#ऑफिस की बातें और लाइफ: उन्होंने खामोशी से एक लिफाफा थमाया और मेरी नौकरी चली गई
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कल रात ही मेरी नौकरी छूटी है। छूटी क्या है मालिक ने निकाल दिया। 4,500 रुपए का चेक थमाकर विदा कर दिया। डेढ महीने में ही नौकरी की सारी खुशी निराशा में तब्दील हो गई। 15 दिन की तनख्वाह और अब फिर बेराजगारी। मालिक बोला- 'काम सीखने के बाद वैसे भी आप छोड़ देते। पुराना लड़का गांव से लौट चुका है। आप कहीं और देखिए।' दो-तीन दिन से मालिक लगातार कह रहा था- 'आपका काफी दूर पड़ता है। 9 हजार में से 5 हजार तो किराया लग जाता है। कहीं और देखिए। मैं तनख्वाह नहीं बढ़ाऊंगा '
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कल रात ही मेरी नौकरी छूटी है। छूटी क्या है मालिक ने निकाल दिया। 4,500 रुपए का चेक थमाकर विदा कर दिया। डेढ महीने में ही नौकरी की सारी खुशी निराशा में तब्दील हो गई। 15 दिन की तनख्वाह और अब फिर बेराजगारी। मालिक बोला- 'काम सीखने के बाद वैसे भी आप छोड़ देते। पुराना लड़का गांव से लौट चुका है। आप कहीं और देखिए।' दो-तीन दिन से मालिक लगातार कह रहा था- 'आपका काफी दूर पड़ता है। 9 हजार में से 5 हजार तो किराया लग जाता है। कहीं और देखिए। मैं तनख्वाह नहीं बढ़ाऊंगा '
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मैं कहां और देखता? बड़ी मुश्किल से तो यह नौकरी मिली थी। मालिक को क्या पता नौ में से सात हजार भी किराया लगता तो भी मैं नौकरी नहीं छोड़ता। क्योंकि सबसे मुश्किल नौकरी मिलना ही है। काम सीखने के बाद भी यहीं रहता। मेरा ऑफिस चांदनी चौक में एक संकरी गली में था। यह गली कुछ दिन पहले देशभर में काफी चर्चाओं में रही। अखबारों और टेलीविजन पर छाई रही। बाद में इसी गली ने देश में हिंदु-मुस्लिम भाईचारे की मिशाल पेश की और मैंने भी बड़े चाव से यहां भंडारा खाया। डेढ़ महीन में ही मुझे लगाव हो गया था- ऑफिस के उन रास्तों से जिन्हें मैं रोज नापता था। लेकिन कल रात, मुझे कोफ्त हो रही थी उन्हीं गलियों से जब मैं वापस लौट रहा था।
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जब भी मुझे कोई नौकरी मिलती है, मैं खुश हो जाता हूं। पांच महीने पुरानी बात है। एक कॉल सेंटर में मेरी नौकरी लगी। फोन पर लोगों से पैसे मांगने थे। कॉल सेंटर वाले खुद को गैर-सरकारी एनजीओ बता रहे थे। 15 दिन काम करने के बाद एक दिन एचआर ने बुलाया और बोला आपको टीम लीडर बना देते हैं। अचानक इतनी कृपा मेरी समझ नहीं आई और मैंने पूछा क्यों? बोले आपका काम अच्छा है। उसके बाद एचआर ने मुझे बताया यह तो समाज सेवा है। यहां पैसे नहीं मिलते। यह सुनते ही मेरा पारा हाय हो गया। पहले 12 हजार रुपए की बात हुई थी और फिर समाजसेवा! मैं जमकर हंगामा करना चाहता था लेकिन मेरी ही तरह एक-दो लोग आए और बोले- 'भाई कम से कम हमें जो मिल रहा है। उसे मिलने दो।' अपनी जैसी हालत उनकी भी देखकर, खुद से ज्यादा उनपर दया आ गई।
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ऐसा नहीं है कि मेरी नौकरी नहीं लगी। मैंने भी नौ-दस महीने तक एक फाइव स्टार रेस्टोरेंट में अच्छी तनख्वाह पर काम किया। किसी कारणवश छोड़ना पड़ा और तब से मैं बेरोजगार हूं। मेरे आसपास ऐसे बहुत से लोग हैं जो बेरोजगारी पर बोलते और लिखते हैं। मैं पढ़ता और सुनता हूं, बस। कल रात जब मेरी आखिरी नौकरी छूटी तो मैंने घर में नहीं बताया। सुबह जब खाना बनकर तैयार हो गया। तब जाकर मैंने घर में 4500 रुपए का चेक थमा दिया जो तस्दीक करता था नौकरी अब नहीं रही। काल्पनिक की जगह आप मेरा वास्तविक नाम लिख सकते हैं।
(ऑफिस और लाइफ सीरीज की यह दूसरी किस्त है। इसमें दीपक ने अपने अनुभवों को हमारे साथ साझा किया है। दीपक नोएडा में रहते हैं।)