्याभिषेक दिवस
- फोटो : Social media
जब मुगलों के खिलाफ उठी आवाज
इस बीच पुणे के आसपास के मावल क्षेत्र से शिवाजी शाहजीराव भोंसले के नेतृत्व में लड़कों के एक समूह आदिलशाह और मुगलों के आधिपत्य को चुनौती देने के लिए खड़ा हुआ। शाहजीराव भोंसले के नेतृत्व में लड़ाकों ने अपने दबदबे को ताकत से मजबूत किया और जल्द ही वह बड़ी शक्ति बनकर उभरे। उनके बारे में एक बात स्पष्ट थी कि उनकी लड़ाई इस्लाम के खिलाफ नहीं बल्कि निरंकुश शासकों से थी जो संयोग से मुसलमान थे। साल 1659 में प्रतापगढ़ किले पर आदिल शाह की सेना के साथ शिवाजी का युद्ध हुआ जिसमें वह विजयी हुए।
पुरंदर की संधि
प्रतापगढ़ विजय के बाद शिवाजी की कद तो बढ़ा लेकिन मुगलों से उन्हें पुरंदर की संधि करनी पड़ी। इस संधि के तहत उन्हें जीते हुए बहुत से इलाके मुगलों को लौटाने पड़े। इसके बाद साल 1666 में एक बार जब वह औरंगजेब से मिलने आगरा गए थे तो मुगल शासक ने उन्हें और उनके पुत्र संभाजी के साथ बंदी बना लिया। शिवाजी, विरोधी शासन में भी हिम्मत नहीं हारे और किसी तरह छिपकर वापस रायगढ़ पहुंच गए। वहां उन्होंने फिर से लोगों को एकत्रित कर पुरंदर की संधि में गंवाए इलाकों को अपने आधिकार में लेने की शुरुआत की।
राज्याभिषेक नहीं था आसान
शिवाजी को अब तक मालूम हो गया था कि राज्यों को संगठित करके शक्तिशाली बनने के लिए उन्हें पूर्ण शासक बनना होगा। हालांकि सामाजिक जातीय समस्याओं के चलते रूढ़िवादी लोग उन्हें शासक मानने को तैयर नहीं थे। उस दौर में शासक केवल क्षत्रिय वंशज के लोगों को ही माना जाता था और शिवाजी भोंसले समुदाय से थे। इसके बाद शिवाजी ने काशी के गागा भट्ट के परिवार से पुष्टि कराते हुए मराठवाड़ा के ब्राह्मणों को राज्याभिषेक के लिए राजी कराया। आखिर में पूरी रीति रिवाज के साथ 6 जून 1674 को शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ।
इस बीच पुणे के आसपास के मावल क्षेत्र से शिवाजी शाहजीराव भोंसले के नेतृत्व में लड़कों के एक समूह आदिलशाह और मुगलों के आधिपत्य को चुनौती देने के लिए खड़ा हुआ। शाहजीराव भोंसले के नेतृत्व में लड़ाकों ने अपने दबदबे को ताकत से मजबूत किया और जल्द ही वह बड़ी शक्ति बनकर उभरे। उनके बारे में एक बात स्पष्ट थी कि उनकी लड़ाई इस्लाम के खिलाफ नहीं बल्कि निरंकुश शासकों से थी जो संयोग से मुसलमान थे। साल 1659 में प्रतापगढ़ किले पर आदिल शाह की सेना के साथ शिवाजी का युद्ध हुआ जिसमें वह विजयी हुए।
पुरंदर की संधि
प्रतापगढ़ विजय के बाद शिवाजी की कद तो बढ़ा लेकिन मुगलों से उन्हें पुरंदर की संधि करनी पड़ी। इस संधि के तहत उन्हें जीते हुए बहुत से इलाके मुगलों को लौटाने पड़े। इसके बाद साल 1666 में एक बार जब वह औरंगजेब से मिलने आगरा गए थे तो मुगल शासक ने उन्हें और उनके पुत्र संभाजी के साथ बंदी बना लिया। शिवाजी, विरोधी शासन में भी हिम्मत नहीं हारे और किसी तरह छिपकर वापस रायगढ़ पहुंच गए। वहां उन्होंने फिर से लोगों को एकत्रित कर पुरंदर की संधि में गंवाए इलाकों को अपने आधिकार में लेने की शुरुआत की।
राज्याभिषेक नहीं था आसान
शिवाजी को अब तक मालूम हो गया था कि राज्यों को संगठित करके शक्तिशाली बनने के लिए उन्हें पूर्ण शासक बनना होगा। हालांकि सामाजिक जातीय समस्याओं के चलते रूढ़िवादी लोग उन्हें शासक मानने को तैयर नहीं थे। उस दौर में शासक केवल क्षत्रिय वंशज के लोगों को ही माना जाता था और शिवाजी भोंसले समुदाय से थे। इसके बाद शिवाजी ने काशी के गागा भट्ट के परिवार से पुष्टि कराते हुए मराठवाड़ा के ब्राह्मणों को राज्याभिषेक के लिए राजी कराया। आखिर में पूरी रीति रिवाज के साथ 6 जून 1674 को शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ।