{"_id":"690a2820877f384b7f037f58","slug":"parenting-tips-picky-eater-bachche-ko-khilane-ke-tarike-aur-tips-2025-11-04","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Parenting Tips: क्या खाने को देख बच्चा सिकोड़ता है नाक-मुंह? अभिभावक अपनाएं ये तरीके","category":{"title":"Relationship","title_hn":"रिलेशनशिप","slug":"relationship"}}
Parenting Tips: क्या खाने को देख बच्चा सिकोड़ता है नाक-मुंह? अभिभावक अपनाएं ये तरीके
Wed, 05 Nov 2025 06:30 PM IST
शिवानी अवस्थी
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवानी अवस्थी
Updated Wed, 05 Nov 2025 06:30 PM IST
सार
बच्चों का खाने को देखकर मुंह सिकोड़ना आम बात है, लेकिन हर वक्त न खाने की जिद करना गंभीर बात। विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे बच्चों में पोषण की कमी हो सकती है।
विज्ञापन
आहार
- फोटो : Freepik.com
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दीपिका शर्मा
सीमा छह साल की बेटी सौम्या से बहुत परेशान है। सौम्या खाने को देखकर नाक-मुंह सिकोड़ती है। असल में, वह पिकी ईटर है, यानी भोजन के मामले में बहुत चूजी। ऐसे बच्चे अक्सर नए खाद्य पदार्थ खाने से मना करते हैं और कुछ खास रंग, स्वाद या टेक्सचर वाले भोजन को नापसंद करते हैं। यह आदत आम तौर पर दो से छह साल की उम्र में देखी जाती है और कई बार इससे बड़ी उम्र के बच्चों में भी। ऐसे में माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता होती है कि बच्चे को सही पोषण कैसे मिलेगा?
पोषण की कमी
2020 की ‘जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन’ के एक अध्ययन के अनुसार, पिकी ईटर बच्चों में आवश्यक पोषक तत्व, जैसे- आयरन, जिंक, विटामिन ए और प्रोटीन की कमी पाई जाती है। इससे उनकी वृद्धि और मानसिक विकास प्रभावित होता है। साथ ही इस कारण ऐसे बच्चों में ऊर्जा की कमी भी सबसे ज्यादा देखी जाती है। अध्ययन में विशेषज्ञों ने सलाह दी कि माता-पिता को रचनात्मक तरीकों से बच्चों के आहार में सुधार करना जरूरी है, ताकि वे संतुलित आहार प्राप्त कर सकें।
खिलाएं भी, सिखाएं भी
टीना पांच साल की है और खाने में बेहद पिकी, बिल्कुल सौम्या की तरह। इसलिए एक दिन मां ने उसे ब्रोकली परोसते हुए उसे ‘स्मॉल ट्री’ कहा। टीना हैरान हुई, “ये ट्री है?” मां मुस्कुराई, “हां, जंगल के नन्हे पेड़!” टीना ने बिना मुंह बनाए उसे चखा और पूरा खत्म भी किया। अब मां हर सब्जी को एक कहानी के साथ टीना को खिलाती है, जिससे वह सही पोषण के साथ कुछ नया भी सीखती है।
विज्ञापन
पारिवारिक शैली
हर परंपरा में भोजन बनाने और खाने का अलग-अलग तरीका होता है। कहीं हाथ से खाया जाता है तो कहीं चम्मच से। कहीं खाने के साथ आचार परोसा जाता है तो कहीं पापड़, दही और चटनी। ऐसे में आप अपने पिकी ईटर बच्चे को सही पोषण देने के लिए डाइनिंग टाइम को मजेदार बनाएं। कभी अपनी पारिवारिक शैली को शामिल करें तो कभी कहीं और की। यह बच्चे को सिखाने और खिलाने का बेहतरीन तरीका हो सकता है।
उसे शामिल करें
बच्चों को भोजन से जोड़ने का एक प्रभावी तरीका है, उन्हें खाना बनाने या सब्जी खरीदने की प्रक्रिया में शामिल करना। जब आप बाजार जाएं तो बच्चे को साथ ले जाएं और उसे पसंदीदा सब्जियां चुनने दें। घर पर छोटे-छोटे किचन टास्क दें, जैसे- सलाद धोना, प्लेट सजाना या रोटी बेलने में मदद करना। साथ ही आप बार-बार यह बात दोहराएं कि आज का खाना बच्चे ने बनाया है। इस तरह की भागीदारी से बच्चे में भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है।
लालच न दें
बच्चों को खाना खिलाने के लिए उन्हें पसंदीदा चीज, जैसे चॉकलेट या मिठाई देने का लालच न दें। ऐसा करने से बच्चे के मन में उस विशेष चीज का महत्व बढ़ जाएगा, भोजना का नहीं और आपको कभी उसके पिकी ईटर होने से छुटकारा नहीं मिलेगा।
घर का हल्का मीठा और नमकीन भोजन
आहार विशेषज्ञ डॉ. कनिष्का सिंह बताती हैं, अधिकतर बच्चे बचपन में पिकी ईटर्स ही होते हैं, जो स्वाभाविक प्रक्रिया है। आज के बच्चों के पास विकल्पों की भरमार होने के कारण यह प्रवृत्ति बढ़ी है। माता-पिता की अधिक चिंता और विज्ञापनों से प्रभावित होकर लाई गई चीजें बच्चों को घर के भोजन से दूर करती हैं। पहले बच्चों को देर तक स्तनपान कराया जाता था, मगर अब छह महीने से पहले ही मीठे वेनिंग फूड दिए जाने लगे हैं, जिससे वे एक खास स्वाद के आदी हो जाते हैं। शुरुआत में घर का बना हल्का मीठा और नमकीन भोजन देना बेहतर होता है। ताजे मौसमी फल दें, क्योंकि शुरुआती खान-पान का असर लंबे समय तक रहता है। खाने के समय स्क्रीन का उपयोग बिल्कुल न करने दें।
विज्ञापन
सीमा छह साल की बेटी सौम्या से बहुत परेशान है। सौम्या खाने को देखकर नाक-मुंह सिकोड़ती है। असल में, वह पिकी ईटर है, यानी भोजन के मामले में बहुत चूजी। ऐसे बच्चे अक्सर नए खाद्य पदार्थ खाने से मना करते हैं और कुछ खास रंग, स्वाद या टेक्सचर वाले भोजन को नापसंद करते हैं। यह आदत आम तौर पर दो से छह साल की उम्र में देखी जाती है और कई बार इससे बड़ी उम्र के बच्चों में भी। ऐसे में माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता होती है कि बच्चे को सही पोषण कैसे मिलेगा?
पोषण की कमी
2020 की ‘जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन’ के एक अध्ययन के अनुसार, पिकी ईटर बच्चों में आवश्यक पोषक तत्व, जैसे- आयरन, जिंक, विटामिन ए और प्रोटीन की कमी पाई जाती है। इससे उनकी वृद्धि और मानसिक विकास प्रभावित होता है। साथ ही इस कारण ऐसे बच्चों में ऊर्जा की कमी भी सबसे ज्यादा देखी जाती है। अध्ययन में विशेषज्ञों ने सलाह दी कि माता-पिता को रचनात्मक तरीकों से बच्चों के आहार में सुधार करना जरूरी है, ताकि वे संतुलित आहार प्राप्त कर सकें।
विज्ञापन
खिलाएं भी, सिखाएं भी
टीना पांच साल की है और खाने में बेहद पिकी, बिल्कुल सौम्या की तरह। इसलिए एक दिन मां ने उसे ब्रोकली परोसते हुए उसे ‘स्मॉल ट्री’ कहा। टीना हैरान हुई, “ये ट्री है?” मां मुस्कुराई, “हां, जंगल के नन्हे पेड़!” टीना ने बिना मुंह बनाए उसे चखा और पूरा खत्म भी किया। अब मां हर सब्जी को एक कहानी के साथ टीना को खिलाती है, जिससे वह सही पोषण के साथ कुछ नया भी सीखती है।
विज्ञापन
पारिवारिक शैली
हर परंपरा में भोजन बनाने और खाने का अलग-अलग तरीका होता है। कहीं हाथ से खाया जाता है तो कहीं चम्मच से। कहीं खाने के साथ आचार परोसा जाता है तो कहीं पापड़, दही और चटनी। ऐसे में आप अपने पिकी ईटर बच्चे को सही पोषण देने के लिए डाइनिंग टाइम को मजेदार बनाएं। कभी अपनी पारिवारिक शैली को शामिल करें तो कभी कहीं और की। यह बच्चे को सिखाने और खिलाने का बेहतरीन तरीका हो सकता है।
उसे शामिल करें
बच्चों को भोजन से जोड़ने का एक प्रभावी तरीका है, उन्हें खाना बनाने या सब्जी खरीदने की प्रक्रिया में शामिल करना। जब आप बाजार जाएं तो बच्चे को साथ ले जाएं और उसे पसंदीदा सब्जियां चुनने दें। घर पर छोटे-छोटे किचन टास्क दें, जैसे- सलाद धोना, प्लेट सजाना या रोटी बेलने में मदद करना। साथ ही आप बार-बार यह बात दोहराएं कि आज का खाना बच्चे ने बनाया है। इस तरह की भागीदारी से बच्चे में भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है।
लालच न दें
बच्चों को खाना खिलाने के लिए उन्हें पसंदीदा चीज, जैसे चॉकलेट या मिठाई देने का लालच न दें। ऐसा करने से बच्चे के मन में उस विशेष चीज का महत्व बढ़ जाएगा, भोजना का नहीं और आपको कभी उसके पिकी ईटर होने से छुटकारा नहीं मिलेगा।
घर का हल्का मीठा और नमकीन भोजन
आहार विशेषज्ञ डॉ. कनिष्का सिंह बताती हैं, अधिकतर बच्चे बचपन में पिकी ईटर्स ही होते हैं, जो स्वाभाविक प्रक्रिया है। आज के बच्चों के पास विकल्पों की भरमार होने के कारण यह प्रवृत्ति बढ़ी है। माता-पिता की अधिक चिंता और विज्ञापनों से प्रभावित होकर लाई गई चीजें बच्चों को घर के भोजन से दूर करती हैं। पहले बच्चों को देर तक स्तनपान कराया जाता था, मगर अब छह महीने से पहले ही मीठे वेनिंग फूड दिए जाने लगे हैं, जिससे वे एक खास स्वाद के आदी हो जाते हैं। शुरुआत में घर का बना हल्का मीठा और नमकीन भोजन देना बेहतर होता है। ताजे मौसमी फल दें, क्योंकि शुरुआती खान-पान का असर लंबे समय तक रहता है। खाने के समय स्क्रीन का उपयोग बिल्कुल न करने दें।