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विवाह में लैंगिगता

Mon, 22 Dec 2014 05:01 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Mon, 22 Dec 2014 05:01 PM IST
sexuality india marriage

ये अंश सुधीर कक्कड़ और कैथरीना कक्कड़ की किताब 'हम हिंदुस्तानी, भारतीयता की वास्तविक पहचान' से लिया गया है। भारत के जाने-माने मनोविश्लेषक तथा सांस्कृतिक विचारक सुधीर कक्कड़ व मानवविज्ञानी कैकरीना कक्कड़ ने इस पुस्तक के जरिए भारतीयता की वास्तविक पहचान पर रोशनी डाली है।



भय, शर्म तथा अपराध के सांस्कृतिक बोझ से दबे हुए अनेक पारंपरिक भारतीय विवाहों में शारीरिक प्रेम प्रायः ऊर्जावान कामुक मनोभाव की पूर्ण ताकत के वना केवल लालसा की तेज भावना ही बनकर रह जाता है।


दिल्ली में निम्न जातियों की गरीब महिलाओं के साक्षात्कार ने यह दर्शाया कि उनके बीच यौन क्रीड़ा का तात्पर्य प्यार और मृदुता न होकर बैर और उदासीनता है।

लगभग सभी महिलाओं ने यौन क्रीड़ा का चित्रण एक तंग और भीड़ भरे कमरे में गुपचुप तरीके से की गई हरकत के रूप में किया, जो मात्र कुछ ही मिनट तक चली और जिसमें शारीरिक अथवा संवेदनशील प्रेम स्पर्श का नितांत अभाव था।
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अधिकांश महिलाओं ने इसे पीड़ा जनक अथवा अरूचिकर अथवा दोनों ही पाया। यह एक ऐसी स्थिति होती थी, जो अक्सर मार खाने के भय से बेमन से झुक जाने की होती थी। इनमें से किसी भी स्त्री ने इस क्रीड़ा के दौरान अपने कपड़े तक नहीं उतारे, क्योंकि ऐसा करना लज्जाजनक समझा जाता था।

हालांकि इस मामले में कुछ कम कटु महिलाएं अब भी अपने पति से शारीरिक नरमी प्राप्त करने के लिए अवश्य लालायित रहती हैं, परंतु इस कृत्य को पुरूष का परमाधिकार और वैध आवश्कता के रूप में देखा जाता था। 'आदमी बोलना चाहता है'। अंग्रेजी में इसे प्रेम क्रीड़ा कहा जाता है।

उसके लिए एक अन्य प्रचलित रूपक है 'हप्ते में एक बार लगवा लेते है'। अपनी मूल हिंदूस्तानी भषा में इस वाक्यांश को एक ऐसे साप्ताहित इंजेक्शन के रूप में परिभाषित किय गया है जो शायद दर्दनाक तो होता है परंतु स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।


सहवास के लिए सर्वाधिक आम अभिव्यक्तियां हैं- काम और धंधा। इन महिलाओं (और पुरूषों) के लिए यौन क्रीड़ा किसी समझौते और अवैयक्तिक संबंधों की शर्तों में बंधी हुई प्रतीत होती है जिसमें इसकी संभावना सदैव बनी रहती है कि एक पक्ष दुसरे का शोषण करेगा अथवा उसके साथ छल करेगा।

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